लेबनान के संकट ने घरेलू कामकाजियों की तकलीफ़ें बढ़ाई हैं

लेबनान की राजधानी बेरूत में, घरेलू कामकाजी जिनमें ज़्यादातर अन्य देशों से आए आप्रवासी और महिलाएँ हैं.
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लेबनान की राजधानी बेरूत में, घरेलू कामकाजी जिनमें ज़्यादातर अन्य देशों से आए आप्रवासी और महिलाएँ हैं.

लेबनान के संकट ने घरेलू कामकाजियों की तकलीफ़ें बढ़ाई हैं

मानवाधिकार

बीस वर्ष पहले, नस्लवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करने के लिये, दक्षिण अफ़्रीका के डरबन में अपनाए गए कार्रवाई कार्यक्रम व घोषणा-पत्र (DDPA) के दो दशक गुज़र जाने के बाद भी, नस्लभेद अपने सभी रूपों में आज भी मौजूद है, बल्कि कुछ स्थानों पर तो ये और बदतर हुआ है. संक्षिप्त में इसे डरबन घोषणा-पत्र कहा जाता है.

लेबनान में घरेलू कामकाज करने वाली विदेशी महिलाओं को अनेक तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इनमें ख़ुद का वजूद बनाए रखना ही सबसे प्रमुख चुनौती है, विशेष रूप में, जब हाल के आर्थिक संकट के परिणामस्वरूप, उनका रोज़गार ख़त्म हो गया.

उन्हें कफ़ाला प्रथा या प्रायोजित किये जाने की प्रणाली की कठिनाइयों का लगातार सामना करना पड़ता है जिनमें उन्हें अपने नियोक्ता की दया या रहमो-करम पर निर्भर रहना पड़ता है.

बुनियादी अधिकारों से भी वंचित

इस श्रेणी के कामगारों को हमेशा ही उनके बहुत ही बुनियादी अधिकारों से वंचित किया गया है और उन्हें अनेक तरह के लैंगिक और वर्ग आधारित भेदभाव का भी निशाना बनाया गया है.

ये कामगार ऐसे हालात में रहने को मजबूर होते हैं जहाँ उनके ज़्यादातर बुनियादी अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता है.

मसलन, दिन भर में कुछ निर्धारित घण्टों के लिये काम करना.

उन्हें पासपोर्ट जैसे अपने अति महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी अपने पास रखने की इजाज़त नहीं दी जाती है, उन्हें आराम करने या सुस्ताने और आवागन की भी आज़ादी नहीं होती है, अपने दोस्तों व परिजनों के साथ बातचीत करने और अपनी निजी आज़ादी का आनन्द लेने का भी मौक़ा नहीं दिया जाता है.

मानवाधिकार संगठनों के ताज़ा आँकड़े दर्शाते हैं कि लेबनान में, घरेलू कामकाज करने वाले लगभग दो लाख 50 हज़ार लोग रहते हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की है जिनके पास कामकाजी वीज़ा होता है, और इनमें ज़्यादातर इथियोपिया, फ़िलिपीन्स, बांग्लादेश और श्रीलंका से होती हैं.

कफ़ाला व्यवस्था के कारण शोषण और दुर्व्यवहार

लेबनान में घरेलू कामकाज करने वाले आप्रवासी मज़दूरों को कफ़ाला प्रथा से बचाने के लिये प्रयासरत संगठनों के कामकाज की एक झलक
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लेबनान में घरेलू कामकाज करने वाले आप्रवासी मज़दूरों को कफ़ाला प्रथा से बचाने के लिये प्रयासरत संगठनों के कामकाज की एक झलक

लेबनान में आप्रवासी कामगारों के अधिकारों के लिये काम करने वाले बहुत से सिविल सोसायटी संगठनों, कार्यकर्ताओं व मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, कफ़ाला व्यवस्था के नकारात्मक प्रभाव बहुत स्पष्ट नज़र आते हैं.

ध्यान रहे कि इस व्यवस्था में रोज़गार देने वाली कम्पनियाँ या व्यक्ति, आप्रवासियों को अपने यहाँ कामकाजी वीज़ा देकर बुलाते हैं और आप्रवासियों के पासपोर्ट वग़ैरा अपने क़ब्ज़े में रख लेते हैं.

ऐसा करने से, इन आप्रवासियों की ज़िन्दगियों पर नियोक्ताओं का लगभग पूरा नियंत्रण हो जाता है. इससे, ये आप्रवासी कामकाजी जन, अनेक तरह के शोषण व दुर्व्यवहार के लिये बहुत कमज़ोर हालात में दाख़िल हो जाते हैं. और ये सब होता है मामूली मेहनताने या वेतन के लिये जोकि प्रतिमाह 150 डॉलर से लेकर 400 डॉलर के दरम्यान होता है.

मानवाधिकार पैरोकारों के सूत्रों के अनुसार, कफ़ाला व्यवस्था के अन्तर्गत, कोई आप्रवासी कामकाजी व्यक्ति, अपने नियोक्ता की सहमति के बिना, अपना कॉण्ट्रैक्ट ख़त्म नहीं कर सकते क्योंकि वो नियोक्ता, भर्ती करने वाली एजेंसियों को दो हज़ार से लेकर पाँच हज़ार डॉलर के दरम्यान राशि का भुगतान करके, आप्रवासी कामगारों का वीज़ा स्वीकृत करवाते हैं यानि उन्हें प्रायोजित करते हैं.

