2020 तक 14 लाख शरणार्थियों को आसरे की ज़रूरत होगी

2 जुलाई 2019

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी - यूएनएचसीआर ने कहा है कि 60 से अधिक मेज़बान देशों में फैले 14 लाख से अधिक विस्थापितों को साल 2020 तक तत्काल रूप में पुनर्वास की ज़रूरत पड़ेगी. साथ ही यूएनएचसीआर ने अतिसंवेदनशील होने के कारण एलजीबीटीआई (LGBTI) शरणार्थियों को और ज़्यादा सुरक्षा देने की मांग की.

यूएनएचसीआर की विश्व पुनर्वास आवश्यकता 2020 रिपोर्ट के अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक़ सबसे ज़्यादा जरूरतमंद लोगों में सीरिया के नागरिक (40 प्रतिशत), दक्षिण सूडान (14 प्रतिशत) और काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (11 प्रतिशत) शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त फिलिपो ग्रैंडी ने कहा, "युद्ध, संघर्ष और उत्पीड़न  की रिकॉर्ड संख्या और उनके राजनैतिक समाधान में कमी को देखते हुए ऐसे देशों को तुरंत आगे आने की ज़रूरत है जो ज़्यादा से ज़्यादा शरणार्थियों को अपने यहां आश्रय दे सकें."

अफ्रीका में 6 प्रतिशत और अमेरिका में 22 प्रतिशत की दर से बढ़ते विस्थापन के कारण वर्ष 2019 के मुक़ाबले 2020 में विश्व भर में पुनर्वास की जरूरतों में एक प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है.

सबसे ज़्यादा पूर्वी और ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ के 4 लाख 50 हज़ार लोगों को पुनर्वास की ज़रूरत पड़ेगी.

वर्ष 2018 के शांति समझौते के बावजूद दक्षिण सूडान में असुरक्षा के हालात स्पष्ट नज़र आ रहे हैं. यूएनएचसीआर के अनुसार काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य डीआरसी, मध्य अफ्रीका, एरिट्री, सोमालिया और सूडान में भी विस्थापन के लंबे दौर की वजह से परिस्थितियाँ बहुत ख़राब हैं.

इसके बाद तुर्की का स्थान है जहाँ 420,000 शरणार्थियों को पुनर्वास की ज़रूरत होगी. तुर्की में पहले से ही लगभग 37 लाख शरणार्थी रह रहे हैं. वहीं मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र में लगभग ढाई लाख, और मध्य अफ्रीका और ‘ग्रेट लेक्स’ क्षेत्र में लगभग एक लाख 65 हज़ार शरणार्थयों को आश्रय संबंधी ज़रूरतें होंगी.

सभी देशों को समान ज़िम्मेदारी लेनी होगी

शरणार्थी उच्चायुक्त फ़िलिपो ग्रैंडी ने जिनीवा में शरणार्थियों के लिए पुनर्वास पर आयोजित परामर्श में भाग लेने पहुंचे सदस्य देशों से कहा, "इनमें से ज़्यादातर यानी लगभग 84 प्रतिशत शरणार्थी विकासशील क्षेत्रों में रह रहे हैं, जहां पहले से ही आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे रहने को मजबूर है. ऐसे में इन शरणार्थियों को अपने विकास के लिए अभूतपूर्व आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इसलिए ज़रूरी है कि शरणार्थी संकट से निपटने के लिए सभी देश समान रूप से ज़िम्मेदारी लें.”

पुनर्वास का मतलब है कि शरणार्थियों को आश्रय देने वाले देश से दूसरे ऐसे देश में भेजा जाए जो उन्हें स्वीकार करने और उनका स्थाई बंदोबस्त करने के लिए तैयार हो.

यूएनएचसीआर के मुताबिक ये उन लोगों के लिए जीवनदायी सहारे की तरह होगा जो या तो बहुत कमज़ोर वर्ग से हैं या फिर उनकी कुछ ख़ास ज़रूरतें हैं जो उस देश में रहते हुए संबोधित नहीं की जा सकती हैं, जिसने उन्हें संरक्षण दिया है.

पिछले दो वर्षों से विश्व स्तर पर घटते पुनर्वास के अवसरों के बीच, कमज़ोर वर्ग के ज़्यादा से ज़्यादा शरणार्थियों को किसी तीसरे ही देश में घर उपलब्ध कराने के लिए यूएनएचसीआर और साझीदार संगठनों ने शुक्रवार को पुनर्वास और अन्य क़ानूनी विकल्पों की एक योजना का अनावरण किया.

इसके तहत परिवार या रोज़गार और अध्ययन के लिए दूसरे देशों में प्रवास को आसान बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है.

