पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के बाहर होने पर खेद

4 नवंबर 2020

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सचिवालय (UNFCCC) ने अपना ये संकल्प दोहराया है कि वो वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर क़ाबू पाने के लिये हुई ऐतिहासिक सन्धि के अनुरूप संयुक्त राज्य अमेरिका में और अन्य स्थानों पर सक्रिय अपने साझीदारों के साथ मिलकर जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाने का काम करता रहेगा. 

ध्यान रहे कि संयुक्त राज्य अमेरिका वर्ष 2015 में जलवायु परिवर्तन पर हुए पेरिस समझौते से औपचारिक रूप से अलग हो गया है. इस आशय का निर्णय तीन वर्ष पहले घोषित किया गया था.

जलवायु परिवर्तन सचिवालय ने चिली, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन के साथ एक संयुक्त वक्तव्य जारी करके कहा है, “हमें ये बताते हुए खेद है कि अमेरिका का पेरिस समझौते से अलग होने का निर्णय आज औपचारिक रूप से प्रभावी हो गया है.”

पेरिस समझौते के तहत देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और वैश्विक गर्मी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिये कार्रवाई करने का संकल्प व्यक्त किया है.

यूएन प्रवक्ता स्तेफ़ान दुजैरिक ने न्यूयॉर्क में नियमित प्रैस वार्ता में पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा कि “एक मज़बूत व सजीव पेरिस समझौते के लिये हमारा समर्थन व उसमें भरोसा रखने की ज़रूरत में कोई बदलाव नहीं हुआ है”.

बाहर होने के नियम

पेरिस समझौता किसी भी पक्ष या देश को उसके शामिल होने की तारीख़ से तीन साल के बाद बाहर होने का विकल्प देता है. 

बाहर होने की नीयत की आधिकारिक सूचना मिलने के एक वर्ष बाद वापसी प्रभावी हो जाएगी.

संयुक्त राज्य अमेरिका ने राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन के दौरान 3 नवम्बर 2016 को पेरिस समझौते को स्वीकार किया था, और उसके दो महीने बाद ये सम्बन्ध प्रभावी हो गया था.

अगस्त, 2017 में, राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प प्रशासन ने यूएन महासचिव को औपचारिक रूप से सूचित किया था कि उनका देश जिस तारीख़ को पेरिस समझौते से बाहर होने के लिये योग्य हो जाए, उसी दिन इस समझौते से बाहर होना चाहेगा.

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय द्वारा जारी वक्तव्य में कहा गया है कि उनके लिये  पृथ्वी ग्रह की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दुनिया भर के लोगों को जलवायु परिवर्तन के जोखिम से बचाने के लिये काम करने से बड़ी कोई और ज़िम्मेदारी नहीं है.

वक्तव्य में कहा गया है, “विज्ञान बिल्कुल स्पष्ट है कि हमें वैश्विक तापमान वृद्धि के प्रभावों को कम करने और सभी के लिये एक ज़्यादा हरित, ज़्यादा लचीला व मज़बूत भविष्य सुनिश्चित करने के लिये एक साथ मिलकर तत्काल कार्रवाई तेज़ करनी होगी. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये पेरिस समझौता बिल्कुल सटीक ढाँचा मुहैया कराता है.”

जलवायु कार्रवाई सम्मेलन

फ्रांस की राजधानी पेरिस में दिसम्बर 2015 में 190 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधियों ने पेरिस जलवायु समझौते को अपनाया था, और दिसम्बर 2020 में इस ऐतिहासिक उपलब्धि को पाँच वर्ष पूरे हो रहे हैं.

यूएन प्रवक्ता स्तेफ़ान दुजैरिक ने बताया है कि संयुक्त राष्ट्र 12 दिसम्बर को इस समझौते की 5वीं वर्षगाँठ के अवसर पर एक वर्चुअल महत्वाकाँक्षा सम्मेलन की संयुक्त मेज़बानी करेगा.

उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि पेरिस में व्यक्त किये गए संकल्प पूरी तरह से दुनिया भर में पूरे नहीं किये गए हैं. हम ये भी जानते हैं कि वो संकल्प, विज्ञान के बताए तथ्यों के आधार पर, बढ़ाने की ज़रूरत है.”

हाल ही में, दो प्रमुख औद्योगिक देशों – जापान और दक्षिण कोरिया ने वर्ष 2050 तक कार्बन शून्यता कि स्थिति हासिल करने का संकल्प घोषित किया है, जिसका यूएन महासचिव ने स्वागत किया है.

प्रवक्ता ने उम्मीद जताई कि इससे अन्य देश भी कुछ सबक हासिल करेंगे.

इरादा पक्का है

संयुक्त राष्ट्र को इस वर्ष होने वाले वैश्विक जलवायु परिवर्तन सम्मेलन – कॉप26 को कोविड-19 महामारी के कारण स्थगित करना पड़ा है, जोकि मूल रूप से स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो में होने वाला था.

अब ये सम्मेलन नवम्बर, 2021 में ग्लासगो में ही होगा.

इस दौरान संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन सचिवालय (UNFCCC) और उसके साझीदार वृहद जलवायु कार्रवाई को समर्थन देना जारी रखेंगे.

उनके संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है, “ग्लासगो में होने वाले कॉप26 पर नज़र टिकाए हुए, हम, संयुक्त राज्य अमेरिका और विश्व भर में अन्य पक्षों के साथ मिलकर जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाते रहेंगे. साथ ही दस्तख़त करने वाले तमाम देशों द्वारा पेरिस समझौते पर पूरी तरह से अमल करने के लिये काम करते रहेंगे.”

 

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