टिकाऊ व जलवायु सहन-सक्षम भविष्य, महिलाओं की अगुवाई में प्रयास

भारत के अहमदाबाद शहर की एक झुग्गी बस्ती में मॉड रूफ टैक्नॉलॉजी का इस्तेमाल.
Mahila Housing SEWA Trust
भारत के अहमदाबाद शहर की एक झुग्गी बस्ती में मॉड रूफ टैक्नॉलॉजी का इस्तेमाल.

टिकाऊ व जलवायु सहन-सक्षम भविष्य, महिलाओं की अगुवाई में प्रयास

जलवायु और पर्यावरण

भारत के ग़ैर-सरकारी संगठन ‘महिला हाउसिंग सेवा ट्रस्ट’ (MHT) की निदेशक बीजल ब्रह्मभट्ट का कहना है कि महिलाओं के लिये पर्यावरणीय क्षरण, ताप लहरों समेत जलवायु परिवर्तन के अन्य नकारात्मक प्रभावों का जोखिम अधिक होता है. इसलिये इन चुनौतियों से निपटने के कारगर व न्यायसंगत उपायों के लिये यह ज़रूरी है कि महिलाओं की आवश्यकताओं व उनके नज़रियों का भी ध्यान रखा जाए. 

‘महिला हाउसिंग सेवा ट्रस्ट’ (एमएचटी), भारत के गुजरात राज्य के अहमदाबाद शहर में स्थित है, और यह दक्षिण एशियाई देशों में निम्न-आय वाले परिवारों की महिलाओं को जलवायु अनुकूलन व सहनक्षमता निर्माण के लिये सहायता प्रदान करता रहा है.

भारत के अहमदाबाद की एक बस्ती में घर की छत को थर्मोकॉल टैक्नॉलॉजी की मदद से तैयार किया गया है.
Mahila Housing SEWA Trust
भारत के अहमदाबाद की एक बस्ती में घर की छत को थर्मोकॉल टैक्नॉलॉजी की मदद से तैयार किया गया है.

इन समाधानों के तहत ऊर्जा दक्ष प्रकाश व्यवस्था, जैसे एलईडी बल्ब का इस्तेमाल, तापमान में कमी लाने के लिये ‘मॉड्यूलर’ छतें और घरों में कमरों को हवादार बनाने समेत अन्य उपाय हैं.

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था (UNFCCC) ने वर्ष 2019 में, वैश्विक जलवायु कार्रवाई सम्मान के लिये संगठन को चुना था.

बताया गया है कि यह संगठन भारत, बांग्लादेश और नेपाल के सात शहरों में क़रीब 25 हज़ार निम्न-आय परिवारों की मदद कर चुका है.

दक्षिण एशिया के देशों के शहरी इलाक़ों में 13 करोड़ से अधिक लोग झुग्गी बस्तियों में रहने के लिये मजबूर हैं.

यहाँ बुनियादी सेवाओं का अभाव होता है और लोग गन्दगी भरे हालात में जीवन-व्यापन के लिये मजबूर हैं. 

एमएचटी निदेशक बीजल ब्रह्मभट्ट ने बताया कि उनके ट्रस्ट ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये वर्ष 2015 में प्रयास शुरू किये और सामुदायिक कार्रवाई के केंद्र में महिलाओं को रखा.

बीजल ब्रह्मभट्ट के साथ बातचीत सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें.

मौजूदा चुनौतियाँ

“लिंग-आधारित भूमिकाओं, दायित्वों और सांस्कृतिक व पारम्परिक मानकों के कारण महिलाओं के लिये जलवायु परिवर्तन का जोखिम अधिक है.” 

“भारतीय उपमहाद्वीप में, महिलाओं को घर-परिवार प्रबन्ध की ज़िम्मेदारी निभानी होती है और दूरदराज़ से जल और ईंधन के लिये लकड़ी भी जुटानी होती है. वे ना सिर्फ़ एक देखभालदाता की भूमिका में होती हैं, बल्कि कृषि कार्य में भी हाथ बँटाती हैं.” 

वैश्विक दक्षिणी गोलार्ध में स्थित देशों में, महिलाएँ अधिकांशतया अनौपचारिक सैक्टर में काम करती हैं, जहाँ उनके काम पर ध्यान नहीं दिया जाता है.

दैनिक कामकाज़ में प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहने के कारण महिलाओं पर जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों, पर्यावरणीय क्षरण, ताप लहरों और वैश्विक तापमान में वृद्धि का सामना करने का जोखिम अधिक होता है. 

महिलाओं की अहम भूमिका

बीजल ब्रह्रमभट्ट ने बताया कि महिलाओं को जब सही ज्ञान व औज़ार हासिल हों, तो समुदायों को आपदाओं से जल्द व कारगर ढँग से उबरने में मदद मिलती है. इसलिये आपात प्रतिक्रिया और जलवायु सहनक्षमता में उनकी भागीदारी अहम है. 

अधिकाँश मामलों में महिलाओं की कमाई पूरे परिवार पर ख़र्च होती है, तो इसलिये यह कहा जा सकता है कि एक महिला एक परिवार बदल सकती है, और महिलाओं का एक समूह पूरे समुदाय को बदल सकता है.

