पाकिस्तान: हरित पुनर्बहाली के लिये स्थानीय ज्ञान का दोहन

13 जनवरी 2022

संयुक्त राष्ट्र के पिछले जलवायु सम्मेलन - COP26 में जलवायु सम्बन्धी प्रतिबद्धताओं और जलवायु वित्त पर चर्चा के मूल में - अस्थिर विकास का स्वरूप बदलने की मूलभूत आवश्यकता ही थी. जबकि सरकारें वर्ष 2050 और 2070 के लिये लक्ष्य निर्धारित कर रही हैं, बाढ़, भूस्खलन, चट्टानें ख़िसकने, या तूफ़ान की घटनाओं जैसे प्राकृतिक ख़तरों की गम्भीरता बढ़ती जा रही है. ऐसे में, स्थानीय ज्ञान के ज़रिये, सहनसक्षम एवं टिकाऊ पुनर्निर्माण सम्भव हो सकता है. विश्व बैंक में दक्षिण एशिया के लिये, जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम प्रबन्धन सलाहकार, मिशेल विंगली का ब्लॉग...

विश्व स्तर पर, पिछले 20 वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं से, लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर की सम्पत्ति नष्ट हो चुकी है. लेकिन ये आपदाएँ, पुनर्निर्माण वित्तपोषण को अधिक सहनसक्षम और कम ऊर्जा-गहन विकास की दिशा में ले जाने का एक अवसर भी पेश करती हैं. दुर्भाग्य से, यह अवसर अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है: उन्नत दीर्घकालिक योजनाओं के अभाव में, मुनाफ़ाख़ोरी बढ़ सकती है और 'बेहतर पुनर्निर्माण' के बजाय, जल्दी-जल्दी निर्माण या दोबारा पुराने तरीक़े से निर्माण का रास्ता अपनाया जा सकता है. ऐसे में, टिकाऊ समाधानों की अक्सर अनदेखी की जाती है.

लेकिन कभी-कभी एक टिकाऊ समाधान ढूंढकर, कारगर भी हो जाता है - जैसे कि 2005 में कश्मीर में आए भूकम्प में नष्ट हुए घरों के पुनर्निर्माण में देखने को मिला. 7.6 तीव्रता का यह भूकम्प, पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्र और कश्मीर में आया, जिसमें स्कूलों की इमारतें गिरने से 19 हज़ार बच्चों समेत, 87 हज़ार लोगों की जान चली गई.

ऐसे में, निधर्नतम लोगों के लिये विश्व बैंक के कोष, आईडीए ने, पाकिस्तान ग़रीबी उन्मूलन कोष परियोजना के ज़रिये, पुनर्वास व पुनर्निर्माण के लिये 23 करोड़ 80 डॉलर की धनराशि प्रदान की. इस परियोजना के तहत, भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में दो क्षेत्रीय कार्यालयों की स्थापना की गई और इन्जीनियरिंग व सामाजिक गतिशीलता के अनुभव वाली स्थानीय टीमों को, चुनौतियों के साथ-साथ समाधानों पर विश्लेषण का अधिकार दिया गया.

परियोजना की मैदानी टीमों की साप्ताहिक रिपोर्ट में, आवास पुनर्निर्माण में सरकारी दिशानिर्देशों का पालन करना सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा. इन दिशानिर्देशों में, निर्माण में सीमेण्ट, रेत, मोर्टार जैसी सामग्री का उपयोग करने के निर्देश हैं; हालाँकि, इन सामग्रियों को पाकिस्तान के उत्तरी पहाड़ी इलाकों से लाना और पानी की कमी वाले क्षेत्र में सीमेण्ट का उपयोग करना, बेहद कठिन काम है.

इसी उलझन के बीच, ढहे हुए बुनियादी ढाँचे और मलबे में टीम को एक समाधान मिल ही गया. जिन घरों को भूकम्प से सबसे कम नुक़सान हुआ था, दरअसल उनके निर्माण में सदियों पुरानी तकनीक इस्तेमाल की गई थी – जिसे "धाजी" लकड़ी संरचना के नाम से जाना जाता है. प्राचीन काल से दुनिया की कई संस्कृतियाँ, मिट्टी, पत्थर और अन्य स्थानीय सामग्रियों के हिस्से जोड़-जोड़ कर लकड़ी के फट्टों की चिनाई वाली इस पारम्परिक निर्माण तकनीक का प्रयोग करती रही हैं.

