तापमान 3 डिग्री के उछाल की राह पर, जलवायु लक्ष्य हासिल हुए तब भी

26 नवंबर 2019

वर्ष 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते के तहत निर्धारित लक्ष्यों और संकल्पों को हासिल भी कर लिया जाए तो भी दुनिया तापमान में 3.2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी की राह पर आगे बढ़ रही है.  जिसका मतलब होगा कि दुनिया में जलवायु परिवर्तन के और भी ज़्यादा व्यापक व विनाशकारी प्रभाव होंगे, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने ये चेतावनी वार्षिक कार्बन अंतर रिपोर्ट में मंगलवार को जारी की है.

इस वार्षिक कार्बन अंतर रिपोर्ट में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मौजूदा स्तर और उनके लक्षित स्तर के बीच आकलन प्रस्तुत किया गया है.

ये आकलन दर्शाता है कि दुनिया को तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है तो अगले एक दशक के दौरान कार्बन उत्सर्जन में हर वर्ष 7.6 फ़ीसदी की गिरावट होना ज़रूरी है.

अगर वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोत्तरी होती है तो हम जलवायु प्रभावों के ज़्यादा और विनाशकारी नुक़सान देख रहे होंगे.

जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने भी ये अनुमान विभिन्न रिपोर्टों में पेश किए हैं. इनमें हाल के वर्षों में देखी गई गर्मी, लू, तूफ़ान जैसे हालात शामिल हैं. 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की कार्यकारी निदेशक इनगेर एंडरसन का कहना है, "जलवायु परिवर्तन पर समय रहते और सख़्त कार्रवाई करने में नाकामी का मतलब है कि हमें अब कार्बन उत्सर्जन में तेज़ी से कटौती के इंतज़ाम करने होंगे."

अपेक्षा की जा रही है कि  दिसंबर 2020 में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन - (COP26) में अपने जलवायु संबंधी संकल्पों पर कार्रवाई तेज़ करने का वादा करेंगे.

हालाँकि कार्यकारी निदेशक इनगेर एंडरस का कहना था कि स्थिति की तात्कालिकता का मतलब है कि अब एक साल भी और इंतज़ार नहीं किया जा सकता, "देशों को, शहरों को, क्षेत्रों को, कारोबारों और व्यक्तियों - सभी को बिना देरी के बिल्कुल अभी कार्रवाई करनी होगी"

उनका कहना था, "हमें वर्ष 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में ज़्यादा से ज़्यादा कटौती करने के लिए त्वरित कार्रवाई करनी होगी... अगर हम अभी ये नहीं करते हैं तो तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य 2030 से पहले ही पहुँच के बाहर हो जाएगा."

विकसित देश बढ़ाएँ क़दम

यूएनईपी की रिपोर्ट में सभी देशों से कार्बन उत्सर्जन को कम करने और नैशनली डिटरमिन्ड काँट्रीब्यूशंस यानी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित किए गए योगदान लक्ष्य 2020 तक बढ़ाने का आहवान किया गया है.

ये संकल्प पेरिस समझौते के तहत व्यक्त किए गए थे. साथ ही इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आवश्यक नीतियाँ बनाकर उन्हें लागू करें.

अलबत्ता विश्व के सर्वाधिक विकसित देशों (जी-20) को आगे बढ़कर पहल करनी होगी.

ध्यान रहे कि यही देश दुनिया भर में होने वाले कार्बन उत्सर्जन की लगभग 78 प्रतिशत मात्रा के लिए ज़िम्मेदार हैं.

इनमें से सिर्फ़ पाँच देशों ने अभी शून्य कार्बन के दीर्घकालिक लक्ष्य हासिल करने के लिए इरादा दिखाया है.

समाधान मौजूद हैं

अध्ययन में बताया गया है कि वर्ष 2030 तक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है; इसके लिए तकनीक मौजूद है, और जलवायु कार्रवाई के अतिरिक्त फ़ायदों के बारे में समझ भी बढ़ी है कि उससे स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को कितना फ़ायदा होगा.

बहुत सी सरकारें, शहर, कारोबार और निवेशक कार्बन उत्सर्जन को कम करने के महत्कांक्षी प्रयासों में लगे हुए हैं.

यूएनईपी का कहना है कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से ग़ैर-अनुपातिक तौर पर ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ रहा है.

ये देश विकसित देशों में किए जा रहे सफल प्रयासों से सबक़ सीख सकते हैं. यहाँ तक कि विकासशील देश तेज़ी से स्वच्छ तकनीकें अपनाकर विकसित देशों से आगे निकल सकते हैं.

 

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