कोविड-19: महिलाओं पर हिंसा के अंत की मुहिम को यूएन का समर्थन

6 अप्रैल 2020

संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हर प्रकार की हिंसा के अंत के लिए तत्काल वैश्विक कार्रवाई की पुरज़ोर अपील की है. विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के कारण तालाबंदी होने से लोग घरों में महदूद रहने के लिए मजबूर हैं जिसके बाद घरेलू हिंसा के मामलों में तेज़ी आई है. हर क्षेत्र में स्थित देशों से अब तक मिली रिपोर्टों के अनुसार आवाजाही पर पाबंदी लगने, सामाजिक जीवन में दूरी बरते जाने, और आर्थिक व सामाजिक दबाव बढ़ने से घरेलू हिंसा के मामले बढ़े हैं.

यूएन न्यूज़ ने संयुक्त राष्ट्र उपमहासचिव अमीना मोहम्मद से एक ख़ास बातचीत में यह जानना चाहा कि इस समस्या से निपटने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं, और सरकारें, यूएन व अन्य पक्षकार घरेलू हिंसा की रोकथाम के लिए क्या उपाय अपना सकते हैं. 

मौजूदा समय में महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा कितनी गंभीर है?

इस विश्वव्यापी महामारी के फैलने से पहले, ऑंकड़े दर्शाते थे कि हर तीन में से एक महिला को अपने जीवनकाल में हिंसा का सामना करना पड़ेगा. मैं पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के कार्यक्रम के सिलसिले में पापुआ न्यू गिनी में थी जहां यह दर कहीं ज़्यादा है – हर तीन में से दो महिलाएँ हिंसा का शिकार हैं.

मैं आज दुनिया भर में हर उस महिला के लिए चिंतित हूँ जिन्हें आर्थिक व सामाजिक दबाव के बढ़ने के कारण ज़्यादा दुर्व्यवहार या शोषण सहन करना पड़ रहा है क्योंकि सामान्य जीवन में बड़ा बदलाव आया है. 

इस दबाव से हिंसा बढ़ने का ख़तरा बढ़ गया है. यह स्पष्ट है कि जब महिलाएँ व लड़कियाँ तालाबंदी के दौरान अपने घरों में दुर्वव्यवहार करने वाले साथी के साथ रहती हैं तो उनके लिए पहले से कहीं ज़्यादा ख़तरा होता है. 

हिंसा में यह बढ़ोत्तरी किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है. मीडिया रिपोर्टें दुनिया भर में हिंसा में बढ़ोत्तरी दर्ज कर रही हैं – अर्जेंटीना से, चीन, जर्मनी, तुर्की, होंडुरस, दक्षिण अफ़्रीका, ब्रिटेन और अमेरिका इत्यादि. 

मलेशिया में हेल्पलाइन पर आने वाली कॉल की संख्या दोगुनी हो गई है जबकि फ़्रांस में 32 प्रतिशत वृद्धि हुई है. लेबनान में भी हेल्पलाइन पर इस महीने आने वाली कॉल दो गुना हो गई हैं और पिछले साल भी मार्च महीने में ऐसा ही देखा गया था.

चिंता ये है ये ऑंकड़े सिर्फ़ सामने आए मामलों को दिखाते हैं. घरेलू हिंसा के मामलों की असल संख्या से कहीं कम मामले ही सामने आ पाते हैं. आवाजाही पर पाबंदी होने और निजता सीमित हो जाने के कारण महिलाओं के लिए फ़ोन करना मुश्किल साबित हो रहा है. 

इसलिए संभावना यही है कि मौजूदा ऑंकड़े भी समस्या का एक अंश ही है. यह उन देशों में हालात का भी द्योतक है जहां रिपोर्टिंग प्रणाली की व्यवस्था है. डेटा की उपलब्धता हर जगह समान नहीं है, विशेषकर विकासशील देशों में

हालात कितने जटिल हैं?

हम महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ दुर्व्यवयहार के मामलों में भारी वृद्धि ही नहीं देख रहे हैं बल्कि हिंसा करने के तरीक़ों में गहरी जटिलता भी है. जिन महिलाओं पर कोरोनावायरस से संक्रमित होने का संदेह हैं, चाहे वो संदेह कितना भी निराधार हो, उन्हें तालाबंदी के दौरान आम रास्ते पर फेंक दिए जाने का जोखिम है.

दुर्व्यवहार करने वाले इस स्थिति का फ़ायदा उठा रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि महिलाओं को इस समय मदद नहीं मिल पाएगी. 

यह सब मौजूदा स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं की पृष्ठभूमि में ही हो रहा है. इस समय इन सेवाओं पर भारी बोझ है, संसाधन पर्याप्त नहीं हैं और ज़्यादातर संसाधन वायरस से निपटने में झोंक दिए गए हैं. 

