विधवाओं को क़तई बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता

23 जून 2019

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के अवसर पर कहा है कि विधवाओं के नाज़ुक हालात के बारे में सभी को संवेदनशील तरीक़े से सोचना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि उनकी आर्थिक व भावनात्मक मुश्किलें कहीं उनके लिए और ज़्यादा मुश्किलें ना पैदा कर दें. अंतरराषट्रीय विधवा दिवस हर वर्ष 23 जून को मनाया जाता है. इस मौक़े पर महासचिव ने सभी का आहवान करते हुए कहा कि ये सभी इंसानों की ज़िम्मेदारी है कि विधवाएं कहीं अकेली और बेसहारा ना रह जाएँ और उन्हें पीछे ना छोड़ दिया जाए.

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश का कहना था कि बहुत से देशों में विधवाओं को कोई सामाजिक व क़ानूनी संरक्षण हासिल नहीं है और इसके अभाव में विधवाओं की जीवन भर की जमा पूँजी उन्हें ग़रीबी के गर्त से बचाने के लिए काफ़ी नहीं होती है.

जिन देशों में विधवाओं के लिए पेंशन का प्रावधान भी है तो भी महिलाओं को वृद्धावस्था में पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा ग़रीबी का सामना करने की ज़्यादा संभावना होती है.

महासचिव ने कहा कि विशेष रूप से विधवाओं को वृद्धावस्था में सामाजिक सेवाओं के सहारे की बहुत ज़रूरत होती है क्योंकि उन्हें या तो अकेले रहना पड़ सकता है और वृद्धावस्था में उन्हें चिकित्सा सुविधाओं की भी ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है. 

बहुत से देशों में विधवाओं को विरासत व संपत्ति हासिल करने के भी अधिकार नहीं होते हैं जैसाकि पुरुषों के पास होते हैं. इसका अर्थ है कि विधवाओं को अपनी अचल संपत्ति से हाथ धोना पड़ सकता है, यहाँ तक कि उनके अपने बच्चों से मिलने का अधिकार भी छिन सकता है.

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख का कहना था कि जिन देशों में क़ानून में अगर महिलाओं और पुरुषों के बीच कोई भेदभाव नहीं भी होता है तब भी उन क़ानूनी अधिकारों को वास्तविक रूप में लागू करना बहुत ज़रूरी है. 

इससे भी ज़्यादा चिंता की बात ये है कि बहुत से देशों और समाजों में विधवाओं को अलग-थलग कर दिया जाता है, उनके साथ ख़राब बर्ताव होता है और कभी-कभी तो उनके साथ हिंसा भी होती है.

इसमें यौन हिंसा, प्रताड़वना और जबरन पुनर्विवाह जैसे दमनकारी चलन भी शामिल होते हैं.

एंतोनियो गुटेरेश ने लड़ाई-झगड़ों और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान विधवाओं के लिए पैदा होने वाली मुश्किलों का भी ज़िक्र करते हुए कहा कि ऐसे हालात में भारी नुक़सान व विस्थापन की वजह से सामाजिक और क़ानूनी संरक्षण कमज़ोर हो जाता है. ऐसी आपदाओं के लिए विधवाओं को ज़िम्मेदारी ठहराने वाली परंपराओं को भी रोकना होगा. 

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश का कहना था, “इस अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस पर हमें तमाम विधवाओं समर्थन देने का संकल्प ताज़ा करना होगा, चाहे वो विधवाएँ किसी भी उम्र की हों, कहीं भी रहती हैं और वहाँ कोई भी क़ानूनी व्यवस्था लागू हो.” ये सुनिश्चित करना हम सभी की ज़िम्मेदार है कि विधवाएँ अलग-थलग ना पड़ जाएँ और उन्हें पीछे ना छोड़ दिया जाए.

