2 दिसम्बर 2019

जलवायु परिवर्तन तेज़ रफ़्तार से हो रहा है – औद्योगिक क्रांति के बाद पृथ्वी का औसत तापमान 1.1 डिग्री बढ़ चुका है जिसका लोगों के जीवन पर व्यापक असर हुआ है, और अगर मौजूदा रुझान इसी तरह से जारी रहे तो इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी 3.4 से 3.9 डिग्री सेल्सियस तक हो सकती है. मानवता के लिए इसके विनाशकारी नतीजे होंगे. स्पेन के मैड्रिड शहर में 2 दिसंबर से शुरू हुए वार्षिक यूएन जलवायु सम्मेलन (कॉप-25) से ठीक पहले यह चेतावनी जारी की गई है.

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने दो महीने पहले सितंबर 2019 में न्यूयॉर्क स्थित यूएन मुख्यालय में जलवायु शिखर वार्ता का आयोजन किया था और अब मैड्रिड में कॉप-25 सम्मेलन हो रहा है. इसी सम्मेलन से जुड़े कुछ सवालों के जवाब यहाँ दिए गए हैं. 

1. हाल ही में न्यूयॉर्क में जलवायु शिखर वार्ता आयोजित हुई थी. कॉप-25 बैठक उससे किन मायनों में अलग है.

सितंबर 2019 में यूएन मुख्यालय में जलवायु वार्ता को संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश की पहल पर बुलाया गया था. इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान जलवायु आपदा की ओर आकृष्ट करना और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए तेज़ प्रयासों को बढ़ावा देना था.

स्पेन की राजधानी मैड्रिड में आयोजित बैठक जलवायु परिवर्तन पर यूएन संधि पर मुहर लगाने वाले पक्षों का सम्मेलन है.

पहले यह सम्मेलन चिली में होना था लेकिन वहां अशांति होने के कारण इसे स्पेन में आयोजित किया गया है.

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संस्था (UNFCCC) का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि जलवायु संधि और उसे मज़बूत बनाने वाले वर्ष 2015 के पेरिस समझौते को अमल में लाया जा रहा है.

2. लेकिन संयुक्त राष्ट्र जलवायु मुद्दों पर इतना ध्यान क्यों केंद्रित कर रहा है?

जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के बारे में तथ्यों के सामने आने से चिंता है – विशेषकर चरम मौसम वाली घटनाओं और उनसे होने वाले असर के बारे में.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन का ताज़ा ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन दर्शाता है कि वातावरण में तीन प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों – कार्बन डाय ऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड - का स्तर लगातार बढ़ रहा है जिससे मानवता के भविष्य के लिए ख़तरा पैदा हो रहा है.

अगर यह रुझान जारी रहे तो फिर धरती के तापमान में वृद्धि होगी, जल सकंट पैदा होगा, समुद्री जल स्तर बढ़ेगा और समुद्री व भूमि पारिस्थितिक तंत्रों के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण संस्था (UNEP) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में सचेत किया है कि पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए वर्ष 2020 से 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में प्रतिवर्ष 7.6 फ़ीसदी की कमी सुनिश्चित करना ज़रूरी है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एक आसान लक्ष्य नहीं है और उपलब्ध अवसरों की अवधि लगातार सिकुड़ रही है.

3. सितंबर 2019 में जलवायु शिखर वार्ता से क्या हासिल हुआ?

वर्ष 2015 के पेरिस समझौते में 2020 की एक समयसीमा तय की गई है और उससे ठीक पहले जलवायु संकट पर ध्यान खींचने व कार्रवाई को गति देने में बैठक ने अहम भूमिका निभाई. इस शिखर वार्ता में कई देशों व सैक्टरों के नेता शामिल हुए.

क़रीब 70 देशों ने अपने राष्ट्रीय संकल्प वर्ष 2020 तक और ज़्यादा मज़बूत बनाने की इच्छा ज़ाहिर की है. ऐसे ही प्रयास 100 बड़े शहरों की ओर से किए जा रहे हैं जिनमें दुनिया के प्रमुख शहर शामिल हैं.

लघु द्वीपीय देशों ने वर्ष 2050 तक नैट कार्बन उत्सर्जन को शून्य बनाने का संकल्प लिया है और वर्ष 2030 तक उनकी योजना 100 फ़ीसदी नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करने की है.

पाकिस्तान से ग्वाटेमाला तक, कोलंबिया से नाईजीरिया तक और न्यूज़ीलैंड से बारबेडोस तक 11 अरब वृक्ष लगाने का संकल्प लिया गया है.

निजी क्षेत्र के 100 से ज़्यादा नेताओं ने हरित अर्थव्यवस्था की गति को तेज़ करने का संकल्प लिया है.

विश्व में सबसे ज़्यादा संपत्ति (दो ट्रिलियन डॉलर) वाले एक समूह ने वर्ष 2050 तक कार्बन न्यूट्रल परियोजनाओं में निवेश करने की प्रतिज्ञा ली है.

