भूमि प्रबंधन पर संयुक्‍त राष्ट्र सम्‍मेलन - कॉप-14 भारत में शुरू

3 सितम्बर 2019

भूमि को जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से बंजर होने से बचाने के लिए कान्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ यानी कॉप का 14वां सम्मेलन भारत में सोमवार को आरंभ हुआ. 2 से 13 सितंबर तक राजधानी दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा में होने वाले इस सम्मेलन में लगभग 196 देश शिरकत कर रहे हैं जो बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के तरीक़ों पर मंथन करेंगे.

भारत संयुक्‍त राष्‍ट्र मरुस्‍थलीकरण नियंत्रण समझौते से संबद्ध देशों के 14वें सम्‍मेलन यानी कॉप -14 की अध्‍यक्षता चीन से ग्रहण कर रहा है और अगले दो वर्ष तक इसकी अध्‍यक्षता भारत के पास रहेगी.

भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मामलों के मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कॉप -14 की अध्यक्षता स्वीकार करते हुए कहा, ''अगर मनुष्य की गतिविधियों से जलवायु परिवर्तन, भूमि और जैव-विविधता को नुक़सान हुआ है तो मज़बूत इरादों, तकनीक और समझदारी से स्थिति को बदला भी जा सकता है. मानव प्रयासों से ही नुकसान की भरपाई संभव है. पूरी दुनिया के लोग आज यहां इसीलिए एकत्र हुए हैं कि स्थिति में सुधार हो.''

उपजाऊ भूमि को बचाने के लिए अभूतपूर्व वैश्विक अभियान की ओर संकेत करते हुए प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि आज भारत समेत 122 देश, ''भूमि को बंजर होने से बचाने और सतत् विकास का लक्ष्‍य हासिल करने पर सहमत हो गए हैं. इनमें ब्राजील, चीन, भारत, नाइजीरिया, रूस और दक्षिण अफ्रीका जैसे विशाल और अधिक आबादी वाले देश भी शामिल हैं.''

सम्‍मेलन के कार्यकारी सचिव इब्राहीम चियाओ ने उनके विचारों से सहमति व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि ताज़ा वैज्ञानिक आकलनों से लगातार ख़तरों की चेतावनी मिल रही है.

उन्होंने सूखा, जंगलों में आग, अचानक आने वाली बाढ़ और मिट्टी की क्षति जैसी मौसम से जुड़ी आपदाओं के जल्‍दी-जल्‍दी आने से, जनता में बढ़ती चिंता की तरफ़ ध्‍यान आकृष्‍ट किया.

उन्‍होंने विश्व समुदाय से परिवर्तन के लिए उभरते अवसरों पर ध्‍यान देने और कार्रवाई करने का आह्वान किया.

सम्‍मेलन के कार्यकारी सचिव इब्राहीम चियाओ ने कहा, ''हमें विज्ञान और अपने आसपास की घटनाओं पर गहरा ध्‍यान देना चाहिए किंतु इसके साथ ही उभरते अवसरों या प्रेरणादायक घटनाओं को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए जिनके उपयोग से हम दुष्‍चक्रों, हानिकारक रुझानों या आदतों से मुक्ति पा सकते हैं. इन्हीं प्रयासों की बदौलत हम आगे बढ़ सकते हैं.''

यूएनसीसीसडी के कार्यकारी सचिव इब्राहीम चियाओ ने हाल के वर्षों में विभिन्न सरकारों द्वारा उठाए गए क़दमों का उल्‍लेख किया जिनसे पर्यावरण से जुड़े मुद्दों, ख़ासतौर पर भूमि के उपयोग और प्रबंधन को देखने के तरीक़ों में बदलाव का संकेत मिलता है.

उन्‍होंने यह भी कहा कि, ''70 से अधिक देशों में बहुत सक्रिय राष्‍ट्रीय सूखा प्रबंधन योजनाएं हैं, जबकि चार वर्ष पहले ऐसे देशों की संख्‍या सिर्फ तीन थी. एजेंडा देखकर ये स्पष्ट हो जाता है कि इसमें शामिल देशों की सरकारों ने अनेक कठिन, उलझे हुए और उभरते नीतिगत मुद्दों के हल ढूंढने के लिए पूरी तैयारी के साथ सम्‍मेलन में शिरकत की है.''

इब्राहीम चियाओ ने कहा कि इस सम्‍मेलन के एजेंडा में भूमि अधिकार नियम, सूखा प्रबंधन, खेती को प्रभावित करने वाले लागत और उपज के प्रवाह, एशिया और अफ्रीका में 80 प्रतिशत तक सबसे उपजाऊ खेतीहर ज़मीन को निगलता शहरीकरण, पारिस्थितिकी को पुनर्स्‍थापित करना और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रकृति आधारित समाधान तलाश करना शामिल हैं.

ज़रूरतों की भेंट चढ़ती भूमि

दुनियाभर में 70 प्रतिशत से अधिक भूमि - भोजन, कपड़े और ऊर्जा के उत्‍पादन के लिए अपनी प्राकृतिक अवस्था खो चुकी है. इसमें से कुछ परिवर्तन ज़रूरी थे, लेकिन जिस गति से भूमि का स्‍वरूप बदला जा रहा है, वो बहुत चिंताजनक है. और इससे 10 लाख से अधिक प्रजातियों के लुप्‍त होने का ख़तरा उत्‍पन्‍न हो गया है.

इस परिवर्तित भूमि का हर चार में से एक हेक्‍टेयर क्षेत्र, असंवहनीय भूमि प्रबंधन विधियों के कारण उपयोग लायक नहीं रह गया है.

इससे विश्‍व में तीन अरब 20 करोड़ लोगों की खुशहाली ख़तरे में पड़ गई है. आशंका है कि इन कारणों से वर्ष 2050 तक 70 करोड़ लोगों को अपने निवास स्थानों से पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.

इस स्थिति को बदलने के लिए यदि पर्याप्त क़दम नहीं उठाए गए तो समूची मानव जाति पर असर पड़ेगा क्‍योंकि इससे प्रकृति से मिलने वाले लाभों से हम वंचित होते जाएंगे.

इस सम्मेलन में 196 पक्षों के लगभग सात हज़ार 200 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं, जिनमें देशों के मंत्री और सरकारों, गैर-सरकारी तथा अंतर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि, वैज्ञानिक, महिलाएं और युवा शामिल हैं.

सम्मेलन के ज़रिए कार्रवाई के लिए ऐसे लगभग 30 निर्णय लिए जाने की उम्मीद जताई गई है जिनका उद्देश्‍य विश्‍व भर में भूमि उपयोग नीतियों को पुष्‍ट करना तथा जबरन पलायन, रेतीले तूफानों, आँधियों तथा सूखे जैसे उभरते ख़तरों का सामना करना होगा.

कॉप14 के ज़रिए दुनिया भर में सरकारों को भूमि के टिकाऊ उपयोग की योजना बनाने और टिकाऊ भूमि प्रबंधन लक्ष्‍यों की दिशा में क़दम उठाने में मदद मिलती है.

इस 14वें सम्‍मेलन से अपेक्षा है कि भूमि अवक्रमण निरपेक्षता हासिल करने के लिए उपयुक्‍त तरीकों और संसाधनों के साथ देशों के प्रयासों को मज़बूती मिलेगी.

कान्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ का यह सम्‍मेलन हर दो वर्ष में एक बार होता है. पिछले सम्‍मेलन की मेज़बानी चीन सरकार ने अक्‍तूबर, 2017 में ओरदोस, मंगोलिया में की थी.

 

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