अदृश्य महिलाएँ 

महिलाओं की बेहतरी के लिए काम करने वाले संयुक्त राष्ट्र के संगठन यू एन वीमैन की कार्यकारी निदेशक फ्यूमज़ाइल म्लाम्बो न्गक्यूका ने अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस पर अपने संदेश में कहा कि निसंदेह पारिवारिक संस्कृतियों में विधवाओं को प्रेम, सहायता और भावनात्मक सहारे वाला माहौल मिलता है. लेकिन कुछ पारिवारिक स्थान महिलाओं व लड़कियों के लिए भेदभाव का ठिकाना भी बन जाते हैं, उनमें विधवाओं को ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ता है और अक्सर उससे बचने का कोई रास्ता नहीं होता है.

उनका कहना था, “जब किसी महिला की स्थिति उसके पति की वजह से सम्मानजक होती है तो पति की मृत्यु यानी विधवा होने पर उस महिला को अक्सर पारिवारिक ढाँचे में अलग-थलग कर दिया जाता है. ऐसे हालात में वो विधवाएँ कई तरह की मुश्किलों का सामना करती हैं जिनमें ग़रीबी, अकेलापन और अलग-थलग कर दिया जाना शामिल होते हैं.” 

उनका कहना था कि ग़रीबी परिवारों में पतियों की उम्र पत्नियों से कहीं ज़्यादा होने के कारण महिलाओं के विधवा होने की ज़्यादा संभावनाएँ होती हैं. इनमें कच्ची उम्र में ही लड़कियों के विवाह कर देना और ग़रीब परिवारों में आर्थिक कमज़ोरी की वजह से पुरुषों की औसत उम्र काफ़ी कम होने जैसे कारण भी शामिल होते हैं. साथ ही अनेक देशों में भेदभावपूर्ण विरासत क़ानूनों की वजह से विधवाओं को अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है.

यू एन वीमैन की प्रमुख का कहना था कि जिन देशों में विधवाओं को इन परेशानियों से बचाने के लिए क़ानून भी मौजूद हैं वहाँ भी अक्सर विधवाओं की संपत्ति पर क़ब्ज़ा करके उन्हें बेसहारा कर दिया जाता है.

“हर समाज और देश में बड़ी संख्या में मौजूद होने के बावजूद विधवाएँ अक्सर अदृश्य महिलाएं बनकर रह गई हैं. और उनके सामने दरपेश चुनौतियों और मुश्किलों के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती है.”

वर्ष 2010 के आँकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में 55 से 59 वर्ष की लगभग 14.6 फ़ीसदी महिलाएँ विधवा थीं. इससे पूरी तस्वीर नहीं नज़र आती क्योंकि महिलाएँ कम उम्र में भी विधवा हो सकती हैं और उनके पास कोई विरासत, संपत्ति या जीवन जीने लिए अन्य साधन नहीं बचते हैं.

“विधवा होने पर ख़ुद का भरण-पोषण करना और अपने बच्चों की देखभाल करने की जद्दोजहद में महिलाएँ अक्सर जीवन की दौड़ में पिछड़ जाती हैं और ये पिछड़ापन ग़रीबी के रूप में कई पीढ़ियों तक देखा जा सकता है.” 

यू एन वीमैन की कार्यकारी निदेशक का कहना था कि इन चुनौतियों का मुक़ाबला करने के लिए और देरी किए बिना विधवाओं की देखभाल और उन्हें सहारा देने के लिए ठोस उपाय करने होंगे. 

उन्होंने कहा कि सरकारों को विधवाओं की आमदनी सुनिश्चित करने और आर्थिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ठोस नीतियाँ बनाकर उन पर अमल सुनिश्चित करना होगा.

“इस अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस पर हम विधवाओं को उनकी तमाम विविधता के साथ पहचान देते हैं और उन्हें समाज में पूरी तरह से समावेशित करते हैं, साथ ही महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता क़ायम करने के मिशन के तहत विधवाओं के ग़रीबी के कुचक्र को तोड़ने का संकल्प लेते हैं और ये सुनिश्चित करने का संकल्प लेते हैं कि तमाम विधवाएँ अपने सभी बुनियादी अधिकारों का आनंद ले सकें.”

 

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