रोहिंज्या शरणार्थी, 3 साल बाद, पहले से कहीं ज़्यादा असहाय

25 अगस्त 2020

संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों का कहना है कि तीन साल पहले म्याँमार में रहने वाले रोहिंज्या लोगों को उनके घरों से बाहर निकाल दिया गया था जिसके बाद उन्हें सीमा पार बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में पनाह लेनी पड़ी थी. रोहिंज्या शरणार्थी संकट के तीन वर्ष गुज़र जाने के बाद भी बेघर रोहिंज्या महिलाएँ, पुरुष और बच्चे पहले से कहीं ज़्यादा असहाय हालात में हैं.

संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) का कहना है कि लगभग सभी शरणार्थी जीवित रहने के लिये खाद्य सहायता पर निर्भर हैं.

यूएन खाद्य एजेंसी की प्रवक्ता एलिज़ाबेथ बिर्स ने मंगलवार को मीडिया वार्ता में कहा, “विश्व खाद्य कार्यक्रम की सहायता के दायरे से बाहर वाले शिविरों में खाद्यान्न की उपलब्धता कम हो रही है और चीज़ों के दाम भी बढ़ रहे हैं.”

प्रवक्ता ने बताया कि कोविड-19 महामारी को रोकने के प्रयासों के तहत लागू हुई तालाबन्दी की वजह से खाद्य पदार्थों की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है जिसके कारण ताज़ा खाद्य पदार्थों की उपलब्धता भी प्रभावित हुई है.

कोविड-19 महामारी के कारण विश्व खाद्य कार्यक्रम का ई-वाउचर कार्यक्रम भी प्रभावित हुआ है जिसके तहत 88 प्रतिशत शरणार्थियों को खाद्य सहायता मुहैया कराई जाती है.

इस कार्यक्रम के तहत सभी शरणार्थियों तक वर्ष 2020 की पहली छमाही में ही खाद्य सहायता पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन कोविड-19 के कारण अब ये लक्ष्य साल के आख़िर तक हासिल करने के प्रयास किये जा रहे हैं.

प्रवक्ता ने बताया कि उन अस्थाई खाद्य सामग्री वितरण केन्द्रों पर कोविड-19 का ख़तरे कम करने के उपाय किये गए हैं जहाँ से लगभग 12 प्रतिशत शरणार्थियों को चावल, दालें और तेल वितरित किया जाता है.

प्रवक्ता ने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से सहायता प्रयास जारी रखने का आग्रह किया है, क्योंकि इन सहायता प्रयासों के बिना हालात और भी ज़्यादा तेज़ी से ख़राब हो सकते हैं.

प्रवक्ता एलिज़ाबेथ बिर्स ने कहा, “अन्तरराष्ट्रीय समुदाय रोहिंज्या समुदाय की मदद करने के प्रयासों से मुँह नहीं मोड़ना चाहिये.”

विनाशकारी हो सकती है कोविड-19 महामारी

ऐसी आशंकाएँ व्यक्ति की गई हैं कि बांग्लादेश के दक्षिणी हिस्सा में स्थित कॉक्सेज़ बाज़ार में बेक़ाबू कोविड-19 महामारी फैलने के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं. ध्यान रहे कि ये शरणार्थी शिविर दुनिया में सबसे बड़ा और भीड़ वाला है.

केवल 13 किलोमीटर वर्ग किलोमीटर इलाक़े में कई लाख लोग रह रहे हैं और ऐसे में कोविड-19 से बचने के लिये एक प्रभावी उपाय - सामाजिक दूरी बनाए रखना लगभग असम्भव नज़र आने वाला लक्ष्य है. 

कोविड-19 के अलावा लगातार होती बारिश और ख़तरनाक मौसन ने भी चुनौतियों में इज़ाफ़ा किया है. मानवीय सहायता ख़बरों के अनुसार, वर्ष 2020 के दौरान मॉनसून की भारी बारिश के कारण एक लाख से भी ज़्यादा शरणार्थी प्रभावित हुए हैं, इस बारिश ने बहुत से आवासीय ठिकाने तबाह कर दिये और फ़सलों को भी बारिश का पानी बहा ले गया.

शिक्षण में बाधा

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़ के अनुसार कोविड-19 के कारण रोहिंज्या शरणार्थी बच्चों की ज़िन्दगी भी गम्भीर रूप से प्रभावित हुई है. शरणार्थी शिविर में शिक्षण केन्द्र मार्च के बाद से ही बन्द हैं, बांग्लादेश के अन्य हिस्सों में भी शिक्षण केन्द्र बन्द हैं. इस कारण लगभग तीन लाख बच्चे और किशोर सीखने के अवसरों से वंचित हैं.

© UNICEF/Roger LeMoyne
बांग्लादेश के कॉक्सेज़ बाज़ार के शरणार्थी शिविर में पढ़ाई करती कुछ बच्चियाँ.