मौजूदा क़ानून, नियोक्ताओं को, आप्रवासी कामगारों के पासपोर्ट ज़ब्त करने से नहीं रोकते हैं. अगर कोई आप्रवासी कामगार अपने नियोक्ता के स्थान से भाग जाते हैं तो देश में उनका निवास अवैध हो जाता है.

इथियोपियाई कामगार: वो हमारे साथ ऐसा बर्ताव करते हैं, जैसे हम कोई मानव उपभोग वस्तु हों

एक इथियोपियाई कामगार अदानेश वोर्को बेरूत के एक घर में काम करती हैं.

उनका कहना है, “भर्ती करने वाली एजेंसियाँ और नियोक्ता, हमारे साथ ऐसा बर्ताव करते हैं, जैसे, हम कोई मानव उपभोग की वस्तु हैं. कभी-कभी तो मेरे साथ मार-पीट की जाती है और मुझे भोजन खाने से भी रोका जाता है. मैं अपने नियोक्ता के साथ हुए कॉन्ट्रैक्ट की वजह से, कामकाज वाले घर के अलावा, कहीं और नहीं जा सकती, और ना ही अपने देश वापिस जा सकती हूँ.”

वोर्को के अनुसार, “मैडम मुझसे कहती हैं - मैंने तुम्हें ख़रीदा है. मुझे दो हज़ार डॉलर अदा करो, उसके बाद तुम जहाँ चाहे जा सकती हो.”

फ़िलिपीन्स की एक कामगार: मेरे पति ने मुझे छोड़ दिया और मेरा पासपोर्ट मेरे प्रायोजक के पास है.

फ़िलिपीन्स की एक 30 वर्षीय कामगार मारिया, अपने तीन बच्चों के साथ, अपने घर को वापिस लौटते हुए ज़ारो-क़तार रोती हैं. उनके सबसे बड़े बच्चे की उम्र छह वर्ष से ज़्यादा नहीं है.

जब उनसे उनके कामकाज की स्थिति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वो बेरूत के मार एलियास इलाक़े में एक महिला के लिये काम करती हैं, उनकी तनख़्वाह बहुत ही कम है और उन्हें लेबनानी मुद्रा – लीरा में भुगतान किया जाता है, जिसमें उनके छोटे से परिवार का गुज़ारा बड़ी मुश्किल से हो पाता है.

उन्होंने बताया कि उन्होंने एक लेबनानी व्यक्ति से विवाह किया था, मगर उसने उन्हें छोड़ दिया और उनके तीन बच्चों का पंजीकरण कराने से भी इनकार कर दिया. वो अपने बच्चों का पंजीकरण इसलिये नहीं करा पाईं हैं क्योंकि उनका पासपोर्ट उनके प्रायोजक ने अपने क़ब्ज़े में रखा हुआ है.

यूएन वीमैन: हम कफ़ाला प्रथा का उन्मूलन करने के लिये प्रयासरत हैं.

लेबनान में यूएन वीमैन संगठन की प्रतिनिधि और देश के लिये कार्यक्रम मैनेजर रैचेल डोर-वीक्स भी कफ़ाला प्रथा को ख़त्म कराने के लिये प्रयासरत हैं.
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लेबनान में यूएन वीमैन संगठन की प्रतिनिधि और देश के लिये कार्यक्रम मैनेजर रैचेल डोर-वीक्स भी कफ़ाला प्रथा को ख़त्म कराने के लिये प्रयासरत हैं.

लेबनान में यूएन वीमैन के कार्यालय की निदेशक रेचेल डोर-वीक्स ने पुष्टि की है कि ये संगठन, कफ़ाला प्रथा का उन्मूलन करने के लिये मुस्तैदी से काम कर रहा है.

ध्यान रहे कि ये प्रथा घरेलू कामकाज करने वाले कामकाजियों को नियोक्ताओं के साथ बान्ध देती है और ये सभी पुरुष व महिला कामकाजी, देश के श्रम क़ानून के लाभों से वंचित रहते हैं.

रेचेल डोर-वीक्स के अनुसार, इन आप्रवासी कामगारों को बहुत कम संरक्षण हासिल होता है जिसके कारण, वो तमाम तरह के शोषण व दुर्व्यवहार के लिये कमज़ोर व नाज़ुक हालात वाले बन जाते हैं.

इसमें यौन शोषण, हिंसा, गाली-गलौज और आर्थिक शोषण भी शामिल हैं.

उन्होंने बताया का आप्रवासी घरेलू कामकाजियों को बहुत कम मेहनताना मिलता है, और कभी-कभी तो उन्हें मेहनताना बिल्कुल ही नहीं दिया जाता है, विशेष रूप में, आर्थिक मन्दी शुरू होने के बाद से. उन्हें उनकी छुट्टियाँ भी नहीं मिलती हैं.

यूएन वीमैन की प्रतिनिधि ने बताया कि ये संगठन देश में ऐसे अनेक मानवाधिकार संगठनों व संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहा है जो कफ़ाला प्रथा का ख़ात्मा करने के लिये प्रयासरत हैं.

लेबनान में आप्रवासी घरेलू कामकाजी लोगों की स्थिति पर एक विस्तृत रिपोर्ट यहाँ देखी जा सकती है.