पत्रकारों के लिए दुनिया में हर स्थान है जोखिम भरा

20 जनवरी 2020

दुनिया भर में लोक हित के लिए आवाज़ बुलन्द करने वाले पत्रकारों को सभी स्थानों पर बहुत जोखिम का सामना करना पड़ रहा है और पत्रकारों की असुरक्षा के मामले में सबसे ज़्यादा ख़तरनाक़ लैटिन अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्र रहे जहाँ साल 2019 में 22 पत्रकारों की हत्याएँ हुईं. इस तरह प्रेस के लिए ये सबसे ज़्यादा ख़तनाक़ स्थान रहे. उनके बाद एशिया-प्रशांत में 15 ओर अरब देशों में 10 पत्रकारों की हत्याएं हुईं.

संयुक्त राष्ट्र के शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन – यूनेस्को की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019 में दुनिया भर में 56 पत्रकारों की हत्याएँ हुईं.

अलबत्ता वर्ष 2018 की तुलना में 2019 में मारे गए पत्रकारों की संख्या में कुछ कमी हुई और ये 99 से कम हो कर 56 रही. मगर फिर भी प्रेस के सदस्यों को दुनिया में सभी स्थानों पर बहुत जोखिम का सामना करना पड़ रहा है.

यूनेस्को द्वारा संचालित ऑब्ज़रवेटरी ऑफ़ किल्ड जर्नलिस्ट्स द्वारा एकत्र आँकड़ों में ये जानकारी सामने आई है.

इन आँकड़ों में बताया गया है कि बीते दशक के दौरान दुनिया भर में 894 पत्रकारों की हत्याएँ की गईं, यानी औसतन 90 हर वर्ष.

युद्ध से भी ज़्यादा ख़तरनाक

यूनेस्को के आँकड़े दिखाते हैं कि पत्रकारों के लिए स्थानीय राजनीति, भ्रष्टाचार और अपराध जैसे मामलों की रिपोर्टिंग करना किसी युद्ध की स्थिति को कवर करने से भी ज़्यादा ख़तरनाक बन गया है.

वर्ष 2019 में पत्रकारों की हत्याओं के दो-तिहाई मामले ऐसे देशों में हुए जहाँ कोई सशस्त्र संघर्ष नहीं चल रहा है, इनमें ज़्यादातर पत्रकार ऐसे थे जो स्थानीय मुद्दों पर रिपोर्टिंग कर रहे थे.

नवंबर 2019 में यूनेस्को ने पत्रकारों के ख़िलाफ़ दंडमुक्ति समाप्त करने के लिए एक अभियान शुरू किया था जिसका नाम था - #KeepTruthAlive.

इस अभियानके ज़रिए उन ख़तरों की तरफ़ ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की गई जो पत्रकार अपने दैनिक जीवन में करते हैं.

इसमें ये भी ध्यान दिलाया गया था कि जिन पत्रकारों की हत्याएँ की गईं, उनमें 93 फ़ीसदी स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे थे.

इस अभियान में एक ऐसा डिजिटल नक्शा भी शामिल है जिसमें दुनिया भर में पत्रकारों के लिए दरपेश चुनौतियों और ख़तरों को बहुत स्पष्ट तरीक़े से पेश किया गया है.

आलोचना को ख़ामोश करने की कोशिश

यूनेस्को द्वारा सोमवार को जारी एक वक्तव्य में कहा गया है कि पत्रकारों पर हमले आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने और सूचना तक लोगों की पहुँच सीमित करने के प्रयास हैं.

पत्रकारों को अपनी हत्याएं होने के जोखिम के अलावा अपने कामकाज के सिलसिले में मौखिक व शारीरिक हमलों का भी सामना करना पड़ता है.

हाल के वर्षों में मीडिया और पत्रकारों के लिए शत्रुतापूर्ण माहौल और भड़काऊ दुष्प्रचार के बीच उन्हें बंदी बनाए जाने, उनका अपहरण करने और उन पर शारीरिक हिंसा किए जाने के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है.

यूनेस्को का कहना है कि मीडिया में ख़ासतौर से महिलाएँ बहुत निशाने पर रहती हैं. उन्हें अक्सर ऑनलाइन माध्यमों के ज़रिए परेशान किया जाता है और उन्हें लिंग आधारित हिंसा की भी धमकियाँ मिलती हैं.

यूनेस्को का कहना है कि वो दुनिया भर में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए हालात बेहतर बनाने के लिए संकल्पबद्ध है.

साथ ही ये भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि पत्रकारों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों के लिए जवाबदेही व क़ानूनी प्रक्रिया भी पक्की हो.

यूनेस्को द्वारा नवंबर 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि पत्रकारों पर होने वाले कुल हमलों में से लगभग सिर्फ़ 10 फ़ीसदी में ही ज़िम्मेदारों पर क़ानूनी कार्रवाई होती है.

यूनेस्को ने 2006 से जिन मामलों का रिकॉर्ड रखा है, उनमें पाया गया है कि 8 में से सिर्फ़ एक से भी कम मामले सुलझाए जा सके.

 

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