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राष्ट्रीयता क़ानूनों में महिलाओं के साथ भेदभाव, लैंगिक समानता के लिए चुनौती

विश्व भर में महिलाओं व लड़कियों को लिंग-आधारित हिंसा का सामना करना पड़ता है.
© IOM 2021/Lauriane Wolfe
विश्व भर में महिलाओं व लड़कियों को लिंग-आधारित हिंसा का सामना करना पड़ता है.

राष्ट्रीयता क़ानूनों में महिलाओं के साथ भेदभाव, लैंगिक समानता के लिए चुनौती

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र की एक स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने क्षोभ प्रकट किया है कि विश्व के लगभग 50 देशों में अब भी ऐसे राष्ट्रीयता क़ानून मौजूद हैं, जिनके तहत महिलाओं व लड़कियों के साथ लैंगिक आधार पर भेदभाव किया जाता है. इसके मद्देनज़र, उन्होंने ऐसे क़ानूनों के प्रावधानों में संशोधन किए जाने पर बल दिया है.

महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध हिंसा पर यूएन की विशेष रैपोर्टेयर रीम अलसालेम ने यूएन महासभा में मंगलवार को अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है. उन्होंने बताया कि 24 देशों में महिलाओं के पास, पुरुषों के साथ समानता के आधार पर अपनी राष्ट्रीयता अपने बच्चों को प्रदान करने का अधिकार नहीं है. 

यूएन विशेषज्ञ के अनुसार राष्ट्रीयता क़ानूनों में यौन और लिंग-आधारित भेदभाव, राष्ट्रविहीनता की एक बड़ी वजह है और दोनों एक दूसरे को बढ़ावा देते हैं.

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इन भेदभावपूर्ण क़ानूनों में अनेक प्रावधान हैं, जैसेकि जन्म पंजीकरण व बच्चों को राष्ट्रीयता प्रदान करने की प्रक्रिया में बाधाओं से जूझना; मानवाधिकार हनन के लिए जोखिम का बढ़ना और दुर्व्यवहारपूर्ण सम्बन्धों में रहने के लिए मजबूर होना.

इसके अलावा, अति आवश्यक सेवाओं की सुलभता में अवरोध, बच्चों को अपने पास रखने के अधिकार की जटिल प्रक्रिया, और समाज में सीमित भागीदारी व संरक्षण समेत अन्य समस्याएँ हैं.   

अधिकांश राष्ट्रविहीन लोगों को क़ानूनी दर्जा प्राप्त नहीं होता, उन्हें देशनिकाला दे दिया जा सकता है या फिर उन पर जुर्माना लग सकता है. वे राजनैतिक और आर्थिक रूप से वंचित रहने के लिए मजबूर होते हैं, उनके साथ भेदभाव होता है और बुनियादी सेवाओं तक उनकी पहुँच चुनौतीपूर्ण होती है.

भेदभावपूर्ण तौर-तरीक़े

रीम अलसालेम ने कहा कि लैंगिक दृष्टि से महिलाओं व लड़कियों पर होने वाले इन प्रभावों का अभी पूर्ण रूप से आकलन नहीं किया गया है. 

“राष्ट्रविहीनता और लैंगिक रूप से भेदभावपूर्ण राष्ट्रीयता क़ानून, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के समान हैं, जिससे मानवाधिकारों की विफलता के लिए एक घातक चक्र पनपता है.”

विशेष रैपोर्टेयर की यह रिपोर्ट बताती है कि लैंगिक रूप से भेदभावपूर्ण राष्ट्रीयता क़ानून व राष्ट्रहीनता, दोनों की साझा बुनियादी वजहें हो सकते हैं.

उदाहरणस्वरूप, पितृसत्तात्मक मूल्य, जनसांख्यिकी नियंत्रण का दबाव, अल्पसंख्यक महिलाओं के साथ भेदभाव, और जन्म पंजीकरण प्रक्रिया में प्रशासनिक मुश्किलें. 

अन्तरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मानवाधिकार सन्धियों ने महिलाओं के अधिकार को सुनिश्चित करने का प्रयास किया है, जिसके ज़रिये राष्ट्रीयता पाने, उसे बदलने या बनाए रखने का अधिकार, और अपनी राष्ट्रीयता बच्चों को प्रदान करने का अधिकार है.

मानवाधिकार सिद्धान्तों पर बल

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने सदस्य देशों से बुनियादी मानवाधिकारों के सिद्धान्तों और दायित्वों को बरक़रार रखने का आग्रह किया है. साथ ही, महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर सन्धि में प्रासंगिक अनुच्छेदों के प्रति संशय को दूर किया जाना होगा.  

रीम अलसालेम ने माना कि अनेक देशों व हितधारकों ने लैंगिक रूप से भेदभावपूर्ण राष्ट्रीयता क़ानून में बदलाव के लिए कोशिशें की हैं.

इससे राष्ट्रीविहीनता निर्धारण प्रक्रियाओं में समावेशन और सुलभता बेहतर हुई है, नागरिक पंजीकरण के लए व्यापक स्तर पर व्यवस्था को लागू किया गया है, और राष्ट्रीय आँकड़ों में राष्ट्रविहीनता के डेटा को जोड़ा गया है.

साथ ही, राष्ट्रीय क़ानूनों में सुधार लागू किए जाने, राष्ट्रविहीनता पर सन्धियों का हिस्सा बनने, राष्ट्रविहीन आबादी पर डेटा जुटाने, धार्मिक व सामुदायिक नेताओं के साथ साझेदारी में पैरोकारी मुहिम चलाने पर भी बल दिया गया है, ताकि नागरिकता के लिए कारगर रास्ते प्रदान किए जा सकें.

मानवाधिकार विशेषज्ञ

विशेष रैपोर्टेयर और स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ, संयुक्त राष्ट्र की विशेष मानवाधिकार प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं. 

उनकी नियुक्ति जिनीवा स्थिति यूएन मानवाधिकार परिषद, किसी ख़ास मानवाधिकार मुद्दे या किसी देश की स्थिति की जाँच करके रिपोर्ट सौंपने के लिये करती है. 

ये पद मानद होते हैं और मानवाधिकार विशेषज्ञों को उनके इस कामकाज के लिये, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन नहीं मिलता है.