बढ़ते नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन का आह्वान

21 मार्च 2019

नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर यूएन अधिकारियों और मानवाधिकार विशेषज्ञों ने नफ़रत और भेदभाव की उफ़नती लहरों और उभरते जातीय-राष्ट्रवाद पर लगाम कसने के लिए तत्काल कदम उठाने की अपील की है. न्यूज़ीलैंड की मस्जिदों में गोलीबारी जैसी घटनाओं के लिए नस्लीय भेदभाव और वर्चस्ववादी विचारधाराओं को ज़िम्मेदार ठहराया गया है.

इस दिवस पर अपने संदेश में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की प्रमुख ऑड्री अज़ोले ने कहा कि "नस्लीय भेदभाव को अब भी सिर्फ़ इतिहास की किताबों में सीमित नहीं किया जा सका है.  यह विद्वेषपूर्ण असहिष्णुता और बहिष्कार की भावना अब भी खेल के मैदानों, सड़कों, कार्यस्थलों और सत्ता के गलियारों में देखने को मिलती है. "

“दुर्भाग्य से हम फिर एक बार नस्लीय भेदभाव का घिनौना चेहरा सार्वजनिक विमर्शों में प्रस्तुत होते देख रहे हैं.” उन्होंने कहा कि यही वजह कि इस साल अंतरराष्ट्रीय दिवस की विषय-वस्तु 'राष्ट्रीय लोकप्रियतावाद और चरम वर्चस्ववाद की विचारधारा का विरोध और उसकी रोकथाम' चुनी गई है. 

इस अवसर पर न्यूज़ीलैंड में मस्जिद हमले का ज़िक्र करते हुए संयुक्त राष्ट्र के दो स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एक बयान जारी कर कहा है कि यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि नस्लवाद, विदेशियों को पसंद न करने की प्रवृत्ति और धार्मिक नफ़रत घातक हैं. 

जातीय-राष्ट्रवाद और वर्चस्ववादी विचारधाराओं का नतीजा नस्लीय हिंसा, बहिष्कार और भेदभाव के रूप में सामने आता है. क्राइस्टचर्च की मस्जिद में अंधाधुंध गोलीबारी में वहां नमाज़ पढ़ने आए 50 लोगों की मौत हो गई थी. 

मानवाधिकार विशेषज्ञों टेन्डायी आचीयुमे और माइकल बालसेरज़ाक ने कहा कि नफ़रत और भेदभाव की उफ़नती लहरों पर नियंत्रण पाने के लिए, कमज़ोरों को संरक्षण देने के लिए और नस्लीय समानता सुनिश्चित करने के लिए देशों को तत्काल कदम उठाने चाहिए. कई मामलों में नस्लीय भेदभाव और असहिष्णुता की भावना भड़काने में प्रशासनिक अमले की भूमिका होने पर भी उन्होंने हैरानी जताई.

नस्लीय भेदभाव की चुनौती कायम

नस्लीय भेदभाव के हर स्वरूप के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि के 1969 में लागू होने के 50 साल बाद भी यह चुनौती बनी हुई है. संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों से अपील करता रहा है कि नस्लवाद के अंत के लिए और सभी के लिए समानता और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए.

लेकिन राजनीतिक वजहों से इसे जल्द समाप्त किए जाने की अहमियत को नहीं समझा गया. इसके बजाए राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे भाषणों का इस्तेमाल किया जाता है जिससे प्रभुत्ववादियों के हौसले बुलंद होते हैं जबकि नस्लीय समूहों को बदनाम किया जाता है.

यूएन विशेषज्ञों का कहना है कि असहिष्णुता और भेदभाव से निपटना सिर्फ़ देशों या प्रशासनिक अधिकारियों की ही ज़िम्मेदारी नहीं है बल्किन हर व्यक्ति को इसमें अपनी भूमिका अदा करनी होगी. 

यूनेस्को प्रमुख ऑड्री अज़ोले ने अपने संदेश में कहा कि भेदभाव के ख़िलाफ़ लड़ाई में सभी को आगे बढ़कर हिस्सा लेने की ज़रूरत है. "नस्लीय भेदभाव, विदेशियों की नापसंदगी, और वर्चस्ववादी विचारधाराओं को भड़काने में इंटरनेट एक उर्वर भूमि की तरह काम करता है. कई बार इसके निशाने पर प्रवासी, शरणार्थी और अफ़्रीकी मूल के लोग होते हैं."

इससे निपटने के लिए यूनेस्को जागरूकता के प्रसार पर बल देता है. इन्ही प्रयासों के तहत यूनेस्को ने ऑनलाइन जगत में कायम भेदभाव से मुक़ाबले और इंटरनेट इस्तेमाल का अनुभव सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से मीडिया और सूचना साक्षरता के लिए नए औज़ार विकसित किए हैं. इससे आपसी समझ, विवेचनात्मक सोच और अंतरसांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी.  

"हर रोज़, नस्लीय भेदभाव लोगों को रोज़गार, आवास और सामाजिक जीवन में उनके आधारभूत अधिकारों से ख़ामोशी से वंचित कर रहा है."

यूएन मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बाशलेट ने अपने एक वीडियो संदेश में ध्यान दिलाया कि हम जिन मूल्यों के लिए खड़े होते हैं, नस्लवाद उनके विरूद्ध है. उन्होंने कहा कि नस्लीय, धार्मिक, जातीय और राष्ट्रीय तौर पर वर्चस्ववाद का वास्तविकता में कोई आधार नहीं है. 

 

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