उन्होंने बताया कि शुरुआत में लोगों को जलवायु परिवर्तन के बारे में ज़्यादा जागरूकता नहीं थी. 

जागरूकता प्रयास

निम्न-आय वाले समूहों व ग्रामीण इलाक़ों की महिलाएँ अपने रोज़मर्रा की ज़रूरतों जैसाकि खाना पकाने के लिये ईंधन, बिजली, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, स्कूल फ़ीस के लिये ज़्यादा चिन्ता थी. 

सामुदायिक स्तर पर महिलाएँ जल की गुणवत्ता की जाँच कर रही हैं.
World Resources Institute
सामुदायिक स्तर पर महिलाएँ जल की गुणवत्ता की जाँच कर रही हैं.

इसलिये, जलवायु परिवर्तन उनके लिये प्राथमिकता नहीं था, चूँकि वे इन अन्तर्निहित चुनौतियों को नहीं समझते थे.  

बीजल ब्रह्मभट्ट के अनुसार महिला सेवा ट्रस्ट, निर्धन समुदायों को पहले से ही गुणवत्तापूर्ण जीवन व बेहतर पर्यावास सुनिश्चित करने के लिये प्रयासरत रहा है.

बुनियादी सेवाओं, जैसेकि स्वच्छ जल, शौचालय, बिजली और पर्याप्त बिजली व हवादार मकानों की व्यवस्था, इस मदद का एक अहम अंग रहा है.

इन सभी क्षेत्रों में महिला समूहों को ज़मीनी स्तर पर सहायता प्रदान किये जाने की वजह से, पहले से ही भरोसा व नाता था. 

इस पृष्ठभूमि में, जब महिला सेवा ट्रस्ट ने जलवायु सहनक्षमता के मुद्दे पर इन महिलाओं से सम्पर्क साधा तो उन्होंने संगठन की बात सुनी व समझी.

संगठन ने महिला समूहों को बताया कि जलवायु परिवर्तन का असर उनके बच्चों को झेलना पड़ सकता है, तो उन्होंने हालात की गम्भीरता समझनी शुरू की. 

वे नहीं चाहती थीं कि उनके द्वारा कोई भी क़दम ना उठाये जाने का ख़ामियाज़ा उनके बच्चे भुगतें. इस बोध के साथ, उन्होंने जलवायु कार्रवाई में अपना समर्थन दिया.  

अहमदाबाद के लीलापुर गाँव में ऊर्जा दक्ष तकनीक की मदद से तैयार एक पढ़ाई लिखाई केंद्र.
Mahila Housing SEWA Trust
अहमदाबाद के लीलापुर गाँव में ऊर्जा दक्ष तकनीक की मदद से तैयार एक पढ़ाई लिखाई केंद्र.

'कारगर उपाय'

एमएचटी द्वारा, महिलाओं को चार मुख्य जलवायु जोखिमों के लिये कार्रवाई की अगुवाई करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है: ताप लहरें, बाढ़ व जल भराव, जल क़िल्लत, और जल-जनित बीमारियाँ.

उदाहरण के तौर पर, महिलाओं को ऊर्जा इस्तेमाल का लेखा-जोखा रखने और पहले से अधिक दक्ष उत्पादों का इस्तेमाल करने के लिये प्रशिक्षित किया जाता है.

इस क्रम में, हरित ऊर्जा निर्माण उत्पादों के लिये महिलाओं के नेतृत्व में एक वितरण नैटवर्क की भी व्यवस्था की गई है.

अन्य समाधानों में, जल के प्रवाह में कमी लाने के लिये छिड़काव टण्कियों का इस्तेमाल, वर्षा जल के भण्डारण और अन्य व्यवहारिक बदलावों पर बल दिया जाता है.

संगठन का कहना है कि इन उपायों के ज़रिये बड़ी संख्या में घर-परिवारों ने जल की गुणवत्ता बेहतर होने और गर्मियों के दौरान पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध रहने की बात कही है.

भारत के अहमदाबाद शहर में स्थानीय महिला के घर को हवादार बनाने के लिये एयरलाइट टैक्नॉलॉजी का इस्तेमाल.
Mahila Housing SEWA Trust
भारत के अहमदाबाद शहर में स्थानीय महिला के घर को हवादार बनाने के लिये एयरलाइट टैक्नॉलॉजी का इस्तेमाल.

ऊर्जा दक्ष एलईडी बल्ब लगाने के अलावा मॉडरूफ़' छतों का इस्तेमाल किया जाता है.

ग्रामीण इलाक़ों में घरों, स्कूलों, अस्पतालों और अन्य ढाँचों के लिये, यह एक ऐसी "मॉड्यूलर" छत प्रणाली है जो गत्ते और कृषि अवशेष से बनती है.

इस छत प्रणाली में आसानी से बनाए और लगाए जाने वाले मॉड्यूल होते हैं जिन्हें एक-एक करके बदलना भी आसान होगा.

साथ ही सौर ऊर्जा और घरों में कमरों को हवादार बनाने समेत अन्य उपाय भी अमल में लाए जाते हैं.