भारत: कोविड-19 से निपटने के उपायों और वैक्सीन उत्पादन का विस्तार ज़रूरी

5 मई 2021

भारत में कोविड-19 संक्रमण के मामलों में आई तेज़ी से भयावह स्थिति पैदा हो गई है. देश में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की प्रतिनिधि, डॉक्टर यासमीन अली हक़ ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में कहा कि इस संकट के दौरान, सबसे अहम ज़रूरतों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, टीकाकरण जारी रखना होगा. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वैश्विक महामारी पर जवाबी कार्रवाई के तहत सभी देशों को एक साथ मिलकर, वैक्सीन उत्पादन का दायरा व स्तर बढ़ाने के लिये रणनीति बनानी चाहिए.

यूएन न्यूज़: भारत अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है. ऐसे में, जब देश कोविड-19 संक्रमणों की दूसरी लहर से लड़ रहा है, यूनीसेफ़ ने भारत की मदद के लिये क्या क़दम उठाए हैं?

डॉक्टर यासमीन अली हक़: यह संकट, यह महामारी एक साल से अधिक समय से चल रही है. पिछले साल हम, भारत सरकार के साथ मिलकर, आवश्यक सन्देशों को लोगों तक पहुँचाने में लगे थे, जिनमें हाथ धोने, मास्क पहनना और सामाजिक दूरी बनाये रखने जैसे सन्देश शामिल थे.

इस दौरान, भागीदारों के साथ मिलकर समुदायों तक पहुँचना, संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण प्रयासों में सुधार के लिये स्वास्थ्य केंद्रों के साथ काम करना पिछले साल महत्वपूर्ण रहा है.

उस समय दूरस्थ शिक्षा  (Remote learning) की शुरुआत हो रही थी. आप जानते ही हैं कि एक साल से बच्चे स्कूल नहीं गए हैं. फिर जैसे ही स्कूल में सीनियर ग्रेड दोबारा शुरू हो रहे थे, स्कूल में परीक्षाएँ फिर से शुरू होने को थीं, जीवन सामान्य होने लगा था कि दूसरी लहर ने हम पर प्रहार किया.

इसलिये फ़िलहाल जितने हाथ, मदद के लिये साथ आ सकें, उतना अच्छा है. ज़रूरत है सबसे अहम आवश्यकताओँ पर ध्यान केन्द्रित करने की.

सबसे पहली आवश्यकता तो ऑक्सीजन उपकरणों की है - ऑक्सीजन कॉन्सनट्रेटर्स और ऑक्सीजन का उत्पादन करने वाले संयंत्र. इस पर हमने पिछले साल ही काम शुरू कर दिया था, लेकिन इस वर्ष हम इसे बहुत व्यापक स्तर पर कर रहे हैं, क्योंकि यह समय की आवश्यकता है.

इसके साथ, हम RT-PCR परीक्षण किटें भी मुहैया करा रहे हैं. हम ज़रूरी आपातकालीन उपकरण उपलब्ध कराने के लिये, सरकारी विभागों, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद व राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.

इसके अलावा, जैसाकि आप जानते हैं, हम लोगों तक कोविड वैक्सीन पहुँचाने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं. पिछले वर्ष की तीसरी तिमाही में, हमने भारत के लिये कोल्ड चेन उपकरणों के विस्तार की तैयारी पर काम करना शुरू कर दिया था.

यूनीसेफ़ और यूएन स्वास्थ्य एजेंसी, वर्षों से टीकाकरण कार्यक्रमों में सरकार के साथ भागीदार रहे हैं.

वयस्कों के टीकाकरण के वैक्सीन प्रोटोकॉल हेतु कोल्ड चेन को अनुकूलित किया जाना था और हमने बच्चों के टीकाकरण के अपने अनुभवों से सबक लेते हुए यह जानने की कोशिश की कि वैक्सीन के प्रति झिझक या वैक्सीन सम्बन्धी उत्सुकता जैसी किस तरह की अड़चनों की सम्भावनाएँ हैं.

