संशोधित अफ़ग़ान क़ानून भी, यौन हिंसा की पीड़ित महिलाओं को इन्साफ़ दिलाने में नाकाम

7 दिसम्बर 2020

यूएन मानवाधिकार एजेंसी और अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन ने कहा है कि देश में न्याय व्यवस्था अब भी हिंसा और यौन अपराधों की शिकार महिला पीड़ितों को पर्याप्त सहायता मुहैया कराने में नाकाम है, जब वर्ष 2009 में एक ऐसा क़ानून बनाया गया था जिसे महिलाओं को संरक्षा व सुरक्षा मुहैया कराने के क़ानूनी प्रयास आगे बढ़ाने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण क़दम क़रार दिया गया था.

सोमवार को जारी एक संयुक्त रिपोर्ट में ये बात कही गई है जिसे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) और अफ़ग़ानिस्तान में यूएन सहायता मिशन UNAMA ने जारी किया है. 

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने कहा है, “अफ़ग़ानिस्तान में, न्याय व्यवस्था को निष्पक्ष, समान और, महालिओं सहित, किसी के भी ख़िलाफ़ भेदभाव नहीं करने वाला बनाने के लिये अधिकारियों द्वारा वर्षों तक किये गए प्रयासों को हम, जानते हैं. लेकिन, स्पष्ट रूप से कहा जाए तो, ये काफ़ी नहीं है.”

इस रिपोर्ट को नाम दिया गया है – महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा के अपराधों में न्याय की तलाश.

रिपोर्ट में, सितम्बर 2018 से फ़रवरी 2020 के बीच हुए 303 अपराधों की पड़ताल की गई है, और पाया गया है कि उनमें से केवल आधे ही अदालत तक पहुँच पाए, और दण्डमुक्ति की भावना प्रबल नज़र आई. रिपोर्ट के लेखकों ने बाल विवाह के जिन 16 मामलों का अध्ययन किया, उनमें से केवल एक में ही अपराध निर्धारित हो पाए.

दिल दहला देने वाला बोझ

40 मामलों में, हिंसा के पीड़ितों ने या तो ख़ुद की जान लेने की कोशिश की, या आत्महत्याएँ कर लीं. इससे ये झलकता है कि उन्हें न्याय व्यवस्था में भरोसा नहीं था.

मिशेल बाशेलेट ने कहा, “ये देखना, बेहद दिल दहला देने वाला और भयंकर है कि जिन लड़कियों और महिलाओं को हिंसा से बचने के रास्तों में, अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर देने के सिवाय कोई अन्य रास्ता नज़र नहीं आता.”

रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ़ग़ानिस्तान को, वर्ष 2009 में बनाए गए – ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का अन्त (EVAW) क़ानून’ में बदलाव करना चाहिये ताकि अधिकारी ऐसे अपराधों और मामलों की जाँच और मुक़दमा चलाने की कार्रवाई जारी रख सकें, यहाँ तक कि अगर शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत वापिस भी ले ली हो.

मौजूदा प्रावधान के अनुसार, शिकायतकर्ता द्वारा अपनी शिकायत वापिस ले लिये जाने के बाद, मुक़दमे की कार्रवाई बन्द हो जाती है. ऐसे हालात में, पीड़ित महिलाओं या लड़कियों के कन्धों पर बहुत भारी बोझ पड़ जाता है, ख़ासतौर से, अगर अपराध की ख़बर अधिकारियों को देने से, उनके अपने परिवार और समुदाय के साथ सम्बन्ध ख़राब होते हैं, यहाँ तक कि उनकी ज़िन्दगी भी ख़तरे में पड़ जाती है.

मानवाधिकार उच्चायुक मिशेल बाशेलेट ने कहा, “बहुत से मामलों में, इस क़ानून ने उन्हें महिलाओं व लड़कियों को फिर से पीड़ित बनाया या परेशान किया जबकि, वो पहले से ही बहुत तकलीफ़ों का सामना कर चुकी थीं.” 

“ये बहुत हृदय विदारक है कि जिन महिलाओं को या तो उनके विवाह में पीटा जाता है या जिन लड़कियों की शादी, उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ की जाती है, उन्हें बेसहारा छोड़ दिया जाता है, और सरकार व अधिकारियों की तरफ़ से उनके लिये तब तक, कोई मदद उपलब्ध नहीं होती, जब कि वो अपनी शिकायत दर्ज ना कराएँ और उस पर कार्रवाई के लिये कोशिशें ना करती रहें.”

तथाकथित ‘इज़्ज़त’

रिपोर्ट में कहा गया है कि बाल विवाह के ज़्यादातर मामले लड़की के परिवारों द्वारा ही आयोजित कराए जाते हैं, या उनकी मर्ज़ी शामिल होती है, इसलिये ये अपेक्षा करना अ-वास्तविक होगा कि लड़कियाँ, ऐसे मामलों में कोई क़ानूनी मुक़दमा चलाएँगी.

एक मामले में, दो ऐसे पुरुषों को गिरफ़्तार किया गया था जिन्होंने अपनी 13 और 14 वर्षीय बेटियों को एक दूसरी की पत्नी बना दिया था. उन्हें इसलिये रिहा कर गया क्योंकि लड़कियों की माताओं ने अपनी शिकायतें वापिस ले ली थीं.

रिपोर्ट कहती है कि अफ़गानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों को अन्य तरह के मामलों में भी सुरक्षा मुहैया कराए जाने की ज़रूरत है. रिपोर्ट में हत्याओं के 22 ऐसे मामले दर्ज किये गए हैं जिनमें परिवारों या ख़ानदानों की तथाकथित इज़्ज्त बचाने के नाम पर वो हत्याएँ की गई थीं.

रिपोर्ट में बताया गया है कि तथाकथित इज़्ज़त के नाम पर की गई हत्याओं के मामलों में, बहुत कम मामलों यानि केवल 22.7 प्रतिशत में, सज़ाएँ हुईं, जबकि हत्या के अन्य मामलों में सज़ा होने की दर 51 प्रतिशत है.

रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि अगर किसी महिला या लड़की के साथ बलात्कार किया गया, या वो किसी पुरुष अभिभावक की इजाज़त के बिना, घर से बाहर चली गई, तो उस पर विवाहेतर यौन सम्बन्ध बनाने के आरोपों में मुक़दमा चलाया गया.

बलात्कार की पीड़ितों पर ही अगर मुक़दमा दर्ज कर दिया जाता है तो, इसकी सम्भावना बहुत कम हो जाती है कि वो अपने साथ हुए अपराधों की रिपोर्ट अधिकारियों या पुलिस में दर्ज कराएँ. 

रिपोर्ट के अनुसार, बलात्कार की शिकार हुई कुछ पीड़ितों को कौमार्य जाँच कराने के लिये मजबूर किया गया, जोकि अवैज्ञानिक होने के साथ-साथ, एक गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघन भी है. और कभी-कभी तो, इन जाँच नतीजों को आपराधिक मुक़दमों में सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया गया.

 

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