भारत: यूनीसेफ़ की मदद से, उदयपुर में बच्चों के कल्याण हेतु सामुदायिक कार्रवाई

निशि पांचाल-15 (लाल चेक में ), गायत्री-21 (काली पोशाक में) और दीपिका-20 (सफ़ेद पोशाक में) ने ‘चाइल्ड फ्रेंडली पुलिस स्टेशन’ का दौरा किया.
© UNICEF/UN0651660/Panjwani
निशि पांचाल-15 (लाल चेक में ), गायत्री-21 (काली पोशाक में) और दीपिका-20 (सफ़ेद पोशाक में) ने ‘चाइल्ड फ्रेंडली पुलिस स्टेशन’ का दौरा किया.

भारत: यूनीसेफ़ की मदद से, उदयपुर में बच्चों के कल्याण हेतु सामुदायिक कार्रवाई

कानून और अपराध की रोकथाम

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष - यूनीसेफ़ भारत में राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले में 'बाल-अनुकूल पुलिस प्रणाली' बनाने के लिये, पुलिस के साथ मिलकर काम कर रहा है. वात्सल्य वार्ताओं के माध्यम से बच्चों की बात सुनी जाती है और उनके मुद्दे सुलझाने में तेज़ी आई है.

अपने चिन्तित पिता के साथ पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाने आई, 15 वर्षीय शारदा कहती हैं, “किसी ने मेरा मोबाइल फोन नम्बर अपने फ़ेसबुक पेज पर प्रकाशित किया है, और अब मुझे अज्ञात नम्बरों से सन्देश आ रहे हैं. कृपया इस पेज को ब्लॉक करने में मेरी मदद करें.”

पुलिस सहायता डेस्क अधिकारी उन्हें, बच्चों व महिलाओं के लिये हाल ही में स्थापित, शिकायत कक्ष ले जाते हैं, जहाँ उन्हें बाल कल्याण पुलिस अधिकारी, मदद का आश्वासन देते हैं.

इन अधिकारियों को, बच्चों और महिलाओं के मुद्दों को संभालने के लिये उचित प्रशिक्षण दिया गया है.

पुलिस स्टेशन के प्रमुख अधिकारी (SHO) अनिल कुमार बिश्नोई कहते हैं, “फोन और इंटरनैट की पहुँच के कारण, उदयपुर के इस आदिवासी बहुल ब्लॉक में भी बच्चों, किशोरों व युवाओं के ख़िलाफ़ साइबर अपराध के नियमित मामले सामने आने लगे हैं."

"हमारे यहाँ एक साइबर विशेषज्ञ है, जो छोटी समस्याओं से निपटने में सक्षम है, लेकिन सम्भावना है कि इस तरह के मामले को हम साइबर क्राइम प्रकोष्ठ भेजेंगे और वे जल्द ही पेज ब्लॉक करके उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे.”

यह प्रक्रिया किस तरह काम करती है

पुलिस विभाग और यूनीसेफ़ द्वारा  वात्सल्य वार्ता का आयोजन.
© UNICEF/UN0651717/Panjwani
पुलिस विभाग और यूनीसेफ़ द्वारा वात्सल्य वार्ता का आयोजन.

भारत स्थित यूनीसेफ़ कार्यालय की मदद से शुरू की गई ‘चाइल्ड फ्रेंडली पुलिसिंग सिस्टम’ यानि बाल-अनुकूल पुलिस प्रणाली के तहत, पुलिस कर्मियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाता है.

फिर वे, चयनित सुरक्षा सखियों (सुरक्षा मित्रों) और ग्राम रक्षकों जैसे स्वयंसेवक समूहों के माध्यम से, समुदायों के साथ सीधा सम्पर्क बनाए रखते हैं, जो उनका समर्थन करते हैं और पुलिस के साथ नियमित बैठकों के दौरान इन बच्चों के मुद्दों को उठाते हैं.

इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘वात्सल्य वार्ता’ (बच्चों की चर्चा) है, जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, स्कूल या समुदाय में, बच्चों के साथ जीवन्त चर्चा आयोजित करते हैं.

इससे पुलिस और समुदाय के बीच की खाई को पाटने और उनके प्रति विश्वास पैदा करने में काफ़ी मदद मिलती है. इस पहल को मज़बूत करने के लिये, पाँच हज़ार से अधिक लड़कियों को, ज़िले के विभिन्न थानों के दौरे के लिये भी ले जाया गया है.

उदयपुर के पुलिस अधीक्षक सुधीर जोशी बताते हैं, "चर्चा का यह मंच, पुलिस और बच्चों के बीच विश्वास की खाई को पाटने का अवसर प्रदान करता है. बच्चे खुलकर, पुलिस सम्बन्धित मुद्दे उठाते हैं, जिनपर त्वरित कार्रवाई की जाती है."

"हम बच्चों की मदद करने की पूरी कोशिश करते हैं, भले ही वो क्षेत्र हमारे दायरे में न आता हो. हाल ही में, जब हमारी ‘वात्सल्य वार्ता’ में बिजली की कमी से बच्चों की परीक्षा की तैयारी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का मुद्दा सामने आया तो हमने बिजली आपूर्ति कार्यालय में जाकर इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की.”

