लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा में ‘भयावह बढ़ोत्तरी’ चिंता का सबब 

5 अप्रैल 2020

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 पर क़ाबू पाने के प्रयासों के तहत दुनिया के कई देशों में तालाबंदी लागू होने से विश्व आबादी का एक बड़ा हिस्सा घरों तक सीमित हो गया है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इन हालात में महिलाओं व लड़कियों के प्रति घरेलू हिंसा के मामलों में ‘भयावह बढ़ोत्तरी’ दर्ज किए जाने पर चिंता जताते हुए सरकारों से ठोस कार्रवाई का आहवान किया है. 

अपने संदेश में यूएन महासचिव ने ध्यान दिलाया है कि हिंसा महज़ रणक्षेत्र तक ही सीमित नहीं है और “कई महिलाओं व लड़कियों के लिए ख़तरा सबसे ज़्यादा ख़तरा तब होता है जब उन्हें सबसे सुरक्षित होना चाहिए: उनके अपने घरों में.” 

ग़ौरतलब है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने वैश्विक युद्धविराम की एक अपील जारी की थी ताकि साझा प्रयासों को कोरोनावायरस की चुनौती से निपटने पर केंद्रित किया जा सके. 

महामारी के कारण उपजी आर्थिक व सामाजिक चुनौतियों और आवाजाही पर पाबंदी लगने से लगभग सभी देशों में महिलाओं व लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार के मामलों में भारी वृद्धि दर्ज की गई है.

हालांकि कोरोनावायरस के फैलाव से पहले भी ऑंकड़े स्पष्टता से इस समस्या को बयां करते रहे हैं. दुनिया भर में क़रीब एक-तिहाई महिलाएं अपने जीवन में किसी ना किसी रूप में हिंसा का अनुभव करती हैं. यह मुद्दा विकसित और निर्धन, दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है.

अमेरिका में कॉलेज जाने वाली लगभग एक-चौथाई महिला छात्रों ने यौन हमले या दुराचार का सामना किया है, जबकि सब-सहारा अफ़्रीका के कुछ हिस्सों में संगी-साथी द्वारा की जाने वाली हिंसा 65 फ़ीसदी महिलाओं के लिए एक सच्चाई है.   

विश्व स्वास्थ्य संगठन का विश्लेषण दर्शाता है कि महिलाओं के शारीरिक, यौन, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य पर हिंसा का गहरा असर पड़ता है. शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव करने वाली महिलाओं का गर्भपात होने या उनके मानसिक अवसाद में घिरने की आशंका दोगुनी हो जाती है. 

कुछ क्षेत्रों में हिंसा का शिकार महिलाओं के एचआईवी संक्रमित होने की आशंका 1.5 गुना ज़्यादा होती है. तथ्य दर्शाते हैं कि यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं को शराब की लत होने की आशंका 2.3 गुना अधिक होती है. 

वर्ष 2017 में 87 हज़ार से ज़्यादा महिलाओं की इरादतन हत्या की गई जिनमें आधे से ज़्यादा महिलाओं की मौत के लिए उनका साथी या कोई पारिवारिक सदस्य ज़िम्मेदार था. 

स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक कोविड-19 महामारी के शुरू होने के बाद से लेबनान और मलेशिया में “हेल्पलाइन’ पर आने वाली फ़ोन कॉल की संख्या दोगुनी हो गई है जबकि चीन में यह संख्या तीन गुनी हुई है.

ऑस्ट्रेलिया में गूगल जैसे सर्च इंजनों पर घरेलू हिंसा संबंधी मदद के लिए पिछले पॉंच वर्षों में सबसे ज़्यादा जानकारी इन दिनों खोजी जा रही है.  ये ऑंकड़े समस्या के स्तर को दर्शाते हैं लेकिन इनसे सिर्फ़ उन्हीं देशों के बारे में जानकारी मिलती है जहां रिपोर्टिंग प्रणाली पहले से स्थापित है.

कमज़ोर संस्थागत ढॉंचों वाले देशों में वायरस के फैलने की स्थिति में शायद पर्याप्त जानकारी और डेटा उपलब्ध ना हो पाए. आशंका जताई गई है कि ऐसे स्थानों पर महिलाओं व लड़कियों के घरेलू हिंसा के शिकार होने का जोखिम भी ज़्यादा है. 

कोरोनावायरस के फैलने से स्वास्थ्य सेवाओं पर भार अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा है. ऐसे में घरेलू हिंसा की घटनाओं से निपटने में सबसे बड़ी चुनौती संस्थाओं का बोझ तले दबा होना है. 

“स्वास्थ्य सेवा प्रदाता और पुलिस बल भारी बोझ में हैं और स्टाफ़ की कमी से जूझ रहे हैं.”
“मदद प्रदान करने वाले स्थानीय समूह भी बेबस हैं या फिर उनके पास फ़ंड की कमी है. घरेलू हिंसा पीड़ितों के लिए कुछ शरणगाह बंद हो गई हैं; अन्य स्थानों पर जगह नहीं बची है.”

यूएन महासचिव ने सभी सरकारों से आग्रह किया है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की रोकथाम और उसके निवारण के उपायों को कोविड-19 से निपटने की राष्ट्रीय योजनाओं का अहम हिस्सा बनाना होगा.

“कोविड-19 से लड़ाई के दौरान, हम एक साथ मिलकर हिंसा की हम रोकथाम कर सकते हैं और ऐसा करना होगा, युद्धक्षेत्र से लेकर लोगों के घरों तक.”

इसके तहत निम्न सुझाव उपलब्ध कराए गए हैं:

  • ऑनललाइन सेवाओं नागरिक समाज संगठनों में निवेश बढ़ाया जाए
  • न्यायिक प्रणाली द्वारा दोषियों के लिए सज़ा को सुनिश्चित किया जाए
  • औषधालयों और किराना स्टोर पर एमरजेंसी चेतावनी प्रणाली स्थापित की जाए
  • शरणगाहों को आवश्यक सेवाओं के रूप में घोषित किया जाए
  • महिलाओं को मदद प्रदान करने वाले समाधानों की प्रक्रिया को सुरक्षित बनाया जाए
  • महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के दोषी को जेल से रिहा करने से परहेज़ किया जाए
  • सार्वजनिक जागरूकता अभियानों का स्तर बढ़ाया जाए

 

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