लड़कियों के लिए अब भी 'हिंसा व भेदभाव' से भरी है दुनिया

4 मार्च 2020

दुनिया में पहले समय की तुलना में मौजूदा समय में लड़कियाँ कहीं ज़्यादा संख्या में और ज़्यादा अवधि के लिए स्कूलों में शिक्षा हासिल करने के लिए जा रही हैं लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी प्रगति के बावजूद उनके लिए समानता और हिंसा रहित माहौल सुनिश्चित करने की मंज़िल अब भी दूर है. विश्व में ‘महिलाओं की स्थिति पर आयोग’ के 64वें सत्र के ठीक पहले जारी हुई संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF), प्लान इंटरनेशनल और यूएन महिला संस्था की एक नई रिपोर्ट में यह स्थिति सामने आई है.

A New Era for Girls: Taking stock on 25 years of progress नामक यह रिपोर्ट ‘पीढ़ी समानता’ मुहिम के तहत ‘बीजिंग घोषणा-पत्र और कार्रवाई मंच’ के 25 साल पूरे होने के अवसर पर जारी की गई है.

वर्ष 1995 में बीजिंग घोषणापत्र में महिलाओं व लड़कियों के अधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए सदस्य देशों ने एक ऐतिहासिक ब्लूप्रिंट पर सहमति जताई थी.

लेकिन नई रिपोर्ट दर्शाती है कि महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा अब भी आम बात है. उदाहरणस्वरूप, वर्ष 2016 में मानव तस्करी के 70 फ़ीसदी पीड़ितों में महिलाएं व लड़कियां थी, जिनमें अधिकतर यौन उत्पीड़न का शिकार हुईं.

15 से 19 वर्ष आयु वर्ग में औसतन हर 20 में से एक लड़की के साथ बलात्कार किया गया.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की कार्यकारी निदेशक हेनरीएटा फ़ोर ने बताया, “25 साल पहले सरकारों ने महिलाओं व लड़कियों के लिए एक संकल्प लिया था लेकिन उसे लागू करने के मामले में आंशिक प्रगति ही हुई है."

"दुनिया ने लड़कियों को बड़ी संख्या में स्कूल भेजने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति तो जुटाई है लेकिन भाग्य को बदल देने के लिए ज़रूरी हुनर व सहारा देने में, और सुरक्षा व गरिमा के साथ जीवन जीने के लिए उन्हें तैयार ना कर पाना शर्मिंदगी का सबब है.”

रिपोर्ट दर्शाती है कि स्कूल ना जाने वाली लड़कियों की संख्या में पिछले दो दशकों में सात करोड़ 90 लाख की गिरावट आई है यानि ये इतनी लड़कियों को स्कूली शिक्षा की सुविधा हासिल हुई और लड़कों की तुलना में लड़कियों के माध्यमिक शिक्षा हासिल करने की संभावना भी बढ़ी है.

मुश्किलों भरा जीवन

लेकिन हर जगह लड़कियों के प्रति हिंसा का ख़तरा बढ़ता जा रहा है – ऑनलाइन माध्यमों पर, कक्षाओं, घरों और समुदायों में इस ख़तरे के शारीरिक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक नतीजे देखे जा रहे हैं.

बाल विवाह और जननांग विकृति (ख़तना) के कारण लाखों लड़कियों का जीवन तबाह हो रहा है. हर साल लगभग एक करोड़ 20 लाख लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर जाती है और 40 लाख से ज़्यादा लड़कियाँ जननांग विकृति का शिकार होने का जोखिम झेलती है.

पोषण व स्वास्थ्य के मामलों में भी लड़कियों की स्थिति में गिरावट आई है.

रिपोर्ट के अनुसार पारंपरिक स्वस्थ आहार के बजाय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भोजन खानवे का चलन बढ़ा है और आक्रामक विज्ञापन के ज़रिए शुगर से भरपूर पेय-पदार्थों और ऐसी अन्य वस्तुओं के लिए बच्चों को लुभाया जा रहा है जिनसे उनका वज़न और मोटापा बढ़ रहे हैं.

© UNICEF/Pazos
उरुग्वे में कुछ किशोरियाँ एक पार्क में पिकनिक मनाते हुए खाने-पीने की चीज़ों का आनंद लेते हुए. स्कूल से बाहर रहने वाली लड़कियों की संख्या कम हुई है, यानी ज़्यादा लड़कियाँ स्कूली शिक्षा हासिल कर पा रही हैं.

वर्ष 1995 से 2016 तक पांच से 19 वर्ष आयु वर्ग में ज़्यादा वज़न वाली लड़कियों का आंकड़ा 9 (7 करोड़) फ़ीसदी से बढ़कर 17 फ़ीसदी (15 करोड़) हो गया है.

डिजिटिल टैक्नॉलॉजी के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण मानसिक स्वास्थ्य के प्रति चिंता भी बढ़ रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 19 वर्ष के आयु वर्ग की लड़कियों में मौत का दूसरा सबसे कारण आत्महत्या है.

साथ ही उन्हें एचआईवी सहित अन्य यौन संचारित संक्रमणों से भी जोखिम रहता है. 10 से 19 वर्ष के आयु वर्ग में एचआईवी पीड़ित लड़कियों की संख्या वर्ष 1995 में सात लाख 40 हज़ार थी जो अब बढ़कर 9 लाख 70 हज़ार हो गई है.

यूनीसेफ़ प्रमुख ने कहा है कि केवल शिक्षा की सुलभता ही पर्याप्त नहीं है – लड़कियों के प्रति लोगों के व्यवहार और रवैये में भी तब्दीली लानी होगी.

उनके मुताबिक वास्तविक समानता तभी आएगी जब लड़कियां हिंसा से सुरक्षित होंगी, अपने अधिकारों को इस्तेमाल कर पाएंगी, और जीवन में बराबरी के अवसरों का लाभ उठा पाएंगी.

 

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