उनके अनुसार बाल-अनुकूल पुलिस प्रणाली की एक बड़ी उपलब्धि यह रही है कि बाल मज़दूरी के लिये, पड़ोसी राज्य जाकर काम करने वाले बच्चों की संख्या में भारी कमी आई है. ख़ासतौर पर, पुलिस ने बालश्रम के लिये पलायन रोकने की ख़ातिर, विशेष जाँच चौकियाँ स्थापित की हैं.

“हम इस क्षेत्र में शेष 5 प्रतिशत पलायन को भी समाप्त करने की दिशा में काम कर रहे हैं. हमारे काम में परिवार और समुदायों तक पहुँचना भी शामिल है और हम यहाँ के लोगों के ज़रिये, इलाक़े के बच्चों से जुड़े मुद्दों पर खुफ़िया जानकारी प्राप्त करते हैं. जानकारी देने वालों की पहचान गुप्त रखी जाती है ताकि जानकारी साझा करने वालों को कोई डर न हो.”

समुदाय की आवाज़

यूनीसेफ़ द्वारा आयोजित, डूंगरपुर ज़िले के 15 थानों के बाल कल्याण पुलिस अधिकारियों का प्रशिक्षण.
© UNICEF/UN0651691/Panjwani
यूनीसेफ़ द्वारा आयोजित, डूंगरपुर ज़िले के 15 थानों के बाल कल्याण पुलिस अधिकारियों का प्रशिक्षण.

हाल ही में तीन बच्चों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने वाली, निकटवर्ती गाँव की सुरक्षा सखी, आबिदा बानो ने बताया, “हम हर बैठक में साइबर अपराध, लड़कियों और स्कूली बच्चों की समस्या के मुद्दों पर चर्चा करते हैं. हम अपने केन्द्र में आने वाले समुदायों और किशोरों, दोनों के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखते हैं, जिससे हमें क्षेत्र में बच्चों के मुद्दों पर नियमित रूप से जानकारी प्राप्त होती रहती है.”

चमेंडा गाँव के ग्राम प्रधान और ग्राम रक्षक, करण जोशी, उन लोगों में से एक हैं, जो बच्चों के कल्याण के लिये स्वयं आगे आए हैं.

वो बताते हैं, “अपने माता-पिता की जानकारी के बिना बच्चों द्वारा मोटर साइकिल (बाइक) चलाने के कारण मेरे क्षेत्र में दुर्घटनाएँ आम हो गई हैं. मैंने अनेक बच्चों और उनके माता-पिता को समझाया है कि मेरे क्षेत्र में कोई भी बिना उचित लाइसेंस और हेलमेट के गाड़ी न चलाए."

बाल-अनुकूल पुलिस प्रणाली

वात्सल्य वार्ता से पुलिस अधिकारियों को बच्चों की ज़रूरतों को समझने में मदद मिलती है.
© UNICEF/UN0651696/Panjwani
वात्सल्य वार्ता से पुलिस अधिकारियों को बच्चों की ज़रूरतों को समझने में मदद मिलती है.

राजस्थान में यूनीसेफ़ के बाल संरक्षण विशेषज्ञ संजय कुमार निराला बताते हैं, “बाल अनुकूल पुलिस प्रणाली की परिकल्पना वर्ष 2012 में की गई थी. स्वभाव वश, पुलिस को अपराध की जाँच के लिये, लोगों के साथ सन्देह और कठोरता से पेश आने का प्रशिक्षण दिया जाता है. जब भी किसी बच्चे के सामने कोई समस्या आती है, तो सम्पर्क का पहला बिन्दु पुलिस होती है और कई बार, वो भी इसी कठोर बर्ताव का शिकार हो जाते हैं.”

इसलिये, इस कार्यक्रम का पहला उद्देश्य, पुलिस को संवेदनशील बनाना और बच्चों की आवश्यकताओं से अवगत कराना था. इसमें, रोकथाम पर अधिक ध्यान केन्द्रित करते हुए समुदाय और बच्चों तक पहुँचने की कोशिश की गई. यूनीसेफ़, भागीदारों के साथ बाल सम्बन्धित क़ानून के बारीक बिन्दुओं पर पुलिस के नियमित संवेदीकरण कार्यकम आयोजित करता है.

करण जोशी कहते हैं, "क़ानून लिखित दस्तावेज़ होते हैं, लेकिन हमें बच्चों के साथ काम करने से पहले इसकी आत्मा को समझने की ज़रूरत है. एक बच्चे से सम्बन्धित हर क़ानून अन्तत: एक ही सन्देश देता है - वे पवित्र हैं, और उनसे जुड़े हर मुद्दे को सावधानी से सुलझाने की ज़रूरत है. हम यही दृष्टिकोण फैलाने करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि सामाजिक मुद्दों से पुलिस और अदालत, अकेले नहीं लड़ सकते हैं.”

प्रभाव

पुलिस ने इस पहल के तहत, स्कूल और समुदायों में 5 हज़ार से अधिक ‘वात्सल्य वार्ताओं’ का संचालन किया है. इनके अलावा, पुलिस स्टेशनों के नियमित दौरे और समुदाय के साथ बातचीत से, बाल मुद्दों को समझने और सुधारात्मक उपाय लागू करने में मदद मिली है.