मानवाधिकारों को चुनौतियां कई लेकिन उम्मीद कायम

25 फ़रवरी 2019

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने मानवाधिकार परिषद को संबोधित करते हुए कहा है कि दुनिया के कई हिस्सों में आम जन के अधिकार ख़तरे में हैं. इसके बावजूद उन्होंने आशा का दामन नहीं छोड़ा है क्योंकि सामाजिक न्याय के लिए हो रहे सशक्त आंदोलन प्रगति लाने में सफल भी हो रहे हैं. 

जिनिवा में मानवाधिकार परिषद के 40वें सत्र की सोमवार को शुरुआत हुई जो 22 मार्च तक चलेगा. 

सत्र के पहले दिन अपने संबोधन में महासचिव गुटेरेश ने मानवाधिकार से जुड़े सभी मुद्दों पर संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने में परिषद की अहम भूमिका को रेखांकित किया. युवाओं, मूल निवासियों, प्रवासियों और शरणार्थियों का विशेष रूप से ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि परिषद के दरवाज़ों के बाहर बहुत सी आवाज़ें अपने अधिकार मांग रही हैं.

मानवाधिकारों के नज़रिए से अहम कई अन्य क्षेत्रों में हुई उल्लेखनीय प्रगति पर जानकारी साझा करते हुए यूएन महासचिव ने कहा, "एक अरब से ज़्यादा लोगों को एक पीढ़ी में ही अत्यधिक ग़रीबी से बाहर लाने में सफलता मिली है. दो अरब से अधिक लोग अब बेहतर साफ़-सफ़ाई में रह रहे हैं और ढाई अरब लोगों के पास पीने का स्वच्छ पानी है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 60 प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट आई है."

लेकिन चुनौतियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए महासचिव गुटेरेश ने ज़ोर देकर कहा कि लैंगिक असमानता अब भी बनी हुई है. "महिलाओं और लड़कियों को अब भी हर दिन असुरक्षा, हिंसा और मानवाधिकारों के हनन का सामना करना पड़ता है." उन्होंने कहा कि कई अदृश्य बाधाएं उनके रास्ते में आती हैं. 

"आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में खाई में को पाटने में दो सौ साल का समय लगेगा. मैं ऐसी दुनिया को स्वीकार नहीं कर सकता जो मेरी पोतियों को कहे कि आर्थिक समानता हासिल करने के लिए उनकी पोतियों की पोतियों को प्रतीक्षा करनी होगी. मैं जानता हूं कि आप भी सहमत होंगे. हमारी दुनिया प्रतीक्षा नहीं कर सकती."

15 मिनट के अपने संबोधन में महासचिव ने पुर्तगाल के पूर्व शासक एंतोनियो सालाज़ार की तानाशाही के दौरान जीवन के अपने अनुभवों पर भी बात की जब लोगों को दमन का सामना करना पड़ा था. 

UN Photo/Elma Okic
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद.

 

"दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए हुए संघर्षों और उनमें मिली सफलताओं ने ही हमें बदलाव लाने में विश्वास रखने और उस दिशा में प्रयास करना सिखाया. मानवाधिकार हमें प्रेरित करते हैं और प्रगति लाने का ज़रिया हैं. और यही सच्चाई इस परिषद को जीवंत बनाती है. यह हमारे संगठन में यूएन चार्टर का डीएनए है और दुनिया में फैली बुराईयों से निपटने के लिए अहम है."

बढ़ती नफ़रत पर लगाम कसना ज़रूरी

महिला अधिकारों की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहने के साथ-साथ यूएन महासचिव ने सचेत किया कि नफ़रत बड़े पैमाने पर फैल रही है जिसे रोके जाने की आवश्यकता है. 

"नफ़रत भरे भाषण लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक स्थिरता और शांति के लिए ख़तरा हैं. सोशल मीडिया, इंटरनेट और षड़यंत्र की कहानियों के ज़रिए ऐसी बातें जंगल में आग की तरह फैल जाती हैं.  महिलाओं, अल्पसंख्यकों, प्रवासियों और शरणार्थियों को कंलकित करने वाली सार्वजनिक बहसों में इन्हें उकसावा मिलता है. निश्चित रूप से नफ़रत अब मुख्यधारा का हिस्सा बन रही है. उदार लोकतंंत्र और अधिकारवादी , दोनों तरह की व्यवस्थाओं में,"

इससे निपटने के लिए यूएन प्रमुख ने नफ़रत भरे भाषणों से व्यापक ढंग से निपटने के लिए एक नई रणनीति की घोषणा की है जो उनकी वैश्विक कार्ययोजना का हिस्सा है. उन्होंने कहा है कि प्रवासियों और शरणार्थियों को अपराध और आतंकवाद का ज़िम्मेदार ठहरा कर जिस तरह से राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिश की जाती है उसे देखते हुए यह पहल आवश्यक है. 

संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष मारिया फ़र्नान्डा एस्पिनोसा ने भी अपने संबोधन में दुनिया भर में हो रहे संघर्षों और फैली अस्थिरता पर चिंता जताई. "राजनीतिक संकट, युद्ध, परादेशीय संगठित अपराध, सामाजिक बहिष्कार और न्याय तक पहुंच  न होना, ये सब स्पष्ट ख़तरे हैं जिनसे मानवाधिकार परिषद और मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को निपटना  होगा."

उन्होंने ध्यान दिलाया कि साधन-संपन्न लोगों और वंचित तबके में दूरी लगातार बढ़ती जा रही है. "मानवाधिकार एजेंडा के लिए सबसे संवेदनशील चुनौती असमानता है. धन-दौलत का केंद्रीयकरण इतना बढ़ गया है कि 2018 में सिर्फ़ 26 लोगों के पास मिलाकर दुनिया में सबसे ग़रीब 380 करोड़ लोगों से अधिक धन था."

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशलेट ने अपने संबोधन में जलवायु परिवर्तन से उपजती चुनौतियों को नज़रअंदाज़ करने के ख़तरों के प्रति आगाह किया. 

"किसी देश के हित ऐसी नीतियों से कैसे आगे बढ़ सकते हैं जिनसे सभी लोगों के कल्याण को हानि पहुंचती हो. यह बात जलवायु परिवर्तन के लिए भी सच है; आपने वह कहावत सुनी होगी कि अगर आपको लगता है कि पर्यावरण से ज़्यादा आर्थिक हित अहम हैं तो फिर अपनी सांस रोककर पैसे गिनिए."

 

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