यह संकल्प हाल ही में ओसाका में जी-20 शिखर वार्ता के दौरान संपत्तियों का प्रबंधन (34 ट्रिलियन डॉलर) करने वाली कंपनियों के एक समूह द्वारा की गई घोषणा से अलग है.

इस समूह ने राजनैतिक नेताओं से जलवायु कार्रवाई का दायरा बढ़ाने, जीवाश्म ईंधनों पर सब्सिडी रोकने और कार्बन की क़ीमत तय करने की अपील की थी.

4. ज़रा रुकिए: UNEP, WMO, IPCC, UNFCCC, COP….ये सब क्या हैं?

इन सभी से तात्पर्य उन यूएन एजेंसियों या प्रयासों से है जिसके ज़रिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाया जा रहा है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण संस्था (UNEP) वैश्विक स्तर पर पर्यावरण मामलों के एजेंडा को स्थापित करने वाली संस्था है जिसका लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करना है.

विश्व मौसम विज्ञान संस्था (WMO) मौसम के पूर्वानुमान, जलवायु में आने वाले बदलावों और जल संसाधनों पर शोध सहित अन्य विषयों पर सहयोग को आगे बढ़ाने वाली यूएन एजेंसी है.

वर्ष 1988 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने यूएन पर्यावरण संस्था (UNEP) और विश्व मौसम विज्ञान संस्था (WMO) से जलवायु परिवर्तन पर एक अंतरसरकारी पैनल (IPCC) के गठन का आग्रह किया.

इस पैनल में सैकड़ों विशेषज्ञ शामिल हैं जो आंकड़ों की समीक्षा करते हैं और जलवायु कार्रवाई वार्ताओं के लिए प्रासंगिक वैज्ञानिक तथ्य साझा करते हैं.

संयुक्त राष्ट्र की तीनों संस्थाओं की ओर से प्रकाशित होने वाली रिपोर्टों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता से जगह बनाई है जिसके परिणामस्वरूप जलवायु संकट के प्रति चिंता व जागरूकता का प्रसार हुआ है.

जलवायु परिवर्तन पर यूएन फ़्रेमवर्क संधि (UNFCCC) के दस्तावेज़ पर वर्ष 1992 में ब्राज़ील के रियो डि जनेरियो में ‘अर्थ समिट’ के दौरान सहमति हुई.

इस संधि में सदस्य देशों ने वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की सघनता को स्थिर बनाने पर सहमति जताई है ताकि जलवायु प्रणाली में मानवीय गतिविधियों से होने वाले बदलावों को रोका जा सके.

अब तक 197 देश इस संधि पर मुहर लगा चुके हैं. यह संधि प्रभाव में वर्ष 1994 में आई जिसके बाद से हर साल आगे बढ़ने के रास्ते पर विचार-विमर्श के लिए ‘कॉंफ्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़’ या कॉप (COP) सम्मेलन आयोजित किया जाता है.

साल 2019 में यह 25वां सम्मेलन है जो स्पेन की राजधानी मैड्रिड में हो रहा है.

5. इस वर्ष जलवायु सम्मेलन क्यों अहम है?

ऐसा इसलिए क्योंकि कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर सदस्य देशों के लिए यूएन संस्था की ओर से कोई बाध्यता नहीं थी और ना ही संबंधित प्रावधानों को लागू करने का ढांचा था.

इस संधि का विस्तार हाल के वर्षों में हुआ है और सबसे अहम वर्ष 2015 में पेरिस जलवायु समझौता रहा है.

इस समझौते के तहत सदस्य देश वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रखने और जलवायु कार्रवाई के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा प्रयास करने के लिए राज़ी हुए हैं.

वर्ष 2020 से पहले होने वाला यह अंतिम सम्मेलन है. 2020 को एक निर्धारक साल के रूप में देखा जाता है जब कई देशों को अपनी नए जलवायु कार्रवाई योजनाएँ पेश करनी होंगी.

लेकिन कई मुद्दों पर अभी पूर्ण सहमति का अभाव है जिनमें एक अहम विषय जलवायु कार्रवाई के लिए वित्तीय संसाधनों के इंतज़ाम से जुड़ा है.

मौजूदा समय में इन तीन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए जा रहे हैं: वर्ष 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 45 फ़ीसदी की कटौती लाना; वर्ष 2050 तक कार्बन न्यूट्रैलिटी को हासिल करना (नैट कार्बन उत्सर्जन शून्य); और इस सदी के अंत तक वैश्वित तापमान में बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना.

जलवायु परिवर्तन पर समय निकला जा रहा है और दुनिया ज़्यादा समय ख़राब करने का ख़तरा मोल नहीं ले सकती. इसलिए एक निडर, निर्णायक और आगे बढ़ने के लिए महत्वाकांक्षी कार्रवाई पर जल्द से जल्द सहमति बनाना बेहद ज़रूरी है.

 

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