क्षेत्र से जुटाए आँकड़ों के ज़रिये किये गए अवलोकन के परिणामस्वरूप, पुनर्निर्माण दिशानिर्देशों में बदलाव हुआ. नतीजतन, परियोजना के तहत बनाए गए लगभग 40% घरों में, लकड़ी के ढाँचे और पत्थर की चिनाई के लिये इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया. 

स्थानीय क्षेत्र इकाइयाँ स्थापित करने, समुदाय-आधारित गैर-सरकारी संगठनों के साथ साझेदारी बनाने और ज़मीनी रिपोर्ट के अनुरूप कार्रवाई के प्रयासों का नेतृत्व करने वाले, विश्व बैंक के वरिष्ठ आपदा जोखिम प्रबन्धन विशेषज्ञ, कामरान अकबर कहते हैं, "इन पहाड़ी क्षेत्रों के निवासियों को, अपने पुरखों से यह ज्ञान मिला है कि उनके क्षेत्र के लिये क्या उचित है.” 

निर्माणाधीन पत्थरों का ढाँचा.
World Bank/Kamran Akbar
निर्माणाधीन पत्थरों का ढाँचा.

लकड़ी: एक सहनसक्षम और कम कार्बन निर्माण सामग्री

हालाँकि दुनियाभर में, कंकरीट ही प्रमुख निर्माण सामग्री है, लेकिन यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत भी है. वास्तव में, यदि कंकरीट उद्योग एक देश होता, तो यह चीन और अमरीका के बाद तीसरा सबसे बड़ा CO2 उत्सर्जक होता.

भूकम्प जैसी कुछ विशेष प्रकार की आपदाओं में लकड़ी के ढाँचे अधिक टिकाऊ व सहनसक्षम साबित हुए हैं. इसके अलावा लकड़ी के घरों का निर्माण मिट्टी, पत्थर और लकड़ी जैसी स्थानीय तौर पर उपलब्ध सामग्री से किया जा सकता है – जो कि एक सस्ता विकल्प भी होता है.

कंकरीट की बहु-मंज़िला इमारतों के निर्माण के लिये विशेषज्ञों की ज़रूरत पड़ती है, जिन्हें ज़्यादातर बाहर से बुलाना पड़ता है, लेकिन स्थानीय तकनीकों के इस्तेमाल से, स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलता है. 

पेड़, स्वाभाविक रूप से अपने जीवनकाल में कार्बन का भण्डारण करते हैं, इसलिये अगर टिकाऊ तरीक़े से कटाई की जाए, तो लकड़ी से ग्रामीण आजीविकाएँ उपलब्ध कराते हुए हरित निर्माण सामग्री बनने की अपूर्व क्षमता है.

पुराने ज़माने के ढाँचों को अधिक सहनसक्षम भविष्य के लिये तैयार करने के एक साधन के रूप में, ये लकड़ी के ढाँचे संस्कृतियों को जोड़ने में भी सहायक होते हैं .

भविष्य में प्राकृतिक ख़तरों की आवृत्ति और तीव्रता के बढ़ने की सम्भावना के कारण, आने वाले वर्षों में पुनर्निर्माण के अधिक अवसर होंगे - उम्मीद है, कि ये अधिक सुरक्षित और टिकाऊ होंगे.

आपदाओं से सीखे गए सबक़ों से स्पष्ट है कि वास्तव में बड़े पैमाने के विनाश के लिये प्राकृतिक आपदाएँ नहीं, बल्कि मानव निर्मित विकास ही ज़िम्मेदार होता है. कामरान अकबर कहते हैं, "भूकम्प नहीं मारता, मारता है कंकरीट."

हालाँकि, यदि प्राकृतिक आपदाओं से होने वाला विनाश मानव निर्मित है, तो इसका मतलब यह है कि इसे बदलने की क्षमता भी हमारे पास है.

COP26 ने जलवायु वित्तपोषण में अन्तर पर प्रकाश डाला और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया कि वित्तपोषण उन लोगों तक पहुँचे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है.

हालाँकि लकड़ी कंकरीट की जगह नहीं ले सकती, लेकिन इसे रचनात्मक समाधानों में शामिल किया जा सकता है, ताकि स्थानीय सन्दर्भ के आधार पर विकास पर पुनर्विचार किया जा सके.

आपदा के बाद पुनर्निर्माण के लिये धनराशि, स्थानीय लोगों को जोड़ना और सबसे अधिक प्रभावित लोगों की आवाज़ों को शामिल करना, एक बड़ा योगदान साबित हो सकता है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ था.

 

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