सीरिया में सैन्य तनाव बढ़ने पर आम लोगों की सुरक्षा की चिंता

10 अक्टूबर 2019

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) ने गुरूवार को कहा है कि सीरिया के पूर्वोत्तर इलाक़े में हाल के दिनों में बढ़े सैन्य तनाव के कारण लाखों लोगों को सुरक्षा की ख़ातिर वो इलाक़ा छोड़ना पड़ा है. इससे एक दिन पहले यानी बुधवार को ही तुर्की ने सीरिया में कुछ हवाई औरर ज़मीनी हमले किए थे.

शरणार्थी एजेंसी ने सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानूनों का सम्मान करने का आग्रह किया है. इनमें ज़रूरतमंद लोगों तक ज़रूरी सामग्री पहुँचाने के लिए एजेंसियों को रास्ता देना भी शामिल है.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त फ़िलिपो ग्रैंडी ने कहा है, "उत्तरी सीरिया में लाखों लोग अब भारी मुसीबत में हैं. आम लोगों और सिविलियन बुनियादी ढाँचे को नुक़सान नहीं पहुँचाया जाना चाहिए."

एजेंसी ने आगाह करते हुए कहा है कि मौजूदा हालात से सीरिया की स्थिति और ज़्यादा बदतर होने का अंदेशा है, जबकि सीरिया में इस समय विश्व का सबसे बड़ा विस्थापन या शरणार्थी संकट बना हुआ है.

50 लाख से ज़्यादा सीरियाई लोगों को शरणार्थी के तौर पर जीवन जीना पड़ रहा है, और अन्य लगभग 60 लाख देश के भीतर ही विस्थापित हैं.

उधर संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) ने भी पहले से ही भीषण युद्धग्रस्त देश सीरिया में मौजूदा तनावपूर्ण स्थिति भड़कने पर गहरी चिंता जताई है.

ग़ौरतलब है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने रविवार को ही सीरिया से अमरीकी सैनिक हटाने की घोषणा की थी.

अमरीकी सेनाएं कुर्दिश मिलिशिया के साथ कई वर्षों से काम कर रही थीं जिन्हें वाईपीजी के नाम से जाना जाता है और तुर्की उन्हें आतंकवादी मानता है.

यूनीसेफ़ की डायरेक्टर हेनरिएटा फ़ोर ने कहा, "सैन्य तनाव बढ़ने से उन लोगों और एजेंसियों की क्षमता पर गहरा असर पड़ेगा जो नाज़ुक हालात में जीने को मजबूर हज़ारों बच्चों तक सहायता पहुँचाना मुश्किल हो जाएगा. "

सीरिया में लगभग आठ वर्षों से चले रहे युद्ध के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों की जाँच कनरे वाले स्वतंत्र जाँच आयोग का कहना है कि इससे भी ज़्यादा फ़िक्र की बात ये है कि सैन्य गतिविधियाँ बढ़ने से असुरक्षा और अफ़रातफ़री के हालात बढ़ेंगे जिनसे आईसिल या दाएश जैसे अतिवादी गुटों के फिर से सक्रिय हो जाने के हालात पैदा हो सकते हैं.

जाँच आयोग का कहना था, "सीरिया को लोगों को अब अगर सबसे कम किसी चीज़ की ज़रूरत है तो वो है हिंसा का कोई नया दौर."

जाँच आयोग ने कहा कि पहले से विस्थापित लगभग एक लाख लोगों के कोई तार आईसिल लड़ाकों से जुड़े पाए गए थे, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे. अब ये लोग अस्थाई शिविरों में रहने को मजबूर हैं. उन्हें बहुत कम सुविधाएँ हासिल हैं और महिलाओं और बच्चों के लिए संवेदनशील पुनवर्वास कार्यक्रमों के अभाव में उनका चरमपंथियों के चंगुल में फँस जाने का भी ख़तरा है.

 

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