टीकाकरण अभियान की शुरूआत करने में हमने कड़ी मेहनत की और निश्चित रूप से अब हम लगभग 16 करोड़ लोगों को वैक्सीन ख़ुराकें दे चुके हैं. यह एक बड़ी संख्या है और इसे जारी रखना होगा.

भारत के गुवाहाटी शहर में कोविड-19 टीकाकरण के लिये स्वास्थ्य केन्द्र के बाहर इन्तज़ार कर रहे लोग.
© UNICEF/Biju Boro
भारत के गुवाहाटी शहर में कोविड-19 टीकाकरण के लिये स्वास्थ्य केन्द्र के बाहर इन्तज़ार कर रहे लोग.

यूएन न्यूज़: भारत में दूसरी लहर से क्या देश में टीकाकरण के प्रयासों पर असर पड़ेगा? क्या कोविड के इस भीषण प्रकोप से उपजे नए परिदृश्य में, भारत इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण करने में सक्षम है?

डॉक्टर यासमीन अली हक़: दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो आपात स्थिति में टीकाकरण करवाने के लिये तैयार हो. भारत में लगभग 110 दिनों में 16 करोड़ लोगों का टीकाकरण किया गया है, जो शायद दुनिया में सबसे तेज़ टीकाकरण अभियान होगा.

तो प्रबन्धन तंत्र की व्यवस्था की बात हो, वैक्सीन लगाने वाले लोगों की या उनकी रिपोर्टिंग की व्यवस्था की – इन सबकी तैयारी पहले से है. चुनौती है तो संख्या की, भारत के विशालकाय आकार की, दूर-दूर तक फैले कठिन इलाक़ों तक इसे पहुँचाने की, जो एक आसान काम नहीं है.

लेकिन मेरा मानना है कि अगर यह काम कहीं हो सकता है, तो वो इस देश में.

यूएन न्यूज़: क्या आपको लगता है कि इस तरह की स्थिति से निपटने के लिये टीकाकरण ही एकमात्र उपाय है? कोविड मामलों के इतने बड़े पैमाने पर फैलने के मद्देनजर, अब सभी वयस्कों का टीकाकरण करना कितना अहम हो गया है?

डॉक्टर यासमीन अली हक़: टीकाकरण बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन वायरस के फैलाव को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं है. वायरस उत्परिवर्तन कर रहा है और वायरस का संक्रमण अभी भी हवा में बूंदों के माध्यम से फैल रहा है.

निकटता, पास-पास बैठने से, यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक तेजी से संचारण करता है जोकि बेहद ख़तरनाक है. मेरा मानना यह है कि हमें टीकाकरण करने वाले लोगों की संख्या बढ़ाना जारी रखते हुए, सतर्कता भी बरतते रहना होगा.

मेरा अनुमान है कि हमें 3Ws वाले कोविड-उचित व्यवहार का आने वाले कई वर्षों तक पालन करना होगा. (मास्क पहनना, हाथ धोना, सामाजिक दूरी बरतना)

यूएन न्यूज़: भारत दुनिया में वैक्सीन का सबसे बड़ा उत्पादक भी है और संयुक्त राष्ट्र की कोवैक्स सुविधा के तहत उदारतापूर्वक अन्य देशों को कोविड टीके भी मुहैया करा रहा था. वर्तमान परिदृश्य में, जब भारत को अपने लोगों के लिये ही अधिक टीकों की आवश्यकता है, इसका वैश्विक टीकाकरण प्रयासों, विशेष रूप से कोवैक्स पर क्या असर पड़ सकता है?

डॉक्टर यासमीन अली हक़: यह एक ऐसी चुनौती है जिसकासामना पूरी दुनिया कर रही है. दुनिया अभी भी ऐसे कई टीकों के उत्पादन के लिये भारत पर निर्भर है, जो बच्चों में बीमारियों की रोकथाम करती है.

साथ ही, हमारे पास यह नया टीका भी है, जो भारत में ही विकसित किया गया है. निश्चित रूप से, दुनिया वैक्सीन उत्पादन बढ़ाने में भारत की मदद के लिये आगे आ रही है, ये मुश्किल फैसले हैं जिन्हें सरकारों को लेना पड़ रहा है.

