शरणार्थी उच्चायुक्त की चुनौती: अन्तरराष्ट्रीय समुदाय उन्हें 'बेकार' करके दिखाए तो मानें

15 दिसम्बर 2020

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के प्रमुख फ़िलिपो ग्रैण्डी ने विश्व नेताओं को चुनौती देने के अन्दाज़ में कहा है कि अगर वो चाहें तो, युद्ध और असुरक्षा के कारण, करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़कर दर-दर भटकने के लिये मजबूर करने वाले कारणों के हल निकालकर, शरणार्थी एजेंसी के कामकाज को बेमानी साबित कर सकते हैं.

उच्चायुक्त फ़िलिपो ग्रैण्डी ने यूएन शरणार्थी एजेंसी की 70वीं वर्षगाँठ के मौक़े पर दिये अपने सन्देश में अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से एक ऐसी दुनिया बनाने का आहवान किया है जिसमें यूएन शरणार्थी एजेंसी की, वाक़ई में कोई ज़रूरत ना हो और किसी भी इनसान को अपना घर व अपना स्थान छोड़ने के लिये मजबूर ना होना पड़े.

उन्होंने कहा है, “मुझे ग़लत ना समझें: आज की सच्चाई को देखें, तो हमारा काम बहुत अहम है, लेकिन विरोधाभास स्वरूप ये बात भी सच है कि हमारी ज़रूरत ही नहीं होनी चाहिये. अगर, हम अपनी एजेंसी के कामकाज की और वर्षगाँठें इसी तरह से मनाते रहे तो, उसका केवल यही मतलब निकलेगा कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय विफल रहा है.”

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 70 वर्ष पहले, उन करोड़ों योरोपीय लोगों की मदद करने के लिये शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय का गठन किया था, जिन्हें दूसरे विश्व युद्ध के कारण अपने घर या तो छोड़ने पड़े थे, या उनके घर तबाह हो गए थे.

मूलतः ये एजेंसी एक सीमित समय के लिये गठित की गई थी, लेकिन उसका काम ना केवल जारी रहा, बल्कि उसका दायरा भी बढ़ता गया, क्योंकि दुनिया भर में ऐसे संकट जारी रहे हैं जिनके कारण लोगों को सुरक्षा और बेहतरी के लिये अपने घर व स्थान छोड़कर अन्य स्थानों पर जाना पड़ता है.

नए और जटिल संकट

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने शरणार्थी एजेंसी के कामकाज में बढ़ती चुनौतियों और बदलते परिदृश्यों का ख़ाका पेश किया है.

उन्होंने कहा, “आज के संघर्षों के दायरे देशों की सीमाओं, यहाँ तक कि क्षेत्रों से भी परे तक फैले हुए हैं. जलवायु संकट अपनी जड़ें फैला रहा है. अत्यन्त ग़रीबी और भुखमरी बढ़ रही हैं; महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा हर तरफ़ देखी जा रही है.”

“और अब कोविड-19 महामारी ने सबसे ज़्यादा कमज़ोर आबादियों व समुदायों पर भारी तबाही डाल दी है, और इसके परिणास्वरूप, महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को अपने घर छोडने के लिये भी मजबूर होना पड़ा है.”

यूएन प्रमुख एंतोनियो गुटेरश भी यूएन शरणार्थी उच्चायुक्त रह चुके हैं. उन्होंने चुनौतियों का सामना करने के लिये और ज़्यादा अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की पुकार लगाई है.

उन्होंने कहा, “मैं तमाम देशों से शरणार्थियों पर ग्लोबल कॉम्पैक्ट के लिये अपने संकल्प और ज़्यादा मज़बूत करने का आग्रह करता हूँ. ऐसा करके वो शरणार्थियों और उन्हें अपने यहाँ पनाह देने वाले देशों के लिये अपनी ज़िम्मेदारियाँ पहचान सकेंगे; और एकजुटता, मानवाधिकारों और मानव गरिमा के आधार पर टिकाऊ समाधान खोज सकेंगे.”

हर 100 में से एक विस्थापित

वर्ष 2019 के अन्त तक के आँकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 7 करोड़ 95 लाख लोग, यानि वैश्विक आबादी के हर 100 में से एक व्यक्ति के बराबर संख्या, जबरन विस्थापित थी. उनमें से लगभग 2 करोड़ 60 लाख लोग शरणार्थी थे, और क़रीब साढ़े 4 करोड़, अपने ही देशों में विस्थापित लोग शामिल थे.

इनके अलावा, लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास किसी भी देश की नागरिकता नहीं है, जिन्हें राष्ट्रीयता व उनके बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा गया है, मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, रोज़गार और आवागमन की आज़ादी.

यूएन शरणार्थी एजेंसी, अपने लगभग 17 हज़ार 300 कर्मचारियों के साथ, लगभग 135 देशों में काम करती है, और उनमें से लगभग 90 प्रतिशत कर्मचारी ज़रूरत वाले स्थानों पर ही काम करते हैं. ये एजेंसी विस्थापित लोगों की अनेक तरह से मदद करने की कोशिश करती है जिसमें क़ानूनी सुरक्षा व संरक्षा, प्रशासनिक मुद्दे, सामुदायिक सेवाएँ, सार्वजनिक मामले और स्वास्थ्य शामिल हैं.

अराजनैतिक

यूएन शरणार्थी उच्चायुक्त फ़िलिपो ग्रैण्डी ने एजेंसी के शासनादेश (Mandate) की अराजनैतिक प्रकृति की तरफ़ ध्यान आकर्षित किया.

अपने सन्देश में उन्होंने कहा, “जब देशों और लोगों के भाग्य के बारे में फ़ैसले होते हैं, तो हम आमतौर पर उस जगह पर मौजूद नहीं होते हैं. लेकिन, हम निश्चित रूप से वहाँ मौजूद होते हैं, जहाँ हमारी ज़रूरत होती है..." 

"ऐसे लोगों की मदद करने के लिये जिन्हें उन विवादों के अनसुलझे रहने के हालात के बीच, विस्थापित होने के लिये मजबूर होना पड़ता है.”

फ़िलिपो ग्रैण्डी ने असाधारण काम करने और लगातार नई चुनौतियों पर पार पाने के लिये एजेंसी के कर्मचारियों की सराहना की.

उन्होंने कहा, “अगर युद्धरत पक्ष किसी संघर्षविराम पर सहमत होते हैं, अगर विस्थापित लोगों की सुरक्षित घर वापसी हो सकती है, अगर सरकारें, लोगों के पुनर्वास की ज़िम्मेदारी उठाएँ, अगर देश पनाह और अपने मूल स्थानों पर ख़तरनाक हालात का सामना करने वाले शरणार्थियों को ज़बरदस्ती वहाँ नहीं भेजने के सिद्धान्त की अपनी ज़िम्मेदारियाँ और वादे पूरे करें, तो हमें ज़्यादा चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी.”
 

 

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