दक्षिण एशिया के लिये यूनीसेफ़ की क्षेत्रीय निदेशक जीन गॉफ़ का कहना है, “रोहिंज्या शरणार्थी बच्चों को अपने बेहतर भविष्य के लिये अपना ज्ञान और कौशल विकसित करने के लिये अवसरों की ज़रूरत है. ये ज्ञान और कौशल उन्हें शान्ति व स्थिरता में योगदान करने का मौक़ा मुहैया कराएंगे.”

यूनीसेफ़ और उसके साझीदार संगठन बच्चों को उनके आवास स्थानों पर ही सिखाने के प्रयासों में मदद कर रहे हैं, इन प्रयासों में अभिभावकों और देखभाल करने वाले लोगों को भी शामिल किया जा रहा है. अलबत्ता अनेक तरह की चुनौतियाँ बरक़रार हैं, जिनमें एक ये भी है कि बहुत से अभिभावक लिख-पढ़ नहीं सकते.

असाधारण मज़बूती

असाधारण चुनौतीपूर्ण व कठिन परिस्थितियों के बावजूद, शरणार्थी आबादी कोविड-19 महामारी के ख़तरे का मुक़ाबला करने के प्रयासों में बढ़-चढ़कर योगदान कर रही है.

यूनीसेफ़ का कहना है कि कोरोनावायरस का फैलान रोकने के प्रयासों के तहत शरणार्थी शिविर में मानवीय सहायताकर्मियों की संख्या भी बहुत सीमित कर दी गई है.

इस कारण मानवीय सहायता संगठनों और यूएन एजेंसियों ने ज़रूरी सेवाएँ मुहैया कराने और कोविड-19 महामारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों में नए तरीक़े खोजे हैं.

UNICEF/UN0120426/Brown
बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार के एक शिविर में रोहिंज्या शरणार्थी

इन प्रयासों में रोहिंज्या स्वेच्छाकर्मियों और बांग्लादेश के नागरिकों का सहयोग बहुत अहम रहा है.

मसलन, जुलाई में, यूनीसेफ़ और उसके साझीदार संगठनों ने विटामिन-ए की अतिरिक्त ख़ुराकों वाली गोलियाँ बाँटने के लिये दरवाज़े-दरवाज़े जाकर पहुँचाईं. रोहिंज्या स्वेच्छाकर्मियों ने छह महीन से लेकर 5 वर्ष तक की उम्र वाले लगभग एक लाख 54 हज़ार बच्चों तक पहुँचने में अहम मदद की.

उस अभियान में लक्ष्य की संख्या के लगभग 97 प्रतिशत बच्चों तक पहुँच बनाई गई जोकि एक अदभुत उपलब्धि है, ख़ासतौर से भारी मॉनसूनी बारिश और चुनौतीपूर्ण हालात को देखते हुए.

यूनीसेफ़ की क्षेत्रीय निदेशक जीन गॉफ़ का कहना है, “रोहिंज्या शरणार्थी बच्चों और उनके परिवारों ने बांग्लादेश में निर्वासन में रहने के दौरान असाधारण साहस व मज़बूती दिखाए हैं. अकल्पनीय कठिन परिस्थितियों के बावजूद... इन परिवारों ने हमें हर दिन सिखाया है कि मज़बूती, शक्ति और सहनशीलता क्या होते हैं.”

 

♦ समाचार अपडेट रोज़ाना सीधे अपने इनबॉक्स में पाने के लि/s यहाँ किसी विषय को सब्सक्राइब करें
♦ अपनी मोबाइल डिवाइस में यूएन समाचार का ऐप डाउनलोड करें – आईफ़ोन iOS या एण्ड्रॉयड

समाचार ट्रैकर: इस मुद्दे पर पिछली कहानियां

'युद्धापराध की श्रेणी में आ सकती है' रोहिंज्या समुदाय पर हैलीकॉप्टर से गोलाबारी

म्यांमार में सुरक्षा बलों और हथियारबंद अलगाववादी गुटों के बीच तेज़ होती झड़पों के बीच राखीन प्रांत में सेना के हैलीकॉप्टर से हुए हमले में रोहिंज्या समुदाय के सात लोगों की मौत हो गई है जबकि 18 लोग घायल हुए हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने हमले की निंदा करते हुए कहा है इस हमले को युद्धापराध की श्रेणी में रखा जा सकता है. 

रोहिंज्या लोगों की वापसी सुरक्षित और उनकी मर्ज़ी से हो

संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों के लिए शीर्ष अधिकारी ने कहा है कि म्याँमार से सुरक्षा के लिए भागने को मजबूर होकर बांग्लादेश पहुँचे रोहिंज्या शरणार्थियों की स्वदेश वापसी उनकी इच्छानुसार ही होनी चाहिए. फिलिपो ग्रैंडी ने कहा कि म्याँमार में रोहिंज्या लोगों के मूल निवास स्थानों पर अब भी हालात सुरक्षित नहीं हैं जिससे कि उनकी सम्मानजक और टिकाऊ तरीक़े से वापसी हो सके.