“विद्वेषपूर्ण अभिव्यक्तियों को बल देने वाला राजनैतिक अवसरवाद समाप्त हो”

1 मई 2019

धार्मिक संस्थाओं के खिलाफ जानलेवा हमलों के मद्देनजर विश्व के नेताओं को उस ‘राजनैतिक अवसरवाद’ और नीतियों को समाप्त करने की आवश्यकता है जिनके कारण नफरत भरी अभिव्यक्तियों और हिंसक अतिवाद को बढ़ावा मिलता है. नरसंहार की रोकथाम पर संयुक्त राष्ट्र विशेष सलाहकार एडमा डिआंग ने यह वक्तव्य दिया है. 

बुधवार को जिनिवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में धर्म, शांति और सुरक्षा पर द्वितीय शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया. इसके समापन पर एडमा डिआंग ने कहा कि श्रीलंका में गिरजाघर में दर्जनों मौतों, कैलीफोर्निया में सिनेगॉग हमले और बुर्किना फ़ासो में गिरजाघर में हत्याओं के बाद यह आशंका बढ़ गई है कि ऐसे हमले किसी दूसरे स्थान पर भी हो सकते हैं.   

“हम शांति की बात कर रहे हैं, हम न्याय की बात कर रहे हैं, हम मजबूत संस्थाओं की बात कर रहे हैं.” उन्होंने तत्काल कार्रवाई की जरूरत पर बल दिया और पूछा कि “दक्षिणपंथी नेताओं को दोष देना बहुत आसान है लेकिन बाकी लोग क्या कर रहे हैं?”

उन्होंने कहा कि अधिक उदार राजनेताओं को इसके खिलाफ ‘बोलने’ और ‘बेहतर तरीके से लोगों को एकजुट करने की जरूरत है लेकिन कई बार हम पाते हैं कि इस समूह में भी राजनैतिक अवसरवादी मौजूद हैं.’
उन्होंने कहा कि इस पर तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए, विशेष रूप से यूरोप में. वर्तमान दौर में वहां से सैन्य राष्ट्रवाद के वही संकेत मिल रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप 1930 के दशक में नस्लीय विचारधारा पर आधारित हिंसक शासन का उदय हुआ था.  

डिआंग ने कहा, ‘हमें उस कुटिल राजनैतिक संवाद पर विराम लगाना होगा. छिटपुट कार्य और एकाध शब्द ही बड़े नरसंहार को जन्म देते हैं.’ उन्होंने चेतावनी दी कि नाज़ियों द्वारा यहूदियों के खिलाफ विद्वेष की शुरुआत घृणास्पद भाषणों और अपराधों से हुई थी जिसके चलते यहूदियों का बुनियादी मानवाधिकार भी छीन लिया गया. 

‘1994 में रवांडा में तुत्सियों और दूसरों समूहों के खिलाफ़ भी ऐसे ही नफ़रत फैलाई गई थी. वहां तुत्सियों को ‘सांप’ कहा जाता था. यह नफ़रत शब्दों से शुरू हुई और आज भी हम ऐसे ही दृश्य देख रहे हैं.’

21 अप्रैल को श्रीलंका के गिरजाघरों और होटलों पर घातक हमले में 250 से अधिक लोगों की मौत हुई. इसके मद्देनजर यूएन अलायंस ऑफ सिविलाइजेशन (UNAOC) के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्च प्रतिनिधि मिगेल मोराटिनोस ने मंगलवार को श्रीलंका का दौरा किया. हमले के बाद यह किसी संयुक्त राष्ट्र उच्चाधिकारी का पहला दौरा था. मोराटिनोस ने आतंकवाद और हिंसक अतिवाद को काबू करने के लिए सरकार के प्रयासों का समर्थन किया.   

यूएनएओसी के बयान के अनुसार, श्रीलंका में श्री मोराटिनोस मुख्य राजनीतिज्ञों, धार्मिक नेताओं, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों, तथा संयुक्त राष्ट्र स्थानीय समन्वयक एवं संयुक्त राष्ट्र की कंट्री टीम से मिले. राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना से भेंट के दौरान मोराटिनोस ने ‘व्यक्तिगत सहानुभूति तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव की ओर से हार्दिक संवेदना प्रकट की.’ 

मोराटिनोस ने राष्ट्रपति से कहा, ‘आप अकेले नहीं हैं.’ राष्ट्रपति सिरीसेना ने कहा कि वह अपने देश को ‘आगे बढ़ाने और सुरक्षा बहाल करने के लिए दृढ़ संकल्प हैं.’ 

मोराटिनोस ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ‘सौहाद्र, एकता और सामाजिक समरसता बरकरार रखने के उनके प्रयासों को पूर्ण सहयोग देगा.’ उन्होंने इस बात पर बल दिया कि श्रीलंका में शरण के इच्छुक लोगों और शरणार्थियों की समस्या का दीर्घकालीन समाधान निकालने की जरूरत है ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.

ईस्टर हमले के बाद श्रीलंका में लगभग 1,600 शरणार्थियों और शरण के इच्छुक लोगों, विशेष रूप से अहमदिया मुसलमानों पर हिंसक हमले किए गए हैं.  

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने मोराटोनिस को आधिकारिक तौर पर धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने से जुड़ी एक पहल का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी है. श्रीलंका दौरे के दौरान मोराटिनोस प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे से भी मिले. इस मुलाक़ात में दोनों ने श्रीलंका के समाज में एकता और शांतिपूर्ण तरीके से सह-अस्तित्व को बहाल करने के मौजूदा प्रयासों पर परस्पर विचारों का आदान-प्रदान किया. 

 

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