धनी देश बच्चों को कोविड-19 के दुष्परिणामों से बचाने में सहयोग करें

3 सितम्बर 2020

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) द्वारा गुरुवार को प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, दुनिया के सबसे धनी देशों में बच्चे मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, मोटापे और सामाजिक व शैक्षणिक कौशल की कमी से जूझ रहे हैं.

यूनीसेफ़ के Office of Research  Innocenti की रिपोर्ट में सरकारों से अनुरोध किया गया है कि वे कोविड-19 महामारी के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक प्रभावों के मद्देनज़र, बाल कल्याण सेवाओं व सुरक्षा में सुधार करें.

इटली के फ्लोरेंस शहर में स्थित शोध कार्यालय के निदेशक गुनिल्ला ओल्सन ने कहा, "दुनिया के कई सबसे धनी देशों के पास सभी बच्चों के लिये अच्छा बचपन सुनिश्चित करने के संसाधन मौजूद हैं, लेकिन ऐसा करने में असफल हो रहे हैं."

उन्होंने कहा कि सरकारें जब तक, महामारी की जवाबी कार्रवाई के हिस्से के रूप में बाल कल्याण और रक्षा के लिये तेज़ व निर्णायक कार्रवाई नहीं करतीं, तब तक बच्चों में ग़रीबी दर, ख़राब मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य व कौशल में गहरी असमानता ख़त्म नहीं की जा सकती.

वार्षिक रिपोर्ट कार्ड

यह अध्ययन यूनीसेफ़ की उस रिपोर्ट कार्ड श्रृँखला की नवीनतम कड़ी है, जो 20 वर्षों से बाल-कल्याण को लेकर योरोपीय संघ और आर्थिक सहयोग संगठन (ओईसीडी) के देशों को श्रेणीबद्ध करता है.

Worlds of Influence: Understanding what shapes child well-being in rich countries नामक इस अध्ययन में 41 देशों के बच्चों के महामारी से पहले के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक व सामाजिक कौशल सम्बन्धी आँकड़ों का अध्ययन किया गया है.

इटली के रोम शहर में एक डॉक्टर एक अस्थायी बस्ती में छोटी लड़की की चिकित्सा जाँच कर रही हैं.
© UNICEF/Alessio Romenzi
इटली के रोम शहर में एक डॉक्टर एक अस्थायी बस्ती में छोटी लड़की की चिकित्सा जाँच कर रही हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक इन सब देशों में से, नैदरलैंड, डेनमार्क और नॉर्वे में बच्चों की स्थिति सबसे अच्छी है.

शोधकर्ताओं ने बाल कल्याण नीतियों सहित अर्थव्यवस्था, समाज और पर्यावरण जैसे अन्य कारकों के आधार पर देशों की रैंकिंग निर्धारित की, जिसमें नॉर्वे, आइसलैंड और फ़िनलैंड सर्वश्रेष्ठ स्थानों पर रहे. 

युवाओं में असन्तुष्टि 

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्षों में ये भी शामिल है कि अधिकाँश देशों में 80 प्रतिशत से भी कम बच्चे अपने जीवन से सन्तुष्ट हैं. सन्तुष्टि की सबसे कम दर तुर्की में जताई गई है, उसके बाद जापान और फिर ब्रिटेन का नम्बर आता है.

जिन परिवारों में बच्चों को ज़्यादा सहयोग नहीं मिलता या जिन्हें तंग किया जाता है, उनमें विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य दर "काफ़ी कम" पाई गई.

धनी देशों में 15-19 वर्ष की आयु के लोगों की मौत का मुख्य कारण आत्महत्या है. लिथुआनिया, न्यूज़ीलैंड और एस्टोनिया में आत्महत्या करने वाले युवाओं की संख्या सबसे अधिक है. 

मोटापे की दर में बढ़ोत्तरी

रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षों में अधिक वज़न और मोटापे की दर बढ़ी है. योरोपीय संघ और ओईसीडी देशों में हर तीन बच्चों में से एक बच्चे में मोटापे या अधिक वज़न की समस्या है. दक्षिणी योरोप में भी इन दरों में तेज़ी से वृद्धि हुई है.

शोधकर्ताओं ने पाया कि औसतन 40 प्रतिशत बच्चों में 15 साल की उम्र तक पढ़ने और गणित का बुनियादी कौशल नहीं होता है. बुल्गारिया, रोमानिया और चिली में बच्चों को सबसे कौशलहीन माना गया.

