'नाज़ियों की हार के 75 वर्ष बाद, आज भी बहुत से लोग युद्ध की विभीषिका में हैं'

9 मई 2020

संयुक्त राष्ट्र हर वर्ष 8 और 9 मई को उन लाखों लोगों को याद करता है जिनकी ज़िन्दगी दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ख़त्म हो गई थी. उस भीषण तबाही वाले संघर्ष के बाद ही संयुक्त राष्ट्र वजूद में आया था. यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने शुक्रवार, 8 मई को एक वीडियो संदेश में आगाह करते हुए कहा कि मतभेद अब भी मौजूद हैं, और उन्होंने एक ऐसी दुनिया बनाने की पुकार लगाई जिसकी बुनियाद शान्ति व एकता पर टिकी हो.

अपने वीडियो संदेश में महासचिव ने उन लोगों को श्रद्दांजलि अर्पित की है जिन्होंने उस युद्ध में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया.

उन्होंने कहा कि मई 1945 में फासीवाद और अत्याचार पर वो विजय एक नए युग की शुरुआत थी, लेकिन ”हम ये नहीं भूल सकते कि नाज़ियों ने हॉलोकॉस्ट और अन्य दर्दनाक व भीषण अपराध भी किए थे.”

उसी वर्ष एक सामूहिक इच्छाशक्ति के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की भयावह तबाही से बचाने के लिए वजूद में आया था.

विश्व ने 1939 और 1945 के बीच जो तबाही देखी थी, उसने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की महत्ता के लिए सराहना पैदा कर दी थी.

कोरोनावायरस, विभाजन व नफ़रत

यूएन महासचिव का कहना है कि दूसरा विश्व युद्ध समाप्त होने के 75 वर्ष बाद भी जब कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी ने पूरी दुनिया में तबाही मचा दी है, तब भी कुछ ऐसे तत्व हैं जो विभाजक बन रहे हैं और नफ़रतें फैला रहे हैं, जबकि इस महामारी को केवल अंतरराष्ट्रीय एकजुट सामुदायिक भावना से ही हराया जा सकता है.

यूएन प्रमुख ने शुक्रवार को ही एक अन्य वैश्विक अपील जारी की जिसमें नफ़रत, नस्लवाद और भेदभाव की सूनामी को हराने के लिए एकजुटता का आहवान किया.

उन्होंने कहा कि कोविड-19 के संक्रमण के साथ ही नफ़रत नामक महामारी ने भी विशाल चुनौती खड़ी कर दी है.

एंतोनियो गुटेरेश ने स्वास्थ्य संकट के दौरान नफ़रत भरी भाषा के कुछ उदाहरण भी दिए जिनमें विदेशी विरोधी भावनाओं से लेकर यहूदी विरोध की निराधार साज़िशों की धारणाएँ और मुसलमानों पर हमले शामिल हैं. 

उन्होंने सिविल सोसायटी का आहवान किया कि निर्बल और वंचित लोगों तक पहुँच मज़बूत की जाए, साथ ही धार्मिक हस्तियों से परस्पर सम्मान की मिसाल पेश करने का भी आहवान किया.

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति व संयुक्त राष्ट्र का जन्म होने की 75वीं वर्षगाँठ के अवसर पर विश्व से आग्रह किया कि 1945 से सीखे गए सबक याद रखें और महामारी का मुक़ाबला करने और शान्ति व सुरक्षा वाले भविष्य का निर्माण करें जहाँ सभी के लिए सम्मान भी हो.

अतीत की व्यथित गूँज

संयुक्त राष्ट्र के राजनैतिक मामलों की अपर महासचिव रोज़मैरी डी कार्लो ने शुक्रवार को सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक (ऐर्रिया फ़ॉर्मूला) में आगाह करते हुए कहा कि, आज, हम अतीत की व्यथित कर देने वाली गूँज देख रहे हैं.

(ऐर्रिया फ़ॉर्मूला सुरक्षा परिषद की एक ऐसी अनौपचारिक बैठक होती है जिसमें    ग़ैर-सरकारी संगठन भी परिषद के 15 सदस्यों के सामने अपनी बात पेश कर सकते हैं.)

रोज़मैरी डी कार्लो ने कहा, “लोकलुभानवाद, सर्वाधिकारवाद, राष्ट्रवाद और नस्लवाद व भेदभाव की आवाज़ें फिर से और ज़्यादा शोर के साथ सुनाई दे रही हैं. हमें उन ताक़तों का सामना करना होगा जो दुनिया को फिर से उसी हिंसक व शर्मनाक अतीत की तरफ़ ढकेल देना चाहती हैं.”

उन्होंने ध्यान दिलाते हुए कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद योरोप ने अंतरराष्ट्रीय मदद की बदौलत एक ज़्यादा ख़ुशहाल और शान्तिपूर्ण समाज का निर्माण किया.

रोज़मैरी डी कार्लो ने स्पष्टता के साथ कहा कि मौजूदा महामारी के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने एक अवसर है कि पहले इस वैश्विक स्वास्थ्य संकट पर क़ाबू पाया जाए और उसके बाद ज़्यादा समानता वाला और शान्तिपूर्ण विश्व बनाए.

संयुक्त राष्ट्र में रूस के उप स्थाई प्रतिनिधि दिमित्री पोलियन्सकी ने यूएन न्यूज़ के साथ बातचीत मे कहा कि जो लोग पूर्व सोवियत संघ वाले देशों में रहते हैं, वहाँ 9 मई का दिन उन हमवतनों व अपने प्रियजनों की याद में मनाया जाता है जिन्होंने विजय की ख़ातिर अपने जीवन का बलिदान किया. “उन्हीं को ये श्रेय जाता है कि आज हम शान्ति में जीवन जी रहे हैं.“

उन्होंने कहा कि इस वर्ष पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे देशों के यूएन मिशन उन हमवतनों के बारे में जानकारी एकत्र कर रहे हैं जिन्होंने युद्ध में लड़ाई लड़ी, वीरता दिखाई या युद्ध के दौरान देश के भीतर रहकर ही मोर्चा संभाला.

उनकी कहानियाँ सोशल मीडिया पर प्रकाशित की जाएंगी.

 

 

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