भारत: डेढ़ अरब टीकाकरण, दीगर एक अरब टीकों के लिये चुनौतियाँ भी

29 जनवरी 2022

विश्व बैंक के अर्थशास्त्रियों, आरूषि भटनागर और ओवेन स्मिथ का मानना है कि भारत में कोविड-19 महामारी की वैक्सीन के डेढ़ अरब टीके लगाने का अहम मुक़ाम तो हासिल कर लिया गया है मगर, अगले एक अरब टीके लगाने का मुक़ाम हासिल करने के लिये, अब वैक्सीन की झिझक नहीं, बल्कि दूरगामी इलाक़ों तक कोविड-19 वैक्सीन के टीके पहुँचाने में बाधाओं को पार करना, मुख्य चुनौती होगी.

भारत ने, 7 जनवरी 2022 को, कोविड-19 वैक्सीन के डेढ़ अरब टीके लगाने का मुक़ाम हासिल किया है. जनवरी 2021 में, राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का आरम्भ होने के एक वर्ष से भी कम समय में, ये मुक़ाम हासिल किया गया. 

भारत की आबादी को वायरस से बचाने के लिये, अग्रिम मोर्चे पर तैनात कार्यकर्ताओं के प्रयासों से लेकर, एक अभिनव प्रौद्योगिकी मंच के ज़रिये टीकाकरण तक, यह वैक्सीन टीकाकरण अभियान एक प्रभावशाली चौतरफ़ा उपलब्धि रही है. लेकिन ऑमिक्रॉन वैरिएण्ट के आने से दुनिया भर में कोविड-19 टीकाकरण के प्रयासों में तेज़ी आई है, और इसलिये अब तक हासिल की गई गति को बनाए रखना और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा.

हालाँकि, 2 अरब टीके लगाने का मुक़ाम और उससे आगे पहुँचना, पहले अरब टीकों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है. मौजूदा अभियान की प्रगति की निगरानी रखने और कार्यान्वयन हेतु, साक्ष्य इकट्ठा करने के लिये, जनवरी 2021 से, भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केन्द्र (Center for Monitoring the Indian Economy) ने 24 राज्यों के एक लाख से अधिक भारतीय परिवारों के एक पैनल सर्वेक्षण में, कोविड-19 टीकाकरण पर कुछ प्रश्न जोड़े थे. 

टीका लगवाने में हिचकिचाहट

वैक्सीन झिझक में तेज़ी से गिरावट आई है और सामाजिक-आर्थिक मतभेद ख़त्म हो गए हैं.
World Bank
वैक्सीन झिझक में तेज़ी से गिरावट आई है और सामाजिक-आर्थिक मतभेद ख़त्म हो गए हैं.

इसमें, टीके लगवाने में झिझक, कवरेज दर और पहुँच में आने वाली सम्भावित बाधाएँ जैसे विषय शामिल थे. यहाँ हम 31 अगस्त 2021 तक एकत्र किए गए आँकड़ों के आधार पर कुछ प्रमुख तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं, जो भविष्य की राह उजागर करने में मददगार होंगे.

पहला, सर्वेक्षण के निष्कर्षों से मालूम होता है कि अगर वास्तव में कभी ऐसा था भी, तो भी टीका लगाने में हिचकिचाहट अब एक बड़ी बाधा नहीं है. वे परिवार, जो यह कहते थे कि अगर सरकार कोविड-19 वैक्सीन मुफ़्त देगी, तो वो इसे लगवाने के लिये क़तई तैयार नहीं होंगे. ऐसे परिवारों की संख्या जनवरी में 14 प्रतिशत थी जो कम होकर अगस्त तक 3 प्रतिशत हो गई. दूसरी लहर के तुरन्त बाद, टीकाकरण में सबसे तेज़ मासिक गिरावट आई, जिसके दौरान देश भर में कोविड-19 मामले और मौतें चरम पर थीं.

इसके अलावा, जबकि वर्ष 2022 की शुरुआत में वैक्सीन हिचकिचाहट में स्पष्ट सामाजिक-आर्थिक अन्तर थे - सबसे ग़रीब लोगों के मुक़ाबले, सबसे अमीर वर्ग में लगभग दोगुना हिचकिचाहट थी – लेकिन यह अन्तर अब ग़ायब हो गए हैं, और झिझक अब लगभग सभी वर्गों में समान रूप से कम हो गई है. 

