म्याँमार में 'तबाहीपूर्ण हालात', सैन्य नेतृत्व की जवाबदेही तय किये जाने की माँग

11 जून 2021

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) की प्रमुख  मिशेल बाशेलेट ने चेतावनी जारी की है कि म्याँमार में बड़े पैमाने पर ख़ूनख़राबा रोकने और मानवीय संकट को गहराने से बचाने के लिये, वहाँ तेज़ होती हिंसा को रोका जाना होगा. उन्होंने क्षोभ जताते हुए कहा कि महज़ चार महीनों में, म्याँमार एक नाज़ुक लोकतंत्र से मानवाधिकारों के लिये त्रासदी बन गया है, और मौजूदा संकट के लिये सैन्य नेतृत्व की जवाबदेही तय की जानी होगी.

ख़बरों के अनुसार देश के पूर्व में काया प्रान्त और पश्चिम में चिन प्रान्त में सैन्य जमावड़ा बढ़ रहा है.

पिछले तीन हफ़्तों में एक लाख से अधिक लोगों ने घर से भागकर जंगलों में शरण ली है और उनके पास भोजन, पानी और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध नहीं है.

यूएन मानवाधिकार कार्यालय की शीर्ष अधिकारी ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर कहा कि इन लोगों को तत्काल मानवीय राहत की आवश्यकता है.

“जैसाकि मुझे आशंका थी, काया, चिन और काचीन प्रान्त समेत म्याँमार के अनेक हिस्सों में सशस्त्र हिंसा और अन्य प्रकार की हिंसा तेज़ हो रही है.”

बताया गया है कि हिंसा से वे इलाक़े ज़्यादा प्रभावित हुए हैं जहाँ जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों की आबादी अधिक है.

भारी हथियारों का इस्तेमाल

यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने बताया कि सरकारी सुरक्षा बलों ने भारी हथियारों का इस्तेमाल करना जारी रखा है – हथियारबन्द गुटों के अलावा, नागरिकों व नागरिक प्रतिष्ठानों पर भी हवाई कार्रवाई हो रही है.

उन्होंने चिन्ता जताई कि तनाव में कमी लाने के लिये कोई प्रयास नहीं किये गए हैं, और मुख्य इलाक़ों में सेना का जमावड़ा बढ़ रहा है. यह उन संकल्पों के विपरीत है जिन्हें सैन्य नेतृत्व ने आसियान देशों से हिंसा रोकने के वादे के रूप में लिया था.

विश्वसनीय रिपोर्टों के मुताबिक सुरक्षा बलों ने आम लोगों को मानवीय ढाल के रूप में इस्तेमाल किया है, काया प्रान्त के कई इलाक़ों में रिहायशी इलाक़ों व चर्चों पर बम गिराये गए हैं, और मानवीय राहत रास्तों को बन्द कर दिया गया है.

मिशेल बाशेलेट ने ध्यान दिलाया है कि म्याँमार की सेना का यह दायित्व है कि नागरिकों की रक्षा की जाए और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को एकजुट होकर नागरिकों व नागरिक प्रतिष्ठानों पर भारी हथियारों के क्षुब्धकारी इस्तेमाल को रोकने की माँग करनी होगी.

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ने “जनता की सुरक्षा” के लिये स्थापित बलों व अन्य हथियारबन्द गुटों से आम लोगों की रक्षा का हरसम्भव उपाय करने का आग्रह किया है.

साथ ही उन्होंने देश भर में अस्पतालों, स्कूलों, उपासना स्थलों की रक्षा सुनिश्चित किये जाने की अपील जारी की है.

अनेक रिपोर्टों के मुताबिक म्याँमार के सैन्य बलों ने अस्पतालों, स्कूलों व धार्मिक संस्थानों में प्रवेश व क़ब्ज़ा किया है और सैन्य कार्रवाई में वे क्षतिग्रस्त भी हुए हैं.

दमनात्मक कार्रवाई

1 फ़रवरी को देश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को हटाये जाने और सैन्य नेतृत्व द्वारा सत्ता हथिया लिये जाने के बाद से अब तक 860 लोगों की मौत हुई है. इनमें से अधिकाँश लोग, सैन्य शासन के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शनों के दौरान मारे गए हैं.

बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार किया गया है – विश्वसनीय स्रोतों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, चार हज़ार से अधिक लोगों को मनमाने ढँग से हिरासत में रखा गया है.

यूएन हाई कमिश्नर ने बन्दियों को यातना दिये जाने, कार्यकर्ताओं के परिजनों को सज़ा दिये जाने के मामलों पर गम्भीर चिन्ता जताई है.

उन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर कूटनैतिक प्रयासों को तेज़ करने का आहवान किया है, जिसमें आसियान व क्षेत्र में प्रभुत्व रहने वाले अन्य देशों को शामिल करना होगा.

इन प्रयासों के तहत हिंसा पर तत्काल विराम लगाये जाने और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को रोके जाने पर बल दिया गया है.

यूएन मानवाधिकार कार्यालय की प्रमुख ने आगाह किया कि महज़ चार महीनों में, म्याँमार एक नाज़ुक लोकतंत्र से मानवाधिकारों के लिये त्रासदी बन गया है.

बड़ी संख्या में जानें गई हैं, उनके सामाजिक व आर्थिक अधिकारों पर गम्भीर असर हुआ है. और इस संकट के लिये म्याँमार का सैन्य नेतृत्व ज़िम्मेदारी है जिसकी जवाबदेही तय की जानी होगी.

 

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