इसके अतिरिक्त, कम से कम पाँच में से एक बच्चे में नए दोस्त बनाने के सामाजिक कौशल के लिये ज़रूरी आत्मविश्वास की कमी पाई गई. इस क्षेत्र में चिली, जापान और आइसलैंड में बच्चों में आत्मविश्वास की सबसे ज़्यादा कमी मिली.

महामारी का ख़तरा

रिपोर्ट के मुताबिक हालाँकि बाल कल्याण में प्रगति हुई है, ख़ासतौर पर प्री-स्कूल में बच्चों की भर्ती की दर 95 प्रतिशत पहुँच गई है,  लेकिन साथ ही रिपोर्ट में ये आशंका जताई गई है कि कोविड-19 की वजह से ये "महत्वपूर्ण प्रगति" पलट सकती है.  

महामारी के कारण, अधिकाँश बच्चों को 100 दिनों से अधिक समय तक स्कूल से बाहर रहना पड़ा और युवाओं का जीवन कई तरह के तनावों से प्रभावित हुआ है - जैसेकि परिवार के सदस्यों और दोस्तों की मौत, स्वास्थ्य सेवा तक ख़राब पहुँच व समर्थन की कमी – साथ ही आर्थिक हानि.

स्पेन में, कोविड-19 तालाबन्दी के दौरान 7 महीने के लियोन और उनके माता-पिता अपने पड़ोसियों द्वारा आयोजित किये गए कठपुतली शो का आनन्द लेते हए.
© UNICEF/Javier López Tazón
स्पेन में, कोविड-19 तालाबन्दी के दौरान 7 महीने के लियोन और उनके माता-पिता अपने पड़ोसियों द्वारा आयोजित किये गए कठपुतली शो का आनन्द लेते हए.

यूनीसेफ़ ने सभी देशों में सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट की आशंका के मद्देनज़र चेतावनी दी है कि अगर सरकारें तात्कालिक कार्रवाई नहीं करती, तो बाल ग़रीबी दर बढ़ने का ख़तरा है.

गुनिल्ला ओल्सन ने कहा, "महामारी के आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक परिणाम जैसे-जैसे सामने आते जा रहे हैं, अगर संयोजित व ठोस प्रयास नहीं किये जाते हैं तो, बच्चों व उनके परिवारों और समाजों के कल्याण पर एक विनाशकारी प्रभाव बढ़ता जाएगा. लेकिन अगर सरकारें बच्चों की भलाई व रक्षा के लिये निर्णायक कार्रवाई करती हैं, तो ज़रूरी नहीं कि ये जोखिम वास्तविक बनें. "

परिवारों और बच्चों के कल्याण में सहयोग करें

इस निर्णायक कार्रवाई में आय असमानता और ग़रीबी को कम करना शामिल है ताकि सभी बच्चों के पास उन संसाधनों तक पहुँच हो, जिनकी उन्हें आवश्यकता है.

यूनीसेफ़ के उप कार्यकारी निदेशक, फ़ैयाज़ किंग ने कहा. "समय संकट का हो या शान्ति का, परिवारों को सुखी और स्वस्थ नागरिकों की अगली पीढ़ी की परवरिश करने के लिये सहायक सरकारों और कार्यस्थलों की आवश्यकता होती है. बच्चों के कल्याण में निवेश करने का मतलब सीधा हमारे भविष्य में निवेश है."

यूनीसेफ़ के शोधकर्ताओं ने बच्चों और युवाओं के लिये मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में "गम्भीर अन्तर" का हल निकालने और परिवार-अनुकूल नीतियों का विस्तार करने के लिये कहा- विशेष रूप से गुणवत्ता वाली बाल सेवाओं तक पहुँच, जो लचीली और सस्ती हो.

एक सिफारिश ये भी थी कि जिस बजट का हिस्सा बाल-कल्याण हो, वो मितव्ययिता के उपायों से सुरक्षित हों.

 

♦ समाचार अपडेट रोज़ाना सीधे अपने इनबॉक्स में पाने के लिये यहाँ किसी विषय को सब्सक्राइब करें
♦ अपनी मोबाइल डिवाइस में यूएन समाचार का ऐप डाउनलोड करें – आईफ़ोन iOS या एण्ड्रॉयड