महिलाएँ और लड़कियाँ, वैश्विक जल एवं स्वच्छता संकट का ख़मियाज़ा भुगतने को विवश
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) और विश्व स्वास्थ्य संगठन ((WHO) ने एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि पेयजल की कमी वाले 10 में से सात घरों में, पानी इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी मुख्यत: महिलाओं व लड़कियों परी होती है.
यह अध्ययन, घरों में पीने के पानी, स्वच्छता व साफ़-सफ़ाई (WASH) में व्याप्त लैंगिक असमानताओं का पहला गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिससे स्पष्ट होता है कि वैश्विक जल और स्वच्छता संकट का खमियाज़ा, विशेषकर महिलाओं और लड़कियों को भुगतना पड़ता है.
अरबों लोग पहुँच से वंचित
विश्व स्तर पर, 2 अरब 20 करोड़ लोगों के पास अब भी घर पर सुरक्षित पेयजल का अभाव है, और लगभग 3 अरब 40 करोड़ लोगों को सुरक्षित स्वच्छता तक पहुँच हासिल नहीं है. लगभग दो अरब लोगों के लिए, घर पर साबुन और पानी से हाथ धोना सम्भव नहीं हो पाता.
रिपोर्ट में पाया गया कि घरों के लिए पानी लाने की सबसे अधिक ज़िम्मेदारी, महिलाओं पर होती है और इस काम में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या लगभग दोगुनी है.
ख़तरनाक यात्राएँ
महिलाओं और लड़कियों को आमतौर पर पानी लाने के लिए लम्बी यात्रा करनी पड़ती है, जिससे उनकी शिक्षा, काम और ख़ाली समय का नुक़सान होता है. रास्ते में उन्हें शारीरिक चोट लगने और ख़तरों का भी सामना करना पड़ता है.
WASH और CEED की यूनीसेफ़ निदेशक, सीसीलिया शार्प ने कहा, "पानी इकट्ठा करने के लिए उठने वाला, लड़की का हर एक क़दम, उसे सीखने, खेलने और सुरक्षा से एक क़दम दूर कर देता है."
उन्होंने कहा, "असुरक्षित जल, शौचालय और घर में हाथ धोने की सुविधा से वंचित होने से, लड़कियों की क्षमता छिन जाती है, उनके कल्याण से समझौता होता है और ग़रीबी का दुष्चक्र क़ायम रहता है."
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में लगभग दो अरब लोग, घरों के परिसर में पेयजल आपूर्ति से वंचित हैं. इनमें से अधिकतर घरों, यानि 10 में से सात घरों में, पुरुषों और लड़कों की तुलना में, 15 वर्ष व उससे अधिक उम्र की महिलाओं एवं लड़कियों पर पानी लाने की ज़िम्मेदारी रहती है.
निजता और गरिमा से समझौता
महिलाओं और लड़कियों को अक्सर घर के बाहर शौचालय का इस्तेमाल करने में असुरक्षा महसूस होती है और साफ़-सफ़ाई की कमी का भी उनपर प्रतिकूल असर पड़ता है.
दुनिया भर में 50 करोड़ से अधिक लोगों को, स्वच्छता सुविधाएँ, अन्य घरों के साथ बाँटनी पड़ती है, जिससे महिलाओं और लड़कियों की गोपनीयता, गरिमा व सुरक्षा से समझौता होता है.
22 देशों के सर्वेक्षणों से स्पष्ट होता है कि साझा शौचालय वाले घरों में, पुरुषों व लड़कों की तुलना में, महिलाओं और लड़कियों को, रात में शौच के लिए अकेले जाने में असुरक्षा महसूस होती है, और यौन उत्पीड़न एवं अन्य सुरक्षा जोखिमों का ख़तरा रहता है.
इसके अलावा, अपर्याप्त WASH सेवाओं के कारण, महिलाओं एवं लड़कियों के लिए स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं और सुरक्षित मासिक धर्म प्रबन्धन की क्षमता सीमित होती है.
WHO के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य विभाग की निदेशक, डॉक्टर मारिया नीरा ने बताया कि पानी, स्वच्छता एवं साफ़-सफ़ाई तक अपर्याप्त पहुँच के कारण, हर वर्ष 14 लाख लोगों की मौत होती है.
उन्होंने कहा, “महिलाओं और लड़कियों को न केवल दस्त एवं साँस के तीव्र संक्रमण जैसे वॉश-सम्बन्धित संक्रामक रोगों का सामना करना पड़ता है, बल्कि वो अन्य स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति भी स्वेंवेदनशील हो जाती हैं. घर से बाहर पानी लाने या शौचालय का उपयोग करने के लिए जाने पर, उन्हें उत्पीड़न, हिंसा व चोट पहुँचने का शिकार होने की आशंका रहती है.”
अधिक कार्रवाई की आवश्यकता
रिपोर्ट में, हर जगह, हर व्यक्ति को समस्त WASH सेवाओं तक पहुँच उपलब्ध करवाने की दिशा में हुई वैश्विक प्रगति को भी रेखांकित किया गया है.
2015 और 2022 के बीच, सुरक्षित रूप से प्रबन्धित पेयजल तक घरेलू पहुँच, 69 प्रतिशत से बढ़कर 73 प्रतिशत हो गई. इसी अवधि में सुरक्षित रूप से प्रबन्धित स्वच्छता में, 49 प्रतिशत से 57 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई और बुनियादी स्वच्छता सेवाओं में 67 प्रतिशत से 75 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई.
हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने चेतावनी भी दी है कि 2030 तक सुरक्षित रूप से प्रबन्धित WASH सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुँच के टिकाऊ विकास लक्ष्य (SDG) को प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयासों की आवश्यकता है.
यह सुनिश्चित करने के लिए भी अतिरिक्त कार्रवाई की आवश्यकता है कि इस प्रगति का उपयोग लैंगिक समानता हासिल करने के लिए किया जा सके.