कोविड-19: प्रवासियों व शरणार्थियों के साथ गरिमामय बर्ताव ज़रूरी

बड़ी संख्या में अफ़ग़ान नागरिकों की वतन वापसी और देश में कमज़ोर स्वास्थ्य प्रणाली होने के कारण चिंता व्याप्त है.
UNOCHA/Shahrokh Pazhman
बड़ी संख्या में अफ़ग़ान नागरिकों की वतन वापसी और देश में कमज़ोर स्वास्थ्य प्रणाली होने के कारण चिंता व्याप्त है.

कोविड-19: प्रवासियों व शरणार्थियों के साथ गरिमामय बर्ताव ज़रूरी

स्वास्थ्य

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन एजेंसी (आईओएम) ने कहा है कि महामारी कोविड-19 से उपजे संकट के दौर में भी यह हमेशा ध्यान रखना होगा कि प्रवासियों व शरणार्थियों के साथ गरिमा व सम्मान के साथ बर्ताव हो. यूएन एजेंसी के प्रवक्ता जोएल मिलमैन ने यूएन न्यूज़ को बताया कि इस महामारी के कारण व्यापक स्तर पर तालाबंदी होने से प्रवासियों, विशेषकर खाद्य उद्योग में कार्यरत लोगों, पर भी असर पड़ रहा है.

प्रवासन एजेंसी के प्रवक्ता जोएल मिलमैन ने बताया, “प्रवासियों से हमारा तात्पर्य कर्मचारियों, विस्थापितों, शरण की तलाश कर रहे लोगों से है और कई कारणों से दुनिया भर में उनकी भारी मौजूदगी है. और वे भी इंसान हैं: वे हमारे पड़ोसी हैं, हमारा परिवार हैं, वे ऐसे लोग है जिन्हें हमारे बच्चे स्कूल से जानते हैं, वे भी उसी तरह प्रभावित होते हैं जैसे इस हम सार्वजनिक स्वास्थ्य एमरजेंसी से प्रभावित हुए हैं.”

उन्होंनो कहा कि अंतरराष्ट्रीय प्रवासन एजेंसी की ओर से सबसे अहम संदेश यही है – लोगों के साथ गरिमा व उनके मानवाधिकारों के प्रति पूर्ण सम्मान के साथ व्यवहार हो और यह किसी भी परिस्थिति में नहीं बदल सकता.

प्रवासियों की आजीविका पर चिंता 

“मैंने अपनी यात्राओं के दौरान पाया है कि योरोप, उत्तर अमेरिका और धीरे-धीरे दक्षिण अमेरिका, अफ़्रीका व एशिया में भी अर्थव्यवस्था के कुछ ख़ास हिस्सों में प्रवासी लोग ज़्यादा दिखाई देते हैं. खाद्य क्षेत्र शायद उनमें सबसे ज़्यादा प्रमुख है लेकिन वृद्धजनों की देखरेख, अस्पतालों में कर्मचारी, सफ़ाई कर्मचारी और निर्माण कार्य में जुड़े श्रमिक हैं.”

ऐसे देशों की संख्या लगातार बढ़ रही है जहां बार, थिएटर, रैस्तराँ, खेल-कूद आयोजन बंद हो गए हैं और लोगों को घर पर रहने के लिए कहा जा रहा है. इसका प्रवासियों पर असर पड़ेगा और उनके लिए अपने घर धन भेजना मुश्किल हो जाएगा जिससे उनके परिवारों और समाजों के सामने मुश्किल खड़ी होगी. 

“यह हमारे लिए एक बड़ी चिंता का सबब है. हम यह नहीं कहतो कि देशों को सतर्क नहीं होना चाहिए, और हम यह भी नहीं सोचते कि ज़रूरी होने पर उन्हें लोगों को अलगाव में रखने की पैरवी नहीं करनी चाहिए. लेकिन हम जानते हैं कि इससे उन लोगों पर असर पड़ेगा जिनका जीवन-यापन व्यस्त रैस्तरांओं पर निर्भर है.”

“मैं पिछले सप्ताह स्पेन के बियबाउ में था और मेरे लिए विश्वास करना कठिन था कि कोई भी दुकानें और सार्वजनिक मेल-जोल वाले स्थानों में कुछ भी नहीं खुला था. और अगर आप बाहर निकलें तो आपको घर लौटने के लिए कहा गया. यह उस शहर में श्रमबल पर किस तरह से असर करेगा जो पूरी तरह पर्यटन पर निर्भर हैं.”

स्वस्थ लोग, स्वस्थ समाज

यूएन एजेंसी के प्रवक्ता ने बताया कि लोगों को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए. लोगों के स्वस्थ रहने से ही स्वस्थ समाजों का निर्माण होता है. 

“अगर किसी प्रवासी व्यक्ति द्वारा संक्रामक बीमारी फैलाने की आशंका है तो आप चाहेंगे कि उसके पास भी डॉक्टरों, जॉंचकर्ताओं और मेडिकल प्रोफ़ेशनल तक पहुंचने का विकल्प हो जो ये बता सकें कि वह व्यक्ति आपके या पड़ोसी के लिए ख़तरा नहीं है.”

