कांगो में चुनाव नतीजों के बीच हिंसा से बचने की अपील

10 जनवरी 2019

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में शुरुआती चुनाव नतीजों के आने के बाद सभी पक्षों से हिंसा से दूर रहने की अपील की है. राष्ट्रपति चुनाव की घोषणा दो साल पहले की गई थी लेकिन उन्हें कराए जाने में लंबी देरी हुई है. 

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार स्वतंत्र चुनाव आयोग ने शुरुआत में जो नतीजे घोषित किए हैं उसमें विपक्षी दल के उम्मीदवार फ़ेलिक्स त्शिसेकेदी की 30 दिसंबर को हुए चुनाव में जीत हुई है. चुनाव आयोग ने बताया कि त्शिसेकेदी को 38 प्रतिशत से ज़्यादा वोट मिले हैं और वह अन्य प्रत्याशियों मार्टिन फ़यालु और सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार इमानुएल रमज़ानी शडारी से आगे हैं.

वहीं स्वतंत्र चुनाव पर्यवेक्षकों ने अनाधिकारिक रूप से जो आंकड़े जुटाए हैं वे इन नतीजों से मेल नहीं खाते. मार्टिन फ़यालु ने इन परिणामों को ख़ारिज कर दिया है.  अगर अंतिम नतीजे स्वीकार किए जाते हैं तो स्वतंत्र कांगो के 60 साल के इतिहास में यह पहली बार होगा जब लोकतांत्रिक ढंग से सत्ता का हस्तांतरण होगा. 

महासचिव गुटेरेश ने अपने एक बयान में कहा कि वह सभी पक्षों से अपील करते हैं कि हिंसा से बचा जाए और चुनाव नतीजों से जुड़े विवादों का निपटारा कांगो के संविधान और चुनाव क़ानूनों के अनुसार स्थापित संवैधानिक व्यवस्था के ज़रिए ही किया जाए.

कांगो के चुनाव आयोग, संवैधानिक अदालत, सरकार, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज को संबोधित करते हुए उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और स्थिरता की रक्षा करने का आग्रह किया.

2001 से कांगो के राष्ट्रपति रहे जोसेफ़ कबीला के बाद एक नए राष्ट्रपति बनने की संभावनाओं के बीच महासचिव ने दोहराया है कि संयुक्त राष्ट्र कांगो को समर्थन देते रहने के लिए संकल्पबद्ध है. क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ संयुक्त राष्ट्र "शांति, स्थिरता और विकास को आगे बढ़ाने का काम करता रहेगा." 

गुटेरेश का यह बयान ऐसे समय में आया है जब हथियारबंद गुटों में हो रही झड़पों के चलते पहले से चला आ रहा मानवीय संकट और गहरा गया है. मानवीय मामलों से जुड़ी यूएन संस्था (OCHA) के मुताबिक़ एक करोड़ से अधिक लोग को भरपेट भोजन नहीं मिल रहा है जिनमें 40 लाख से ज़्यादा कुपोषित बच्चे हैं. 

कांगो में पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक संसाधन होने के बावजूद हालात गंभीर बने हुए हैं. हथियारबंद गुटों ने इन संसाधनों को कमाई का ज़रिया बनाया हुआ है और वे मानवीय राहत लेकर आने वाले दलों के लिए मुश्किलें भी खड़ी करते हैं.

 

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