यमन: हुदायदाह से सैनिक हटाने की योजना को मिली मंज़ूरी

15 अप्रैल 2019

यमन के मुख्य बंदरगाह शहर हुदायदाह और आस-पास के मोर्चों से सरकारी सुरक्षा बलों और हुती लड़ाकों को वापस बुलाने की योजना को दोनों पक्षों ने अपनी स्वीकृति दे दी है. यमन के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मार्टिन ग्रिफ़िथ्स ने सुरक्षा परिषद को सचेत किया कि देश के अन्य हिस्सों में फ़िलहाल हिंसा में कमी आती दिखाई नहीं दे रही है. 

मार्टिन ग्रिफ़िथ्स ने बताया कि एक लंबी और मुश्किल प्रक्रिया के बाद संयुक्त राष्ट्र राष्ट्र समर्थित पुन: तैनाती योजना पर सहमति बनी है और यूएन अब तेज़ी से बाक़ी रह गए मुद्दों को सुलझाने के लिए काम कर रहा है . हुदायदाह में लड़ाई रोकने के लिए दोनों पक्ष पिछले साल दिसंबर में स्वीडन में राज़ी हुए थे और इसके बाद देश के अन्य हिस्सों में भी लड़ाई रोकने की प्रक्रिया शुरू करने में मदद मिलने की आशा है. 

उन्होंने कहा कि यह पहली बार होगा जब लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष में अपनी इच्छा से सैनिकों और लड़ाकों को वापस बुलाया जाएगा. यूएन प्रतिनिधि ने कहा कि लाल सागर के पास बंदरगाह शहर में नाज़ुक संघर्ष विराम लागू होने के बाद से लड़ाई में काफ़ी कमी आई है. हुदायदाह शहर से होकर ही राहत सामग्री और देश के लिए अन्य ज़रूरी सामान पहुंचते हैं और इसलिए यहां हिंसा का रूकना महत्वपूर्ण हैं. 

सुरक्षा परिषद को जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि लड़ाई का अंत करने और राजनीतिक समाधान तलाशने के लिए वह संकल्पबद्ध हैं. “अगले कुछ हफ़्तों में मेरी पहली ज़िम्मेदारी दोनों पक्षों के बीच मतभेदों को दूर करना होगा ताकि वे जब भी मिलेंगे, तो लड़ाई ख़त्म करने के लिए जो इंतज़ाम होने चाहिए उससे जुड़े सवालों का जवाब दे सकें. इस राह पर मुझे सुरक्षा परिषद का समर्थन चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र् मानवीय मामलों के प्रमुख मार्क लॉकॉक ने भी सुरक्षा परिषद को वीडियो लिंक के द्वारा जानकारी दी और यमनी जानों को बचाए जाने की अपील की. 

उन्होंने राष्ट्रव्यापी संघर्ष विराम के अपने पुराने अनुरोध को दोहराया: "बंदूकों और बमों के साथ सभी पुरुषों को हिंसा रोकनी होगी. हम फिर से सभी पक्षों को ध्यान दिलाना चाहेंगे कि वे हर स्थान पर और हर समय अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानूनों से बंधे हैं."

मार्क लॉकॉक ने कहा कि सिर्फ़ गोलियों से ही जान को ख़तरा नहीं है. इस साल अब तक हैज़े के दो लाख से ज़्यादा संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं जो पिछले साल इसी अवधि में मामलों की तुलना में तीन गुना ज़्यादा हैं.

"स्वास्थ्य प्रणाली के ध्वस्त होने के दुष्परिणाम हम अन्य जगहों पर भी देखते हैं. 2018 से अब तक डिप्थीरिया के 3,300 मामलों को रिपोर्ट किया गया है. 1982 के बाद पहली बार ये बीमारी फैली है. इस साल के शुरू में खसरे के मामलों में भी 2018 की तुलना में करीब दो गुना बढ़ोत्तरी देखी गई थी."

UN Photo/Loey Felipe
सुरक्षा परिषद में यमन मुद्दे पर चर्चा.

 

और इन सबसे ऊपर अकाल  का ख़तरा मंडरा रहा है. विश्व खाद्य कार्यक्रम दुनिया में सबसे बड़ा राहत अभियान चला रहा है और 90 लाख से बढ़कर आने वाले महीनों में 1.20 करोड़ लोगों की मदद कर रहा होगा.

लेकिन ज़रूरतमंदों तक पहुंच पाने का रास्ता अब भी एक चुनौती बना हुआ है. हुदायदाह में एक अनाज भंडारण व्यवस्था में 37 लाख लोगों को खाना दिया जा सकता है लेकिन लड़ाई के चलते यह संभव नहीं है. यमन के लिए 2.6 अरब डॉलर की मदद की घोषणा की गई थी लेकिन अब तक सिर्फ़ 26.7 लाख डॉलर ही मिल पाए हैं. 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमानों के मुताबिक़, "हैज़े का इलाज कर रहे 60 फ़ीसदी स्वास्थ्य केंद्र आने वाले हफ़्तों में बंद हो सकते हैं और 50 फ़ीसदी सहायक स्वास्थ्य केंद्रों पर सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं."

मार्क लॉकॉक ने कहा, "मुझे सारांश बताने दीजिए. हिंसा फिर बढ़ गई है. राहत अभियान के लिए धन ख़त्म हो रहा है."

बच्चों और सशस्त्र संघर्ष के लिए यूएन की विशेष प्रतिनिधि वर्जीनिया गाम्बा ने बताया कि यमन में लगभग तीन हज़ार से ज़्यादा बच्चों की सैनिकों के तौर पर भर्ती होने की पुष्टि हो चुकी है जबकि 7,500 से ज़्यादा की या तो मौत हुई है या वे घायल हुए हैं.  इनमें अधिकतर हवाई हमलों का शिकार हुए जिसके लिए मुख्य रूप से सऊदी अरब के नेतृत्व में  सरकार को "समर्थन दे रहा गठबंधन ज़िम्मेदार" है. लेकिन ज़मीनी स्तर पर अधिकार मौतें हुती लड़ाकों की ओर से होने वाली गोलाबारी, मोर्टार और अन्य छोटे हथियारों के चलते हुए है.

गाम्बा ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यमन के लिए फंडिंग को प्राथमिकता देने की अपील की ताकि बच्चों को जान बचाने, पढ़ने और यमन का भविष्य फिर से संवारने का अवसर मिल सके.

 

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