उन्होंने कहा कि इस बीमारी के प्रति यूएन एजेंसी ख़ास तौर पर चिंतित है क्योंकि यह बाहर से आई है, दूर रहने वाले और यात्रा करने वाले लोग इसके वाहक हैं. ऐसा ही एड्स और टीबी के साथ पिछले कुछ दशकों में देखा गया है. 

“हम पहले से ही व्याप्त डर को और ज़्यादा नहीं बढ़ाना चाहते. इससे ना केवल प्रवासियों पर दोषारोपण होता है, बल्कि इससे लोगों के लिए भी ख़तरा पैदा होता है क्योंकि आप लोगों को डरा रहे हैं. अगर उन्हें यह सोचकर डर लगे कि अस्पताल जाने पर उनके साथ बुरा होगा तो वे कभी जांच नहीं कराएंगे. इसका नुक़सान सभी को उठाना पड़ता है.”

यह ज़रूरी है कि बाहर से आने वाले लोगों के पास भी स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने का रास्ता खुला रहे क्योंकि इसी में समाज का हित है.

उन्होंने बताया कि ऑंकड़े दर्शाते हैं कि भूमध्यसागर के रास्ते अफ़्रीका से योरोप की दिशा में होने वाले प्रवासन में पिछले दो-तीन साल में कमी आई है और हाल के दिनों में फैली इस महामारी से इस संख्या में ज़्यादा बदलाव नहीं आया है.

ऐसी संभावना कम है कि योरोप में महामारी फैलने से लोगों का यहां आना कम हो जाएगा. अभी फ़िलहाल पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन मौजूदा रुझान ऐसा नहीं दर्शाते हैं. 

लेकिन ईरान में इस बीमारी का प्रकोप बढ़ने से वहां रह रहे अफ़ग़ान नागरिकों ने बड़ी संख्या में अफ़ग़ानिस्तान लौटना शुरू कर दिया है. कुछ सीमा चौकियों पर यह संख्या प्रतिदिन 9 हज़ार पहुंच रही है. 

इन देशों में यूएन एजेंसी स्वास्थ्य मंत्रालयों के साथ मिलकर काम कर रही है ताकि सीमा द्वारा आने वाले लोगों के प्रवाह को नियंत्रित किया जा सके. 

इस प्रक्रिया में लोगों को संदेश दिए जा रहे हैं,आँकड़े एकत्र किए जा रहे हैं और बार्डर क्रॉसिंग पर इस एमरजेंसी के बारे में जानकारी फैलाई जा रही है.

ऐसी संभावना है कि आने वाले दिनों में अनेक अन्य देशों में ऐसे हालात देखने को मिल सकते हैं. 

सीमाबंदी का विदेशियों पर प्रभाव

सीमाओं व उन्हें बंद किए जाने के संबंध में हमारी स्पष्ट नीतियां हैं. देशों के पास सीमाओं के बारे में निर्णय लेने का अधिकार है और उनका अपने नागरिकों व वैश्विक समुदाय के प्रति दायित्व भी है.

आतंकवाद, बीमारी और आपराधिक गुटों से मुक़ाबले के लिए यह जानना ज़रूरी है कि सीमाएँ कौन लोग पार कर रहे हैं. इसलिए यूएन एजेंसी सुरक्षित, पारदर्शी व नियमित प्रवासन की पैरवी करती है.

उन्होंने कहा कि यह देशों के लिए अच्छा होगा - अगर वे जान सकें कि कौन लोग आ रहे हैं ताकि उनकी जांच की जा सके. लेकिन जब सीमाएँ बंद कर दी जाती हैं तो यह आशंका बढ़ जाती है कि सीमा पार करने के इच्छुक लोग आपराधिक गुटों का सहारा लेंगे और ऐसे रास्तों से आएंगे जहां उनकी जांच नहीं की जा सकती.

सार्वजनिक स्वास्थ्य एमरजेंसी के समय में यह ख़ास तौर पर ख़तरनाक हो जाता है क्योंकि उससे लोगों के स्वास्थ्य पर नज़र रखना मुश्किल हो जाता है. 
यह कोई नई बात नहीं है: सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक सुरक्षा, मानवीय पहलुओं और लोगों की बेरोकटोक आवागमन से जुड़े हितों में हमेशा संतुलन साधना होता है.

यूएन एजेंसी के मुताबिक प्रवासियों की सुरक्षा के लिए कई क़दम उठाए जा रहे हैं. “हमने धन एकत्र किया है, हम जागरूकता का प्रसार कर रहे हैं और जहाँ तक हो सके, अपने साझीदार संगठनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.”

कुछ सप्ताह पहले एक कार्यक्रम शुरू किया गया था जिसमें मंगोलिया की राजधानी में प्रवेश कर रही और बाहर जाने वाली कारों की जांच की गई.

ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में भी सीमा पार करने वाले प्रवासियों के लिए इंतज़ाम किए गए हैं.