कोविड-19 का श्रम बाज़ार पर असर - बढ़ती बेरोज़गारी, निर्धनता और विषमता

2 जून 2021

वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण श्रम बाज़ार में उपजे संकट के ख़त्म होने के आसार फ़िलहाल नहीं है, और रोज़गार के अवसरों में होने वाली बढ़ोत्तरी, वर्ष 2023 तक इस नुक़सान की भरपाई नहीं कर पाएगी. अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा बुधवार को जारी एक रिपोर्ट दर्शाती है कि वैश्विक संकट के कारण, 2022 तक बेरोज़गारों की संख्या बढ़कर 20 करोड़ 50 लाख हो जाएगी, और निर्धनों की संख्या में वृद्धि होने के साथ-साथ विषमता भी बढ़ेगी.  

यूएन श्रम एजेंसी की World Employment and Social Outlook: Trends 2021 नामक रिपोर्ट बताती है कि कोरोनावायरस संकट के कारण रोज़गार क्षेत्र में खाई 2021 के अन्त तक साढ़े सात करोड़ हो जाएगी. 2022 में इसमें गिरावट आने और दो करोड़ 30 लाख रह जाने की सम्भावना है.

रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया मौजूदा स्वास्थ्य संकट से उबर तो जाएगी, मगर इससे कामकाजी निर्धनता (Working poverty) के उन्मूलन में पिछले पाँच वर्षों की प्रगति व्यर्थ हो गई है.

यूएन एजेंसी के महानिदेशक गाय राइडर ने कहा, “हम पीछे चले गए हैं, हम बहुत ज़्यादा पीछे चले गए हैं.”

“कामकाजी निर्धनता 2015 के स्तर पर लौट गई है; इसका अर्थ है कि जब 2030 का टिकाऊ विकास एजेण्डा तय हुआ था, हम उसी शुरुआती रेखा पर हैं.”

रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2021 के पूर्वार्ध में, लातिन अमेरिका, कैरीबियाई, योरोप और मध्य एशिया, सभी क्षेत्र असमान पुनर्बहाली से पीड़ित हैं.

एक अनुमान के मुताबिक इन क्षेत्रों में, पहली तिमाही में कामकाजी घण्टों का आठ फ़ीसदी से अधिक नुक़सान हुआ है, जबकि दूसरी तिमाही में यह छह फ़ीसदी से ज़्यादा रहा है.

यह नुक़सान वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है, जिसे पहली तिमाही के लिये 4.8 प्रतिशत और दूसरी तिमाही के लिये 4.4 प्रतिशत आँका गया है.

यूएन एजेंसी का अनुमान है कि वर्ष 2022 तक वैश्विक बेरोज़गारी बढ़कर 20 करोड़ 50 लाख हो जाएगी, जबकि 2019 में यह 18 करोड़ 70 लाख थी. 

महिलाओं व युवाओं पर असर

रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं पर इस संकट का विषमतापूर्ण असर हुआ है – महिलाओं के लिये 2020 में रोज़गार के अवसरों में पाँच प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि पुरुषों के लिये यह आँकड़ा 3.9 प्रतिशत है.

युवजन के लिये रोज़गार के अवसरों पर आर्थिक सुस्ती का असर जारी रहा है. वर्ष 2020 में 8.7 प्रतिशत की गिरावट आई है जबकि वयस्कों के लिये यह 3.7 प्रतिशत है.

रिपोर्ट के मुताबिक मध्य-आय वाले देशों में संकट का सबसे अधिक असर देखा गया है, जहाँ युवाओं के लिये रोज़गार मिलने में देरी और श्रम बाज़ार में आए व्यवधान के असर को लम्बे समय तक महसूस किये जाने की आशंका है.

महामारी के कारण उपजे व्यवधान का अनौपचारिक सैक्टर में काम कर रहे, दो अरब कामगारों पर विनाशकारी असर हुआ है. वर्ष 2019 के मुक़ाबले, अतिरिक्त 10 करोड़ 80 लाख कामगार अब ‘ग़रीब’ या ‘बेहद ग़रीब’ की श्रेणी में हैं.

इसका अर्थ है कि वे अपने परिवार के साथ प्रतिदिन, प्रति व्यक्ति, 3.20 डॉलर पर गुज़ारा करने के लिये मजबूर हैं.

यूएन एजेंसी के प्रमुख ने कहा कि टीकाकरण मुहिम को मज़बूती मिलने के साथ, आर्थिक पुनर्बहाली के संकेत दिखाई दे रहे है, मगर यह पुनर्बहाली विषमतापूर्ण और नाज़ुक होने की सम्भावना अधिक है.

इसकी वजह वैक्सीन का विषमतापूर्ण वितरण और विकासशील देशों में आर्थिक स्फूर्ति प्रदान करने वाले पैकेजों की सीमित क्षमता है.

 

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