कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से निपटना अहम, यूएन एजेंसियों का आग्रह

वैश्विक महामारी के दौरान, बड़ी संख्या में लोगों ने घर से ही काम करना शुरू किया.
© UNSPLASH/Sigmund
वैश्विक महामारी के दौरान, बड़ी संख्या में लोगों ने घर से ही काम करना शुरू किया.

कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से निपटना अहम, यूएन एजेंसियों का आग्रह

स्वास्थ्य

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने कामकाजी आबादी के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति उपजी चिन्ताओं से निपटने के लिये, ठोस उपाय किये जाने की पुकार लगाई है. एक अनुमान के अनुसार, हर वर्ष, मानसिक अवसाद और बेचैनी के कारण, 12 अरब कामकाजी दिनों का नुक़सान होता है, और वैश्विक अर्थव्यवस्था को क़रीब एक हज़ार अरब डॉलर का घाटा होता है. 

यूएन एजेंसियों ने बुधवार को अपने दो विश्लेषण प्रकाशित किये हैं, जिनमें कार्यस्थल पर नकारात्मक परिस्थितियों व संस्कृतियों की रोकथाम करने और कर्मचारियों को मानसिक स्वास्थ्य संरक्षण व समर्थन पर अनुशंसाएँ जारी की गई हैं. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा, “यह समय कामकाज से हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर हो सकने वाले नकारात्मक प्रभाव पर ध्यान केन्द्रित करने का है.”

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“किसी भी व्यक्ति का कल्याण, अपने आप में क़दम उठाने का आधार है, मगर ख़राब मानसिक स्वास्थ्य से किसी भी व्यक्ति के प्रदर्शन व उत्पादकता पर पीड़ादाई असर हो सकता है.” 

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी दिशानिर्देशों में कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों से निपटने के लिये उपायों की अनुशंसा की गई है.

इन जोखिमों में काम का अत्यधिक बोझ, नकारात्मक व्यवहार और अन्य कारक हैं, जोकि कार्यस्थल पर तनाव व दबाव का बड़ा कारण हैं.

यह पहली बार है जब यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने प्रबन्धकों (manager) के लिये प्रशिक्षण की सिफ़ारिश की है, ताकि कार्यस्थल पर तनावपूर्ण माहौल की रोकथाम हो सके और तनाव झेल रहे कामगारों को सहायता मुहैया कराई जा सके.

चर्चा के लिये कठिन विषय

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जून 2022 में 'World Mental Health' नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसके अनुसार, वर्ष 2019 में एक अरब लोग मानसिक विकार की अवस्था में जीवन गुज़ार रहे हैं. 

कामकाजी उम्र के 15 प्रतिशत वयस्कों को मानसिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है.

भेदभाव और असमानता समेत अन्य कुछ ऐसी चुनौतियों के रूप में गिनाए गए हैं, जिनसे मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है. 

इसके अलावा, डराया धमकाया जाना और मनोवैज्ञानिक हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न सम्बन्धी मुख्य शिकायतें हैं, मगर मानसिक स्वास्थ्य के विषय में दुनिया भर में अब भी खुले रूप से चर्चा नहीं होती है.

इन दिशानिर्देशों में मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे कर्मचारियों की आवश्यकताओं का ध्यान रखने के लिये बेहतर तौर-तरीक़े अपनाए जाने की भी अनुशंसा की गई है. 

इस क्रम में, उनके काम पर वापिस लौटने में सहायक उपाय उपलब्ध कराए जाने का भी प्रस्ताव दिया जाना होगा. 

अवसर मुहैया कराने पर बल

साथ ही, गम्भीर मानसिक स्वास्थ्य अवस्था के पीड़ितों के लिये वैतनिक रोज़गार में प्रवेश सम्भव बनाने के उपायों का भी ध्यान रखा जाना होगा.  

यूएन विशेषज्ञों ने अपने दिशा-निर्देशों में स्वास्थ्यकर्मियों, मानवीय राहतकर्मियों और आपातकर्मियों की रक्षा सुनिश्चित करने पर लक्षित उपायों की पुकार लगाई है. 

महानिदेशक घेबरेयेसस ने कहा, “इन नए दिशानिर्देशों से कार्य में नकारात्मक परिस्थितियों व संस्कृति की रोकथाम करने और कामकाजी व्यक्तियों को मानसिक स्वास्थ्य संरक्षण व समर्थन मुहैया कराने में मदद मिल सकती हैं.”

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी और यूएन श्रम एजेंसी ने अलग से एक नीतिपत्र भी जारी किया है, जिसमें सरकारों, नियोक्ताओं, कामगारों और निजी व सार्वजनिक सैक्टर में उनके संगठनों के लिये WHO दिशानिर्देशों के सम्बन्ध में जानकारी दी गई है.

इसका उद्देश्य, मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों की रोकथाम के लिये उपायों को सहारा देना, कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा व उसे बढ़ावा देना, और मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को समर्थन प्रदान करना है, ताकि वे भी कामकाजी दुनिया में भागीदारी और फल-फूल सकें. 

राष्ट्रीय कार्यक्रमों का अभाव

केवल, 35 फ़ीसदी देशों ने ही अपने यहाँ कामकाज-सम्बन्धी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के सिलसिले में राष्ट्रीय कार्यक्रम होने की बात कही है.

कोविड-19 महामारी के कारण आम तौर महसूस की जाने वाली बेचैनी व मानसिक अवसाद के मामलों में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 

ये आँकड़े सरकारों द्वारा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिये पहले से की गई तैयारियों के अभाव और मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी संसाधनों की क़िल्लत के परिचायक हैं. 

वर्ष 2020 में देशों की सरकारें औसतन अपने स्वास्थ्य बजट का केवल दो फ़ीसदी पर ख़र्च कर रही थीं, और निम्नतर-मध्य आय वाले देशों में यह एक फ़ीसदी से भी कम था.