इसके मायने यह भी हैं कि हम एक वैश्विक गाँव में रहते हैं और हमें यह देखने की आवश्यकता है कि हम अधिक देशों में टीकों के उत्पादन का विस्तार किस तरह करें.

ताकि जब दुनिया को इस पैमाने पर उसकी ज़रूरत हो, तो अपनी सीमाओं की रक्षा करने के बजाय हम लॉजिस्टिक को बढ़ाने के बारे में सोचें, ताकि जिन देशों के पास टीको का उत्पादन करने की क्षमता नहीं है, वे पीछे ना रह जाएँ.

भारत के गुजरात में स्वच्छता और कोविड महामारी की रोकथाम के लिये एक सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, एक बच्चे को सही ढंग से हाथ धोना सिखाते हुए.
UNICEF/Panjwani
भारत के गुजरात में स्वच्छता और कोविड महामारी की रोकथाम के लिये एक सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, एक बच्चे को सही ढंग से हाथ धोना सिखाते हुए.

यूएन न्यूज़: ऐसे समय में, जब भारत की ज़रूरतें बहुत बढ़ गई हैं, उन ज़रूरतों को पूरा करने के लिये, यूनीसेफ़ को और क्या करने की आवश्यकता है?

डॉक्टर यासमीन अली हक़: बात यह है कि महामारी के प्रभाव कई वर्षों तक हमारे साथ रहने वाले हैं. सबसे पहले तो, महामारी अभी ख़त्म नहीं हुई है. दूसरे, हम पहले से ही बच्चों और सबसे ग़रीब व हाशिए पर धकेले हुए समूहों पर इसका असर देख रहे हैं.

बच्चे अपनी शिक्षा छूटने के ख़तरे का सामना कर रहे हैं. एक आदर्श स्थिति में, हमने अनुमान लगाया कि लगभग 50 प्रतिशत बच्चों की दूरस्थ शिक्षा तक पहुँच है, जो कि मुख्य रूप से भारत में स्कूल जाने की उम्र के 30 करोड़ बच्चों का 50 प्रतिशत है.

इसका अर्थ यह भी है कि चूँकि परिवारों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है, कामकाज प्रभावित हो रहा है, हमें ऐसी कहानियाँ सुनने को मिल रही हैं, जहाँ इससे निपटने के लिये परिवार नकारात्मक तरीक़े अपना रहे हैं - जैसे कि बाल मज़दूरी.

विशेष रूप से लड़कियों की जल्दी शादी की जा रही है और यहाँ तक कि बच्चों की अवैध तस्करी जैसी आपराधिक गतिविधियाँ भी पनपने लगी हैं.

इन परिस्थितियों में हम देखते हैं कि माता-पिता के तनाव का असर बच्चों पर हो रहा है और परिणाम स्वरूप हिंसा बढ़ रही है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन मनो-सामादिक आघातों का सामना बच्चे कर रहे हैं, उनसे निपटा जाना बहुत ज़रूरी है. लम्बी अवधि के परिणामों के लिये भी तैयार रहना होगा क्योंकि मीडिया में हम देख रहे हैं कि इतनी संख्या में लोग मर रहे हैं, 

इस वजह से बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं, जो माता-पिता के बिना जीने को मजबूर हो गए हैं. उनके लिये किस तरह की व्यवस्था हो - वैकल्पिक देखभाल व्यवस्था – या जो भी उपाय किये जाएँ, उसके लिये निवेश की बहुत ज़रूरत होगी.

इसलिये जैसे-जैसे विश्व अर्थव्यवस्था पर प्रहार हो रहा है, निवेश की अधिक आवश्यकता होने वाली है. और यहीं हम गैर-पारम्परिक दाताओं पर भरोसा कर रहे हैं.

मुझे लगता है कि हमने जिस तरह समुदायों को एक साथ आते देखा है, जिस तरह उन्हें सार्वजनिक दान करते हुए देखा है, वह अभूतपूर्व है.

मुझे लगता है कि हमें उन सेवाओं में निवेश की आवश्यकता है जो बच्चों के स्वस्थ रहने, उनके फलने-फूलने और उस आघात से उबरने के लिये ज़रूरी है, जिनका वो इस महामारी में सामना कर रहे हैं.

 

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