यूरो, पाउण्ड, डॉलर - प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म पर गाज

2 जून 2020

कहीं से यूरो, कहीं से पाउँड और कही से डॉलर, विदेशों में रहने वाले प्रवासी कामगार अपने मूल स्थानों पर रहने वाले अपने परिवारों को धन भेजते रहे हैं. इस धन से करोड़ों लोगों को अत्यन्त ग़रीबी से उबारने में मदद मिलती है और अन्ततः टिकाऊ विकास लक्ष्यों का दिशा में प्रगति होती है. उसके बाद आ गई कोविड-19 नामक महामारी, जिसने इस धन पर गहरी छाया छोड़ दी है.

प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रक़म कम से कम 60 निम्न व मध्य आय वाले देशों के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा होती है. इतना धन तो उनके यहाँ विदेशी सीधे निवेश या अन्य देशों से आधिकारिक विकास सहायता के ज़रिये भी नहीं आता.

कमज़ोरियाँ उजागर 

अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) के अध्यक्ष गिलबर्ट एफ़ होउन्गबो का कहना है, “कोरोनावायरस के बाद के समय में आर्थिक हालात अपेक्षानुसार तेज़ी से सुधरते हैं या नहीं, लेकिन इस वैश्विक महामारी ने प्रवासियों द्वारा अपने परिवारों को रक़म भेजे जाने की व्यवस्था की कमज़ोरियों को सामने ला दिया है.” 

ध्यान रहे कि आईफ़ैड संयुक्त राष्ट्र की विशेषीकृत एजेन्सी है जिसका मुख्यालय रोम में है.

प्रवासियों द्वारा अपने परिवारों को भेजी जाने वाली रक़म की अहमियत पर ज़ोर देने के लिए 16 जून को अन्तरराष्ट्रीय दिवस मनाया जा रहा है. 

आईफ़ैड अध्यक्ष ने उसी दिवस के अवसर पर यूएन न्यूज़ के साथ बातचीत में कहा कि इसीलिये अब समय आ गया है कि चाहे आर्थिक परिदृश्य चाहे कुछ भी हो, इन कमज़ोरियों को दूर किया जाए.

विश्व बैंक के अनुसार वर्ष 2019 के दौरान निम्न व मध्यम आय वाले देशों के विदेशों में रहने वाले प्रवासी नागरिकों ने लगभग 55 अरब 40 करोड़ डॉलर की रक़म स्वदेशों को भेजी थी.

ये रक़म उन लगभग 20 करोड़ प्रवासी कामगारों ने भेजी थी जो 40 देशों में रहकर आय अर्जित कर रहे थे. इस रक़म के ज़रिए उनके लगभग 80 करोड़ सम्बन्धी लोगों की जीविका चल रही थी जो 125 से अधिक विकाशसील देशों में रहते थे.

अध्यक्ष का कहना है कि जिन परिवारों को ये धनराशि मिलती थी, उनमें से लगभग आधे परिवार ग्रामीण इलाक़ों में रहते थे जहाँ ये रक़म उनके लिए बहुत मायने रखती है.

110 अरब डॉलर ग़ायब

लेकिन विश्व बैंक का अनुमान है कि नॉवल कोरोनावायरस की महामारी फैलने के बाद प्रवासी कामगारों द्वारा विदेशों से अपने मूल स्थानों को भेजी जाने वाली धनराशि में बीस प्रतिशत यानि लगभग 110 से लेकर 445 अरब डॉलर तक की गिरावट आएगी.

इसके परिणामस्वरूप सम्भवतः करोड़ों लोग ग़रीबी की रेखा से नीचे चले जाएँगे और अन्ततः 2030 का टिकाऊ विकास एजेण्डा हासिल करने की रफ़्तार पर असर पड़ेगा.

आईफ़ैड अध्यक्ष गिलबर्ट होउन्गबो का कहना है कि चूँकि वर्ष 2021 में भी कुछ ज़्यादा तेज़ी से आर्थिक पुनर्वबहाली की सम्भावनाएँ नहीं हैं तो विदेशों से भेजी जाने वाली रक़म का स्तर महामारी से पहले के स्तर पर पहुँचने की कम ही उम्मीद है.

उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया, “ये बात भी है कि विदेशों से भेजी जाने वाली इस रक़म में कमी सभी परिवारों और देशों व महाद्वीपों के लिए एक समान नहीं होगी, लेकिन इसके सामाजिक असर काफ़ी ज़्यादा और लम्बी अवधि के लिए होंगे.” 

इस स्थिति को देखते हुए स्विट्ज़रलैंड, ब्रिटेन, अनेक अन्य देश, विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और अन्य यूएन एजेंसियों व औग्योगिक समूहों ने 22 मई को एक वैश्विक पुकार लगाई थी.

इसमें प्रवासी कामगारों व प्रवासी समुदायों द्वारा अपने मूल स्थानों को धनराशि प्रेषण सुनिश्चित करने के लिए क़दम उठाने की बात कही गई थी. साथ ही धनराशि  प्रेषण व्यवस्था को भी कारगर बनाए रखने पर भी ज़ोर दिया गया है.

तमाम नीतिनिर्माताओं से आग्रह किया गया है कि धनराशि प्रेषण के प्रावधान को ना केवल आवश्यक सेवाएँ घोषित किया जाए, बल्कि धनराशि प्रेषण के लिए ज़्यादा कुशल डिजिटल चैनलों का विकास करने में सहायता उपलब्ध कराई जाए.

 

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