आपबीती: शिविर में आगजनी के बाद, फिर से सदमे में रोहिंज्या समुदाय

27 अप्रैल 2021

एक रोहिंज्या शरणार्थी और अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) के स्वैच्छिक कार्यकर्ता ने यूएन न्यूज़ को अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा है कि शरणार्थी शिविर में आग लगने की घटना के बाद, समुदाय एक बार फिर से गहरे सदमे में है. मार्च 2021 में, बांग्लादेश के कॉक्सेस बाज़ार के शरणार्थी शिविर को विकराल आग ने अपनी चपेट में ले लिया था, जिसमें कम से कम 11 लोगों की मौत हुई और 45 हज़ार से ज़्यादा लोग बेघर हो गए.

मोहम्मद आलम उन आठ लाख रोहिंज्या शरणार्थियों में से एक हैं, जिन्होंने म्याँमार में अशान्त हालात से जान बचाकर बांग्लादेश में पिछले अनेक वर्षों से कॉक्सेस बाज़ार में शरण ली हुई है.

उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया कि उनकी सभी सम्पत्ति आग में जल गई और अन्य लोगों की तरह वो भी अपने भविष्य को फिर से पटरी लाने की कोशिशों में जुटे हैं.

"मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे म्याँमार में 2017 की हिंसा जैसी भयावह घटना का सामना फिर से करना पड़ेगा.

मैंने 22 मार्च को एक पड़ोसी शिविर से धुँआ उठते देखा, मगर इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. शुष्क मौसम के दौरान ऐसा आमतौर पर होता रहता है.

मैंने मान लिया कि पुरानी घटनाओं की तरह इस बार भी अग्निशमन दल द्वारा इसे जल्द बुझा दिया जाएगा. मैं कभी भी इसके विकराल स्तर का अन्दाज़ा नहीं लगा सकता था.

जब मैंने आग की लपटें अपने शिविर के नज़दीक बढ़ती देखीं, तो मैंने हरक़त में आते हुए अपनी माँ और तीन अन्य छोटे भाई-बहनों को वहाँ से हटाया.

जब मैं लौट कर अपना कुछ सामान लेने आया तो मुझे अपने सिर पर लपटें महसूस हुईं और मैं कुछ क्षणों के लिये बेहोश हो गया.

मेरे पिता ने मुझे उठाया और वो मुझे शरणस्थल से बाहर ले गए. हम अपनी कमर पर रखकर बस कपड़े ही बचा पाए.

बाक़ी सब कुछ जल गया. इस बीच मेरी माँ और भाई-बहन का कहीं पता नहीं चल पा रहा था.

मैंने बदहवासी में उनकी कुछ घण्टों तक तलाश की. सौभाग्य से, वे हमें मेरे एक मित्र के घर पर मिले.

तीन हफ़्तों तक अलग-अलग रहने के बाद, अब हम फिर से एक साथ रहने लगे हैं.

ऐसा प्रतीत होता है कि अतीत के ज़ख़्मों को भुलाने में लगे रोहिंज्या समुदाय को एक बार फिर सदमा लगा है.

शरणार्थी दबाव में हैं और आग लगने की घटनाओं से आशंका के प्रति चिन्तित हैं. लोग अपने परिजनों, सम्पत्ति और पहले के घरों में अपने जीवन को खोने का शोक मना रहे हैं.

आगजनी के बाद, राहत कर्मचारी यहाँ ज़मीनी स्तर पर मानवीय राहत कार्यों में सहायता व समन्वय के लिये पहुँचे.

मोहम्मद आलम, एक रोहिंज्या शरणार्थी हैं और अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के साथ सामुदायिक जागरूकता प्रसार में जुटे हैं.
IOM/Mashrif Abdullah Al
मोहम्मद आलम, एक रोहिंज्या शरणार्थी हैं और अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के साथ सामुदायिक जागरूकता प्रसार में जुटे हैं.

उन्होंने सुविधाओं की जल्द पुनर्बहाली सुनिश्चित की, जिनमें स्वास्थ्य केन्द्र, शौचालय और वितरण केन्द्र शामिल हैं.

मैंने यहाँ अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) की टीमों को रात-दिन काम करते देखा है, जो हमारी देखभाल सुनिश्चित करने के लिये प्रयासरत हैं.

एक शरणार्थी के तौर पर, मैं इस सेवा के लिये अनुग्रहित हूँ. मैं, प्रवासन संगठन के एक स्वैच्छिक कार्यकर्ता के रूप में, जवाबी कार्रवाई का हिस्सा होने और अपने समुदाय की सेवा करने में सम्मानित महसूस करता हूँ.

सामुदायिक जागरूकता

आग लगने की घटना के बाद, मैंने कैम्प 9 में काम करना शुरू किया.

हम सभी इलाक़ों में जाते हैं और अपने भोंपू के ज़रिये समुदाय तक सन्देश पहुँचाते हैं. ये सन्देश भिन्न-भिन्न विषयों पर आधारित होते हैं, जैसेकि भोजन, पोषण, शरणार्थी पंजीकरण और ज़रूरतमन्दों के लिये दवाएँ.

अब अन्य लोगों के साथ रचनात्मक सहयोग में जुटे हैं ताकि इन सन्देशों को हर एक शरणस्थल तक पहुँचाया जा सके.

अगर किसी के सामने कोई समस्या है, तो हम उसे सहारा देने के तरीक़ों की पड़ताल करते हैं और समस्या को सुलझाते है.

अगर उन्हें ज़रूरत के अनुरूप मदद नहीं मिल पा रही है, तो वे शिकायत डेस्क पर सम्पर्क कर सकते हैं.