2028 तक तीन लाख शरणार्थियों को फिर से बसाना होगा

इस रणनीति का उद्देश्य 2028 के अंत तक तीन लाख शरणार्थियों के लिए तथाकथित तीसरे देश में बसने का समाधान खोजना है जिससे क़रीब एक लाख लोग लगभग 50 देशों में बस सकें और तकरीबन दो लाख शरणार्थी वैकल्पिक तरीक़ों से लाभ उठा सकें.

दिसंबर में जिनीवा में एक विश्व शरणार्थी फोरम भी आयोजित किया जाएगा. यूएनएचसीआर का मानना है कि सभी देशों और अन्य संबद्ध पक्षों के लिए अपने वादों और प्रतिबद्धताओं के ज़रिए समर्थन हासिल करने का ये एक बेहतरीन मौक़ा है.

फिलिपो ग्रैंडी ने ज़ोर देकर कहा, "इतिहास गवाह है कि अगर इरादे मज़बूत हों तो सभी देश मिलकर इस शरणार्थी संकट से निपट सकते हैं जिससे करोड़ों लोगों को सुरक्षा देने, नए घर खोजने और उनका भविष्य सुधारने में मदद मिलेगी."

बहुत से एलजीबीटीआई लोगों के लिए तो सदमे और अत्याचार की शुरूआत सुरक्षा के लिए क़दम उठाने से बहुत पहले ही शुरू हो जाती है. उत्पीड़न अक्सर उन क़ानूनों की वजह से होता है जो यौन पसंदगी, लैंगिक पहचान और उसकी अभिव्यक्ति को जुर्म मानते हैं और उसके आधार पर भेदभाव करते हैं, मेड्रीगाल बोर्लोज़

एलजीबीटीआई शरणार्थियों के लिए बेहतर सुरक्षा का आग्रह

इसी संबंध में यूएनएचसीआर ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त स्वतंत्र अधिकार विशेषज्ञ के सुर से सुर मिलाते हुए एलजीबीटीआई समुदाय की अति संवेदनशील स्थिति के मद्देनज़र और ज़्यादा जागरूकता फैलाने और उन्हें बेहतर सुरक्षा देने का आह्वान किया है.

यूएनएचसीआर के सहायक उच्चायुक्त वोल्कर टर्क और संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र विशेषज्ञ विक्टर मेड्रीगाल बोर्लोज़ के मुताबिक फिलहाल केवल 37 देश ही यौन प्रथमिकता या लैंगिक पहचान के कारण उत्पीड़न के शिकार लोगों को संरक्षण देते हैं.

विक्टर मेड्रीगाल बोर्लोज़ ने कहा, "बहुत से एलजीबीटीआई लोगों के लिए तो सदमे और अत्याचार की शुरूआत सुरक्षा के लिए क़दम उठाने से बहुत पहले ही शुरू हो जाती है. उत्पीड़न अक्सर उन क़ानूनों की वजह से होता है जो यौन पसंदगी, लैंगिक पहचान और उसकी अभिव्यक्ति को जुर्म मानते हैं और उसके आधार पर भेदभाव करते हैं."

संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र विशेषज्ञ ने कहा कि इसके अलावा एलजीबीटीआई समुदाय के लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, पुलिस उत्पीड़न व हिंसा, सरकारी और ग़ैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा ग़ैर-न्यायिक हत्याओं का भी शिकार बनना पड़ता है. “इनमें चिकित्सा सेवाओं में दुर्व्यवहार, शामिल है जिसमें जबरन नसबंदी और तथाकथित रूपांतरण थैरेपी भी शामिल है.”

इसी स्थिति का ज़िक्र करते हुए वोल्कर टर्क ने कहा कि एलजीबीटीआई शरणार्थियों को पारगमन और मेज़बान देशों में पूर्वाग्रह और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.

वोल्कर टर्क ने कहा कि यहां तक कि उन स्थानों में जहां एलजीबीटीआई शरणार्थी स्वीकार किए जाते हैं और सेवाओं तक उनकी पहुंच होती है, वहां भी बहुत से लोग डर की वजह से अपनी यौन पसंदगी और लैंगिक पहचान छुपाते हैं - विशेष रूप से घनी आबादी वाले क्षेत्रों में, जहां उन्हें आसानी से निशाना बनाए जाने या हाशिए पर धकेले जाने का डर हो.

इसलिए ये ज़रूरी है कि एलजीबीटीआई संगठनों और लोगों से सलाह लेकर उनके लिए सुरक्षित स्थान और सुविधाएं विकसित की जाएँ.

 

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