जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जैवविविधता का संरक्षण अहम

22 मई 2019

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े दर्शाते हैं कि दुनिया भर में फ़सलों की विविधता घट रही है और लोगों का खाना एक जैसा होता जा रहा है जो बड़ी चिंता का कारण है. यह चेतावनी बुधवार को अंतरराष्ट्रीय जैवविविधता दिवस पर जारी की गई है जिसके ज़रिए पर्यावरण की उपेक्षा से खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में जागरूकता फैलाई जा रही है.

पौधों और जीवों की प्रजातियों, प्राकृतिक वासों और आनुवांशिकी में जैवविविधता होने से पारिस्थितिकी तंत्रों को स्वस्थ बनाए रखने, उनकी उत्पादकता बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन जैसे ख़तरों से जूझने में मदद मिलती है.

मानवीय गतिविधियों से कई प्रजातियों पर पहले की तुलना में अब कहीं ज़्यादा असर पड़ रहा है जिससे उनका भविष्य ख़तरे में हैं. हाल ही में जारी एक नई रिपोर्ट में जैवविविधता पर मंडराते संकट के प्रति आगाह किया गया था.

इस वर्ष जैवविविधता दिवस का विषय “हमारी जैवविविधता, हमारा भोजन, हमारा स्वास्थ्य” है जिसके ज़रिए मानवीय जीवन में जैवविविधता की भूमिका और उसकी अहमियत के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जा रहा है.

इस दिवस पर जारी संदेश में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि “हम जो पानी पीते हैं, भोजन करते हैं और सांस लेते समय जो हवा खींचते हैं, उन सबकी गुणवत्ता प्राकृतिक दुनिया के अच्छे स्वास्थ्य पर निर्भर है.” उन्होंने ध्यान दिलाया कि जैवविविधता का होना टिकाऊ विकास एजेंडा के 17 लक्ष्यों को पाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भी आवश्यक है.

स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्रों के ज़रिए 37 फ़ीसदी तक कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिल सकती है जिससे वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को भी रोका जा सकता है. उन्होंने सचेत किया कि जैवविविधिता और पारिस्थितिकी तंत्रों में नकारात्मक रूझानों के चलते टिकाऊ विकास लक्ष्यों के 80 फ़ीसदी से ज़्यादा उद्देश्यों पर प्रगति प्रभावित हो सकती है और ऐसा होने से रोकना होगा.

“दुनिया की मौजूदा खाद्य प्रणाली खंडित हो रही है. अरबों लोगों की सेहतमंद आहार तक पहुंच नहीं है. खाद्य उत्पादन का करीब एक तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है. जिन तरीक़ों से हम फ़सलें उगाते, तैयार करते हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजते हैं, भोजन करते हैं और उसे बर्बाद करते हैं, वे सब जैवविविधिता क्षरण के मुख्य कारण हैं. और इससे जलवायु परिवर्तन भी होता है.”

वनों की कटाई के मुद्दे पर महासचिव गुटेरेश ने कहा कि 29 करोड़ हेक्टेयर वन भूमि का नुक़सान हो चुका है. पेड़ों की कटाई से हानिकारक कार्बन मोनोऑक्साइड गैसों को वातावरण से सोखने की क्षमता भी प्रभावित होती है.

यूएन प्रमुख ने सभी सरकारों, व्यवसायों और नागरिक समाज से अपील की है कि उन्हें तत्काल कदम उठाने होंगे ताकि पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाने वाले नाज़ुक और अहम तंतुओं का संरक्षण और टिकाऊ प्रबंधन संभव हो सके.

मानवीय स्वास्थ्य और कल्याण में जैवविविधता के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इस चुनौती से निपटने के समाधान मौजूद हैं.

“पर्यावरण के लिए हानिकारक तरीकों को रोक कर, खाद्य प्रणाली में विविधता लाकर और उत्पादन और खपत को और टिकाऊ बनाकर, हम वैश्विक स्वास्थ्य को बेहतर कर सकते हैं, खाद्य सुरक्षा बढ़ा सकते हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता को और मज़बूत कर सकते हैं.”

मौसमी और स्थानीय फल-सब्ज़ियों को खाने की आदत डालकर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सही मौसम में सही खाने की मांग बनी रहे.

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (UNFAO) के अनुसार 90 फ़ीसदी से ज़्यादा पारंपरिक फ़सलें किसानों के खेतों से गायब हो गई हैं. जिन पशुओं को पाला जाता रहा है उनमें 50 फ़ीसदी अब नहीं बचे हैं और मछलियों को भी ज़रूरत से ज़्यादा संख्या में पकड़ा जा रहा है जो टिकाऊ नहीं है.

यूएन एजेंसी ने ज़ोर देकर कहा है कि बदलती जलवायु के संदर्भ में कृषि जैवविविधता एक बुनियादी ज़रूरत है जिससे वातावरण से कार्बन उत्सर्जन कम करने और स्वस्थ और पोषक भोजन के स्रोत बनाए रखने में मदद मिलती है.

 

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