हालाँकि, अनुसूचित जनजाति की आबादी के बीच, अब भी वैक्सीन हिचकिचाहट की उच्चतम दर 9 प्रतिशत से अधिक है. लेकिन कुल मिलाकर, और पिछले राष्ट्रीय अध्ययनों (यहाँ और यहाँ देखें) के अनुरूप, दुनिया के अन्य देशों की तुलना में, भारत में वैक्सीन हिचकिचाहट एक छोटी समस्या ही रह गई है.

दूसरा, सर्वेक्षण के निष्कर्ष भारत के कोविड-19 वैक्सीन अभियान के प्रभावशाली विस्तार को उजागर करते हैं, लेकिन कुछ खाइयाँ अब भी पाटनी बाक़ी हैं. परिवार के कम से कम एक सदस्य के पूर्ण टीकाकरण की जानकारी देने वाले परिवारों की हिस्सेदारी, अप्रैल में 17.5 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 70.4 प्रतिसत हो गई थी. 

प्रशासनिक आँकड़ों की ही तरह, राज्यों में भी टीकाकरण दरों में महत्वपूर्ण अन्तर दिखे. राष्ट्रीय स्तर पर, कम से कम एक सदस्य के टीकाकरण वाले 96 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि यह नि:शुल्क प्राप्त किया गया था, जो सार्वजनिक क्षेत्र के वितरण की प्रबलता पर प्रकाश डालता है. 

इसके साथ ही, वैक्सीन कवरेज में महत्वपूर्ण असमानताओं के भी प्रमाण हैं, जो टीकाकरण अभियान के शुरुआती चरणों के समय से ही बने हुए हैं. उच्चतम वर्ग के 66 प्रतिशत की तुलना में सबसे निम्न वर्ग का कवरेज 43 प्रतिशत है. 

राज्य स्तर पर, निम्न-आय और उच्च-आय वाले राज्यों में, न्यायसंगत कवरेज विस्तार में व्यापक भिन्नता है. दिलचस्प बात यह है कि 2015-16 में एनएफ़एचएस-4 सर्वेक्षण के अनुसार, कोविड-19 वैक्सीन कवरेज में सामाजिक आर्थिक अन्तर, बच्चों के टीकाकरण के दौरान दर्ज किये गए अन्तर से मेल खाता है.

वंचितों तक पहुँच अहम

वैक्सीन का कवरेज प्रभावशाली है, लेकिन कई अन्तराल अभी भी मौजूद हैं.
World Bank
वैक्सीन का कवरेज प्रभावशाली है, लेकिन कई अन्तराल अभी भी मौजूद हैं.

तीसरा, हालाँकि टीकाकरण में हिचकिचाहट अब एक प्रमुख मुद्दा नहीं प्रतीत होता है, सर्वेक्षण के निष्कर्ष, व्यापक टीकाकरण तक पहुँच के लिये अन्य सम्भावित बाधाओं की ओर इशारा करते हैं. शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों (66 प्रतिशत व 52 प्रतिशत) और मोबाइल इण्टरनेट पहुँच वाले व मोबाइल इण्टरनेट तक पहुँच नहीं होने वाले लोगों (59 प्रतिशत व 51 प्रतिशत) के बीच, टीकाकरण में महत्वपूर्ण अन्तर है. 

ज़रूरी नहीं होने पर भी, ऑनलाइन पंजीकरण टीकाकरण के लिये सबसे आम प्रवेश बिन्दु है. और जबकि सभी उत्तरदाताओं में से 77 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें कोविड-19 टीका लगवाने के केन्द्र की जानकारी थी, लेकिन टीका न लगवाने वाले लोगों में से केवल 58 प्रतिशत लोगों ने इसकी जानकारी होने की बात कही. 

दरअसल, टीकाकरण से वंचित सबसे ग़रीब वर्ग में, वैक्सीन का टीका कहाँ लगना है, इसके बारे में जागरूकता सबसे कम थी, और उनमें से आधे से भी कम को उस स्थान के बारे में जानकारी थी, जहाँ उन्हें टीका लगाया जा सकता था.

भारत में बहुत कम समय में कोविड-19 टीकाकरण पर असाधारण प्रगति हुई है. लेकिन अगले एक अरब टीके लगाने मुक़ाम हासिल करने के लिये, आबादी के ग़रीब वर्ग तक पहुँचने की आवश्यकता होगी, जिसके लिये टीके पहुँचाने में मुख्य बाधाओं का ज्ञान, जागरूकता, निकटता और सुविधा शामिल हो सकती है. देश के कोने-कोने तक वितरण के लिये, इन पहलुओं पर अधिक ध्यान देने से,

महामारी को ख़त्म करने की दिशा में एक क़दम और नज़दीक पहुँचने की कुंजी मिल सकती है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.

 

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