नागरिक समाज संगठनों ने अतीत में हिंसा-पीड़ितों की मदद की है लेकिन फ़िलहाल वे भी काम करने में असमर्थ हैं, और घरेलू हिंसा से बचने के लिए बनाए गए शरणस्थल अगर खुले भी हैं तो उनमें अधिकतर में जगह नहीं बची हैं.

इसके अलावा उन स्थलों की ज़िम्मेदारी संभाल रहे प्रबंधक या तो पूरी तरह तैयार नहीं हैं या फिर वायरस के फैलने के कारण नए पीड़ितों को लेना नहीं चाहते.

फ़िलहाल क्या प्रयास किए जा रहे हैं?

सरकार से लेकर व्यक्ति तक, यूएन से लेकर व्यवसायों और नागरिक समाज तक, हर एक पक्ष की ज़िम्मेदारी काम करने की है.

कोविड-19 की जवाबी कार्रवाई के तहत घरेलू योजना के केंद्र में लिंग आधारित हिंसा से निपटना होना चाहिए. 

इस संबंध में अभिनव क़दम उठाए जा रहे हैं जिनकी प्रशंसा की जानी चाहिए और उन्हें अन्य इलाक़ों में भी लागू किया जाना चाहिए.

जैसे अर्जेंटीना में, औषधालयों (फ़ार्मेसी) को दुर्व्यवहार से पीड़ितों के लिए सुरक्षित स्थल घोषित कर दिया गया है जहाँ वे शिकायत कर सकते हैं.  

इसी तरह फ़्रांस में, अस्थाई रूप से रहने की सेवाओं के बारे में किराना स्टोर में जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है और 20 हज़ार से ज़्यादा होटल के कमरों में उन महिलाओं के लिए इंतज़ाम किया गया है जो घर वापस नहीं जा सकती. 

स्पेन की सरकार ने महिलाओं को बताया है कि अगर दुर्व्यवहार की वजह से उन्हें घर छोड़कर जाना पड़ता है तो उन्हें तालाबंदी के दौरान छूट मिलेगी.

कैनेडा और ऑस्ट्रेलिया ने महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के लिए धन आबंटन को अपनी राष्ट्रीय योजनाओं में शामिल कर लिया है. 

और क्या क़दम उठाए जाने होंगे? 

सभी देशों में राष्ट्रीय सरकारों को कोविड-19 से निपटने की योजनाओं में धनराशि आबंटित करनी होगी. साथ ही टेक्स्ट संदेशों पर आधारित सेवाओं के साथ-साथ हैल्पलाइन, ऑनलाइन क़ानूनी मदद और महिलाओं व लड़कियों के लिए मनोचिकित्सक मदद उपलब्ध करानी होगी. 

ये कुछ ऐसी सेवाएँ हैं जिन्हें अक्सर नागरिक समाज संगठन भी मुहैया कराते हैं और जिन्हें फ़िलहाल वित्तीय मदद की आवश्यकता है.

आश्रय स्थलों को ज़रूरी सेवाओं के रूप में चिन्हित किया जाना होगा और खुला रखना होगा. इसका अर्थ यह है कि वहाँ काम करने वाले स्टाफ़ के बच्चों की देखभाल का भी इंतज़ाम करना होगा.

यह ज़रूरी है कि ये सेवाएँ सुलभ बनाई जाएँ ताकि उन्हें किराना स्टोर और औषधालय जैसी अन्य आवश्यक सेवाओं में एकीकृत किया जा सके. 

संयुक्त राष्ट्र क्या कर रहा है?

दुनिया के निर्धनतम और अस्थिरता से जूझ रहे जिन स्थानों पर यूएन मानवीय राहत प्रदान कर रहा है, वहाँ महिलाओं के लिए संरक्षण सेवाओं को प्राथमिकता दी जा रही है. मैंने जिन उपायों का ज़िक्र किया है हम उन्हें राष्ट्रीय योजनाओं में शामिल किए जाने की पैरवी कर रहे हैं. 

साथ ही यूएन एक ‘स्पॉटलाइट इनीशिएटिव” तैयार कर रहा है जो महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हर प्रकार की हिंसा के अंत के लिए योरोपीय संघ के साथ एक व्यापक साझीदारी पहल है. 

इस पहल के तहत विभिन्न देशों में यूएन टीमें प्रासंगिक संगठनों के साथ मिलकर काम कर रही हैं और मौजूदा संदर्भ के मुताबिक बदलाव ला रही हैं. मसलन, सेवाओं व अभियानों को ऑनलाइन मुहैया कराना, नागरिक समाज संगठनों व अग्रिम मोर्चे पर जुटे संगठनों के लिए मदद के स्तर को बढ़ाना, घरेलू हिंसा पीड़ितों के लिए बनाए शरण स्थलों को खुला रखना, और ऑनलाइन व टेक्स्ट चैट पर कार्यक्रम को विकसित करना. 

संयुक्त राष्ट्र इस अभूतपूर्व व अनिश्चित वैश्विक संकट में दुनिया में हर स्थान पर महिलाओं की रक्षा करने और उन्हें मदद प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है.

 

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