दक्षिण एशिया में संक्रमण की जानलेवा लहर - स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी बोझ

25 मई 2021

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने चेतावनी जारी की है कि दक्षिण एशिया के देशों में कोरोनावायरस संक्रमण की जानलेवा लहर से जिस तरह के हालात पैदा हो रहे हैं, वैसा इस क्षेत्र में पहले कभी नहीं देखा गया. यूनीसेफ़ के मुताबिक कोरोनावायरस संकट के कारण बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर हुआ है, देशों की नाज़ुक स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी बोझ है और उनके ढह जाने की आशंका वास्तविक है.

दक्षिण एशिया की आबादी लगभग दो अरब है, और विश्व में बच्चों की कुल संख्या का एक चौथाई इस क्षेत्र में रहते हैं.

दुनिया भर के नए संक्रमण के कुल मामलों में से लगभग आधे इसी क्षेत्र में सामने आ रहे हैं. हर सेकेण्ड तीन नए संक्रमण की पुष्टि हो रही है और हर 17वें सेकेण्ड में एक व्यक्ति की मौत हो रही है.  

दक्षिण एशिया के लिये यूनीसेफ़ के क्षेत्रीय निदेशक जॉर्ज लारेया-अडजेई ने मंगलवार को काठमाण्डू से जानकारी देते हुए बताया कि कोविड-19 संक्रमण के मामलों में बढ़ोत्तरी का दायरा व स्तर, देशों द्वारा अपने नागरिकों को जीवनरक्षक उपचार उपलब्ध कराने की उनकी क्षमता को पीछे छोड़ रहा है.

मरीज़ों के परिजन अपनी जान जोखिम में डालकर ऑक्सीजन सिलेण्डर लेकर अस्पताल पहुँच रहे हैं ताकि अपने प्रियजनों को बचा सकें.  बुरी तरह थक चुके स्वास्थ्यकर्मी हर दिन 16 घण्टे काम कर रहे हैं और भारी दबाव के कारण हर मरीज़ पर पूरी तरह ध्यान देने की स्थिति में नहीं हैं. 

पिछले सप्ताह, भारत में एक दिन में साढ़े चार हज़ार से अधिक लोगों की जान गई है, जो कि महामारी के दौरान अब तक की सबसे बड़ी संख्या है.  

पड़ोसी देश नेपाल में कोविड परीक्षणों के पॉज़िटिव आने की दर 47 प्रतिशतक तक पहुँच गई है.

श्रीलंका में भी कोविड-19 संक्रमण के मामलों व मृतक संख्या में तेज़ बढ़ोत्तरी हो रही है और अस्पतालों में 88 फ़ीसदी बिस्तर इस्तेमाल में हैं. मालदीव में स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी बोझ है और सरकार को चिकित्सा केंद्रों में बिस्तरों की क्षमता बढ़ानी पड़ी है.

यूनीसेफ़ के वरिष्ठ अधिकारी ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, और भूटान में यही हालात पैदा हो सकते हैं.

बच्चों व माँओं पर असर

उन्होंने बताया कि वैश्विक महामारी की पहली लहर के दौरान, दक्षिण एशिया में सवा दो लाख से अधिक बच्चों और 11 हज़ार माताओं को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं में गम्भीर व्यवधान का सामना करना पड़ा था.  

संक्रमण की दूसरी लहर, पहली की तुलना में चार गुना अधिक है, और इस वजह से क्षेत्र में बाल और मातृत्व स्वास्थ्य के प्रति चिन्ता जताई गई है.

क्षेत्रीय निदेशक जॉर्ज लारेया-अडजेई ने कहा कि जानलेवा महामारी के इतनी तेज़ी से फैलने का बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी असर हुआ है.

“जिन दृश्यों को हमने टीवी स्क्रीन पर देखा है, दक्षिण एशिया में वही दृश्य बच्चों ने अपनी आँखों से देखे हैं. बच्चे अपने प्रियजनों की पीड़ा के प्रत्यक्षदर्शी बने हैं और अभिभावकों व देखभाल करने वालों की मौत होने के कारण अनाथ हो रहे हैं.”

महामारी पर जवाबी कार्रवाई के तहत, यूनीसेफ़, दक्षिण एशिया के महामारी प्रभावित देशों में, ऑक्सीजन कॉण्सनट्रेटर, परीक्षण किटें,

ऑक्सीमीटर और अन्य महत्वपूर्ण उपकरण सहित बेहद ज़रूरी जीवनरक्षक आपूर्ति भेजने के लिये प्रयासरत है.

सहायता की दरकार

साथ ही, ऑक्सीजन, परीक्षण किटों, निजी बचाव सामग्री सहित संक्रमण की रोकथाम के लिये अन्य सामग्री के इन्तज़ाम के लिये संगठन ने 16 करोड़ डॉलर की अपील जारी की है.

“इस आपूर्ति से ना सिर्फ़ आज ज़िन्दगियों को बचाया जा सकेगा, बल्कि इनसे स्वास्थ्य प्रणालियों को पहले से मज़बूत बनाने में मदद मिलेगी ताकि महामारी की अगली लहरों का सामना करने के लिये तैयारी की जा सके.”

यूनीसेफ़ के क्षेत्रीय निदेशक ने वैक्सीन के विषमतापूर्ण वितरण पर भी क्षोभ जताया और कहा कि अभी क्षेत्र में 21 करोड़ ख़ुराकों को ही दिया गया है.

कुल आबादी का महज़ 2.6 प्रतिशत के टीकाकरण के काम को पूरा किया जा सका है, और उच्च जोखिम झेल रहे बड़ी संख्या में लोगों को अभी टीके नहीं लग पाए हैं.

उन्होंने आगाह किया कि इन हालात में, वैक्सीन राष्ट्रवाद के अन्त से लेकर स्वैच्छिक लाइसेंस मुहैया कराए जाने, और वैक्सीन की अतिरिक्त ख़ुराकों को दान देने तक, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा लिया गया हर फ़ैसला, मौजूदा परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है.

इन फ़ैसलों से या तो लोगों के जीवन की सुरक्षा होगी या फिर ख़तरा और गहरा जाएगा. इसके मद्देनज़र, उन्होंने वैक्सीन, निदान, और उपचार को सर्वजन के लिये उपलब्ध कराए जाने पर ज़ोर दिया है.

 

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