जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध दौड़ हमें जीतनी ही होगी - यूएन महासचिव

1 अगस्त 2019

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने जलवायु की आपात स्थिति और बढ़ते वैश्विक तापमान पर चिंता ज़ाहिर करते हुए विश्व नेताओं से आगामी शिखर वार्ता में ठोस जलवायु कार्रवाई के लिए बढ़ी हुई महत्वाकांक्षा के साथ आने की अपील की है. उन्होंने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि अगर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्रवाई अभी नहीं की गई तो दुनिया को जल्द उसके दुष्परिणाम झेलने पड़ेंगे.

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में पत्रकारों को संबोधित करते हुए महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब इस मौसम में तेज़ गर्मी का सामना करना पड़ रहा है लेकिन यह कई मायनों में अलग है.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ इस वर्ष का जुलाई महीना इतिहास में अब तक के सबसे गर्म महीने के रिकॉर्ड को या तो पार कर लेगा या फिर उसकी बराबरी करेगा - और उससे पहले जून का भी महीना बेहद गर्म रहा था.
इसका अर्थ यह है कि फ़िलहाल जारी रुझानों के अनुसार हम ऐसे समय की ओर बढ़ रहे हैं जब वर्ष 2015 से 2019 इतिहास के पांच सबसे गर्म वर्षों में लगातार शामिल होंगे.

"अगर जलवायु परिवर्तन पर हम अभी कार्रवाई नहीं करते हैं तो चरम जलवायु वाली घटनाएं सिर्फ़  एक शुरुआत भर हैं."

यूएन प्रमुख ने ध्यान दिलाया कि अग्रणी वैज्ञानिकों का मानना है कि वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना ज़रूरी है ताकि जलवायु परिवर्तन के बेहद ख़तरनाक दुष्प्रभावों से बचा जा सके.

योरोप में ऊंचा तापमान और गर्म हवा की लहरें अब आर्कटिक और ग्रीनलैंड में तापमान बढ़ाएंगी और यह एक ऐसे समय में होगा जब आर्कटिक में बर्फ़ का स्तर पहले ही रिकॉर्ड निचले स्तर पर है.  

महासचिव गुटेरेश ने आगाह किया कि अपरिवर्तनीय जलवायु व्यवधान की रोकथाम करना हमारे जीवन के लिए एक दौड़ है. और यह दौड़ हम जीत सकते हैं और जीतनी ही होगी.  

न्यूयॉर्क में जलवायु शिखर वार्ता

उन्होंने स्पष्ट किया कि जलवायु कार्रवाई की तत्काल ज़रूरत को समझते हुए उन्होंने इस वर्ष 23 सितंबर को न्यूयॉर्क के संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक शिखर वार्ता का आयोजन किया है.

जलवायु शिखर वार्ता से ठीक पहले 21 सितंबर को उन्होंने एक 'युवा जलवायु शिखर वार्ता' भी बुलाई है जिसमें वह ग्रेटा थुनबर्ग सहित अन्य युवाओं से मुलाक़ात करेंगे.

सरकारी, व्यवसायिक और नागरिक समाज क्षेत्र से जुड़े नेताओं को उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि इस बैठक में आने के लिए ठोस कार्रवाई और बढ़ी हुई महत्वाकांक्षा के साथ आना आवश्यक है.
इसके लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वर्ष 2030 तक 45 फ़ीसदी की कटौती करनी होगी और वर्ष 2050 तक ‘कार्बन न्यूट्रैलिटी’ (नेट शून्य कार्बन उत्सजर्न) हासिल करनी होगी.

इसलिए उन्होंने विश्व नेताओं को कहा है कि जलवायु शिखर वार्ता में सुंदर भाषणों के साथ नहीं बल्कि ठोस योजनाओं के साथ आएं जिनमें राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों के लिए 2020 तक स्पष्ट रास्ता और 2050 तक कार्बन न्यूट्रैलिटी हासिल करने की रणनीति शामिल हों.

उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि विश्वभर में सरकारें, व्यवसाय और आम नागरिकों के साथ जलवायु संकट से निपटने के लिए संसाधन जुटा रहे हैं. और इस काम में तकनीक मदद कर सकती है – जीवाश्म ईंधनों से चलने वाली अर्थव्यवस्था की तुलना में नवीकरणीय ऊर्जा सस्ती है और पर्यावरण के लिए अनुकूल भी.

चिली, फ़िनलैंड, ब्रिटेन और मार्शल आईलैंड्स सहित कई अन्य देशों के पास 2050 तक कार्बन न्यूट्रैलिटी (नेट शून्य कार्बन उत्सर्जन) हासिल करने की ठोस और विश्वसनीय योजनाएं हैं.

इथियोपिया, न्यूज़ीलैंड, फ़िजी और पाकिस्तान समेत कई अन्य देश लाख़ों-करोड़ों की संख्या में वृक्षारोपण कर रहे हैं ताकि वनों की कटाई के प्रभाव को पलटा जा सके, जलवायु सहनशीलता बढ़ाई जा सके और वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाया जा सके.

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां और बैंक व वित्तीय संस्थान अपने निर्णयों में कार्बन से जुड़े जोखिमों पर भी विचार कर रहे हैं और अग्रणी व्यवसाय जल्द से जल्द हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में जाने की अहमियत को पहचान रहे हैं.

बढ़ते वैश्विक तनाव पर चिंता

वैश्विक राजनीति पर ध्यान आकृष्ट करते हुए उन्होंने फ़ारस की खाड़ी, अमेरिका और चीन और परमाणु-शक्ति संपन्न देशों में तनाव का ज़िक्र किया.

उन्होंने आगाह किया कि फ़ारस की खाड़ी में ज़रा सी ग़लती एक बड़े टकराव का सबब बन सकती है.

हाल के दिनों में स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ में तनाव पैदा करने वाली घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस रास्ते से जाने के लिए जो अधिकार और दायित्व किए गए हैं, अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत उनका सम्मान किया जाना चाहिए.

अमेरिका और चीन के रिश्तों पर उन्होंने कहा कि शीत युद्ध से सबक लेते हुए नए टकराव को टाला जाना चाहिए. शीत युद्ध के दौरान शक्ति के दो केंद्र उभरे थे और हर एक के पास अपनी मुद्रा, व्यापार नीति और विरोधाभासी भूराजनैतिक और सैन्य नियम थे.

“रणनीतिक सहयोग और पारस्परिक हितों में स्पर्धा को संभालने के प्रति संकल्पित नेतृत्व से हम दुनिया को एक सुरक्षित रास्ते की ओर ले जा सकते हैं.”

 

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