भारतीय नागरिकता अधिनियम: प्रदर्शनकारी नेताओं को रिहा करने का आग्रह

26 जून 2020

संयुक्त राष्ट्र के स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत सरकार से उन सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा करने की अपील की है जिन्हें नागरिकता क़ानून में हुए संशोधन के विरोध में प्रदर्शन करने के लिए गिरफ़्तार किया गया है. नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) में भारत के अनेक पड़ोसी देशों से विशिष्ट धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता हासिल करने की प्रक्रिया सरल और शीघ्रता से आगे बढ़ाने का प्रावधान है लेकिन मुसलमानों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है. 

नागरिकता संशोधन अधिनियम (Citizenship Amendment Act) 2019 में भारतीय संसद द्वारा पारित होने और राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलने के बाद क़ानून बना था.

दिसम्बर 2019 में अधिनियम के पारित होने के बाद भारत में हिन्दुओं सहित विभिन्न धर्मों व आस्थाओं के लोगों ने विरोध-प्रदर्शन किये थे जिनका मानना था कि इस अधिनियम से भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष नींव का हनन होता है. 

यूएन के विशेष रैपोर्टेयर ने कहा कि इनमें से अनेक कार्यकर्ता छात्र हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें महज़ नागरिकता संशोधन अधिनियम (Citizenship Amendment Act) की आलोचना करने और उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए गिरफ़्तार किया गया है.

“उनकी गिरफ़्तारी स्पष्ट रूप से भारत के जीवन्त नागरिक समाज को एक कपकपा देने वाला ये सन्देश देने के लिए की गई है कि सरकारी नीतियों की आलोचना को सहन नहीं किया जाएगा.”

इनमें सबसे चिन्ताजनक मामला दिल्ली में एक गर्भवती महिला छात्र सफ़ूरा ज़रगर का है जिन्हें दो महीने से ज़्यादा समय तक कथित रूप से जिन हालात में रखा गया उनकी तुलना एकान्त कारावास से की जा सकती है.

मानवाधिकार विशेषज्ञों के मुताबिक उन्हें अपने परिवार और वकील से नियमित रूप से सम्पर्क रखने की अनुमति नहीं दी गई और ना ही पर्याप्त चिकित्सा देखभाल और आहार दिया गया.

सफ़ूरा ज़रगर को अन्तत: गर्भावस्था के छठे महीने में मानवीय आधार पर 23 जून 2020 को ज़मानत मिल गई है. 

गिरफ़्तार किए गए 11 कार्यकर्ताओं के मामलों में मानवाधिकार उल्लंघन के गम्भीर आरोप लगे हैं, जिनमें से अनेक गिरफ़्तारी और हिरासत में लिए जाने के दौरान तयशुदा प्रक्रियाओं का पालन ना किये जाने से सम्बन्धित हैं. साथ ही उन्हें यातना दिए जाने और उनके साथ  बुरा बर्ताव किए जाने के भी आरोप लगे हैं. 

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“सरकार को तत्काल सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को रिहा कर देना चाहिए जिन्हें फ़िलहाल मुक़दमे से पहले हिरासत में बिना पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में रखा गया है. इनमें से अनेक मामले ऐसे हैं जिनका आधार महज़ CAA की भेदभावपूर्ण रूप की आलोचना करने वाले उनके भाषण हैं.” 

यूएन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने विरोध-प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ भेदभावपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई पर भी चिन्ता जताई है.

उनके मुताबिक ऐसा प्रतीत होता है कि CAA समर्थकों पर भी नफ़रत भड़काने और हिंसा के आरोप लगे हैं लेकिन उनकी जाँच इस तरह से नहीं की गई है. इनमें से कुछ ने कथित रूप से विरोध रैलियों में “देशद्रोहियों को गोली मारो” जैसे नारे भी लगाए थे.  

यूएन विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदर्शनकारियों को ज़मानत ना मिलने देने के लिए सरकार आतंकवाद-निरोधक या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े क़ानूनों और प्रक्रियात्मक पुलिस शक्तियों का इस्तेमाल कर रही है. ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं जिनके तहत भारी सज़ा दिये जाने का प्रावधान है. 

“मार्च में कोविड-19 महामारी के कारण प्रदर्शन रुक गए थे और भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी महामारी से सम्बन्धित स्वास्थ्य चिन्ताओं के कारण हाल ही में जेलों में भीड़-भाड़ कम करने के लिए एक आदेश जारी किया है, इसके बावजूद प्रदर्शनकारी नेताओं को हिरासत में लिया जा रहा है.”

मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की जेलों में वायरस फैलने की रिपोर्टें उनकी तत्काल रिहाई को और भी ज़्यादा ज़रूरी बनाती हैं. 

स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इन 11 कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी और उन्हें हिरासत में रखे जाने पर चिन्ता जताई है: 

मीरान हैदर, गुलफ़िशा फ़ातिमा, सफ़ूरा ज़रगर, आसिफ़ इक़बाल तन्हा, देवांगना कालिता, नताशा नरवाल, ख़ालिद सैफ़ी, शिफ़ा उर रहमान, डॉक्टर कफ़ील ख़ान, शर्जील इमाम, अखिल गोगोई. 

स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं.

 

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