हम उन्हें ये भी दिखाते हैं कि ये सेवाएँ किन स्थानों पर मुहैया कराई जा रही हैं.

हम, लोगों को बताते हैं कि आग लगने की स्थिति में वे अपनी सुरक्षा किस तरह कर सकते हैं.

हम आपदा प्रबन्धन इकाई के स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं के साथ नज़दीकी तौर पर काम करते हैं, जिन्हें समुदाय में अग्निशमक (Firefighters) के नाम से भी जाना जाता है.

हम ये सन्देश मस्जिदों के बाहर लाउडस्पीकर पर प्रसारित करते हैं. हम लोगों को अपने बच्चों व बुज़ुर्गों का ख़याल रखने की सलाह देते हैं.

हम उनसे सिफ़ारिश करते हैं कि आग-प्रभावित इलाक़ों में जाने से बचा जाना चाहिये, क्योंकि उनके घायल होने का ख़तरा है.

मुझे इन कार्यों में बड़ी संतुष्टि का ऐहसास होता है. लोगों के सामने बड़ी चुनौतियाँ व मुद्दे हैं. वे अपनी ज़िन्दगियों में संघर्ष करते हैं.

मैं, अगर इन हालात में उनकी मदद कर सकूँ, तो मुझे लगता है यह मेरे लिये आशीर्वादस्वरूप है. मुझे अपने बारे में अच्छा महसूस होता है.

मैं सोचता हूँ कि बदतर समय में हमें लोगों की मदद करनी चाहिये. इससे मुझे ख़ुशी मिलती है.

कुटुपलाँग महाशिविर में आग लगने से शरणार्थियों की शरणस्थली और सम्पत्ति जलकर खाक हो गई.
UNICEF Bangladesh 2021
कुटुपलाँग महाशिविर में आग लगने से शरणार्थियों की शरणस्थली और सम्पत्ति जलकर खाक हो गई.

म्याँमार में जीवन

मेरा बचपन भी दुनिया के अन्य बच्चों की तरह बीता. मैं अपने गाँव में स्कूल जाता था, अपने दोस्तों के साथ खेलता था और अपने परिवार व सात भाई-बहनों के साथ ख़ुशी भरा जीवन व्यतीत कर रहा था.

मेरे माता-पिता किसान थे, और कृषि व मछली-पालन से जुड़े थे. मैंने दैनिक कार्यों में अपने पिता की मदद करने के साथ-साथ हाईस्कूल तक की पढ़ाई पूरी करने में सफलता हासिल की.

गाँव में हमारे घर में, हम भूमि के सहारे अपनी गुज़र-बसर कर रहे थे, लेकिन हमारा भाग्य हमारे हाथ में नहीं था.

वहाँ दमन को देखकर, हमने 27 अगस्त 2017 को सीमा पार करने का फ़ैसला किया. हम कुछ दिन तक बांग्लादेश-म्याँमार की सीमा के पास रहे.

उसके बाद, अगले एक महीने तक, हम एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाकर अपने दोस्तों व सम्बन्धियों के साथ तब तक रहे, जब तक हम अन्तत: शरणार्थी शिविरों में नहीं पहुँच गए.

शुरुआती दिनों में, भोजन से लेकर दवाओं तक, अपनी ज़रूरतों का सामान ढूंढना एक संघर्ष था.

जैसे-जैसे ज़्यादा सहायता धनराशि आनी शुरू हुई, हमें और भी समर्थन मिलने लगा.

हम अपने शरणस्थल फिर से बना पाए, शैक्षिक कार्यक्रमों तक पहुँच सम्भव हुई, और अपने लिये आय का इन्तज़ाम करने के उद्देश्य से आजीविका के अवसर मिले.

समय बीतने के साथ, शिविर में जीवन पहले से कहीं अधिक अनुशासित हो गया, और मूल स्थान पर हिंसा से सदमे में रह रहे लोगों के जीवन में फिर से ख़ुशी ने दस्तक दी.

शुरुआत में, मैं रोहिंज्या संकट की कवरेज कर रहे पत्रकारों के लिये दुभाषिये के तौर पर काम किया करता था.

मैं भाग्यशाली था कि वर्ष 2018 में, मुझे यूएन प्रवासन एजेंसी के साथ एक स्वैच्छिक कार्यकर्ता के तौर पर रोज़गार मिल गया.

मुझसे बड़े भाई-बहनों की यहाँ शादी हुई और अब उनके अपने परिवार हैं.

ग्रामीण जीवन की पुनर्बहाली

हाल के वर्षों में, हम राख़ीन के अपने पैतृक गाँव जैसा जीवन, यहाँ के शिविर में फिर से कुछ हद तक स्थापित कर पाए.

कभी-कभी ऐसा लगता है कि जबसे हम यहाँ आए हैं, तब से पूरा जीवन गुज़र गया है.

अतीत के दिनों, यहाँ आग लगने की घटना और कोविड-19 के फैलाव के बीच, आशावान बने रह पाना कठिन है.

अधिकतर लोगों ने अब उम्मीद करना छोड़ दिया है, चूँकि उसका कोई फ़ायदा नहीं है. अब से एक महीने की तो बात छोड़िये, हम यही नहीं जानते कि कल क्या होने वाला है.

हम बस आशा कर सकते हैं कि भावी पीढ़ी का भविष्य हमसे बेहतर होगा. मगर मुझे निजी तौर पर उम्मीद है कि बुरे दिनों के बाद बेहतर दिन आएंगे."

 

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