मानवाधिकार परिषद: महिलाधिकारों का एजेंडा अभी 'अधूरा है'

25 फ़रवरी 2020

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने 'बीजिंग घोषणापत्र' की 25वीं वर्षगांठ पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा है कि महिला अधिकारों कि दिशा में हुई प्रगति पर संतुष्ट होकर नहीं बैठा जा सकता. विश्व भर में महिला अधिकारों के सामने चुनौतियों पैदा हो रही हैं.

मंगलवार को यूएन मानवाधिकार परिषद में एक पैनल विचार-विमर्श में हिस्सा लेते हुए उन्होंने कहा कि ‘बीजिंग घोषणापत्र’ प्रसन्नता की वजह है लेकिन उस पर कार्रवाई की योजना अब भी अधूरी है.

यूएन मानवाधिकार मामलों की प्रमुख के मुताबिक महिला अधिकारों के रास्ते में रूकावटों का जोखिम बना हुआ है और लगातार बढ़ रहा है. बीजिंग में हुआ सम्मेलन मानवाधिकारों पर मज़बूत सामूहिक संकल्प का परिचायक था लेकिन उसके 25 वर्ष बाद हालात बदल गए हैं.

उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज़ में कहा कि महिला अधिकारों को ख़तरा है और उन पर कई मोर्चों पर हमले होते हैं. सदियों से चले आ रहे भेदभाव पर आधारित लैंगिक असमानताएं फिर उभर रही हैं और महिला अधिकारों पर पलटवार हो रहा है.

लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि महिला अधिकारों पर मोलभाव नहीं हो सकता. “वे वैकल्पिक नीति नहीं हो सकते जो राजनीति की हवा के हिसाब से बदल जाए.”

उन्होंने 25 वर्ष पहले परिवर्तनकारी उन नारों की याद दिलाई में जिसमें “महिलाधिकार हैं मानवाधिकार” की पुकार लगाई गई थी जिससे कायापलट कर देने वालों की बदलावों की नींव पड़ी.

इसके बाद ‘बीजिंग घोषणापत्र एंड प्लेटफ़ॉर्म फ़ॉर एक्शन’ को पारित किया गया जिसके ज़रिए 189 सदस्य देशों ने लैंगिक समानता को हासिल करने का प्रण लिया था.

यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि बड़ी मुश्किलों से महिलाओं के अधिकारों को मानवाधिकार माना गया है और उसके सामने आने वाली चुनौतियों को कड़ाई से सामना किया जाना चाहिए. “मानवीय गरिमा का विच्छेदन, मोलभाव या उसे हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता और ना ही महज़ कुछ का विशेषाधिकार है.”

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने मानवाधिकार परिषद में संयुक्त राष्ट्र महासचिव के उस संबोधन का स्वागत किया जिसमें उन्होंने  भेदभावपूर्ण क़ानूनों, महिलाओं व लड़कियों के प्रति हिंसा का अंत करने, यौन व प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े अधिकारों को सुनिश्चित करने और सभी क्षेत्रों में महिलाओं को बराबर प्रतिनिधित्व के प्रयासों का आहवान किया है.

उन्होंने कहा कि “महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा सबसे अधिक रूप से व्याप्त मानवाधिकार का हनन है.”

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा कि बीजिंग समझौता कोई आकस्मिक घटना नहीं थी बल्कि वह सरकारों, नागरिक समाजों व अन्य साझेदारों द्वारा सोची-समझी कार्रवाई का नतीजा था.

”पिछले 25 वर्षों में हमने सर्वश्रेष्ठ तरीक़ों को विकसित किया है और इस प्रगति को तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए भी पूरी तरह तैयार हैं.” उन्होंने सभी पक्षकारों से उसी एकता, दूरदृष्टि और संकल्प को दर्शाने का आग्रह किया जिसे बीजिंग में प्रदर्शित किया गया था.

“हाल के सालों में बेरोज़गारी दर में कमी आई है लेकिन अब भी कई महिलाएं बेरोज़ग”

यूएन महिला संस्था की कार्यकारी निदेशक पुमज़िले म्लाम्बो न्गुका ने बताया कि महिला अधिकारों के मोर्चे पर प्रगति धीमी व असमान है और श्रम बाज़ार में भी खाई बनी हुई है.

महिलाओं व लड़कियों के प्रति हिंसा अब भी बरक़रार है और एक ऐसे वैश्विक संकट के रूप में क़ायम है जिससे निपटने के लिए ज़्यादा प्रयासों को किया जाना होगा और सदस्य देशों को ‘बीजिंग प्लेटफ़ॉर्म फ़ॉर एक्शन’ में लिए गए संकल्पों फिर से स्फूर्ति प्रदान करनी होगी.

 

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