वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के बावजूद जोख़िम बरक़रार

21 जनवरी 2019

संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के अनुसार 2019 और 2020 में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दर तीन प्रतिशत रहने का अनुमान है. रिपोर्ट दुनिया के कई देशों में मंडराते उन ख़तरों के प्रति भी आगाह करती है जो आर्थिक गतिविधियों को अस्त व्यस्त करने के साथ साथ दीर्घकालीन विकास की संभावनाओं को भी क्षति पहुंचा सकते हैं. 

विश्व आर्थिक स्थिति एवं संभावना 2019 (World Economic Situation and Prospects 2019) रिपोर्ट बताती है कि 2018 में वैश्विक विकास दर 3.1 रही. कई बड़ी अर्थव्यस्थाओं में विकास की रफ़्तार सुस्त रही लेकिन अमेरिका की तेज़ विकास दर ने वैश्विक दर को उबार लिया.

संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अर्थशास्त्री एलियट हैरिस ने संयुक्त राष्ट्र् समाचार को बताया, "तुलनात्मक रूप से हमें तेज़ विकास दर देखने को मिली है. लेकिन क्षितिज पर मंडराते ख़तरे भी हमें दिख रहे हैं. इस बात की संभावना भी बढ़ रही है कि इनमें से कुछ ख़तरे सही साबित भी हो सकते हैं." हैरिस का कहना  है कि व्यापार मतभेद के चलते वैश्विक व्यापार और रोज़गार पर असर पड़ रहा है. 

दुनिया के आधे से ज़्यादा देशों में 2017 और 2018 में आर्थिक विकास तेज़ी से हुआ और बहुत से देशों ने विकास दर की ऊपरी संभावनाओं को भी छू लिया. विकसित देशों में विकास दर 2.2 फ़ीसदी रही और कई विकसित देशों में बेरोज़गारी दर  ऐतिहासिक ढंग से नीचे गिर गई.

वहीं विकासशील देशों में तुलनात्मक रूप से पूर्वी एशिया (5.8 प्रतिशत) और दक्षिण एशिया (5.6 प्रतिशत) के देशों में अर्थव्यवस्था में मज़बूती बनी हुई है. तेल का निर्यात करने वाले देशों में भी अर्थव्यवस्था बेहतरी की ओर अग्रसर है लेकिन क़ीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव संबंधी मुश्किलेंं उनके सामने कायम हैं.

आर्थिक असंतुलन कायम

कई विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति आय में गिरावट देखी गई है और यह 2019 में भी जारी रहने की आशंका है. केंद्रीय, दक्षिणी और पश्चिमी अफ़्रीका के अलावा लातिन अमेरिका और पश्चिमी एशिया के देश विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं जहां दुनिया की एक-चौथाई आबादी बेहद ग़रीबी में जीवन यापन करती है.

प्रति व्यक्ति आय का बढ़ना कई बार चुनिंदा औद्योगिक क्षेत्रों में तेज़ी आने की भी वजह से होता है और ग्रामीण इलाक़ों में रह रहे लोग इससे वंचित रह जाते हैं. रिपोर्ट के अनुसार बेरोज़गारी दर में ऐतिहासिक कमी के बावजूद कम आय वाले लोगों ने अपनी आय में कोई बढ़त नहीं देखी है. 

दुनिया की आधे से ज़्यादा आबादी के पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है और उन्हें सिर्फ़ पेट भरने लायक ही काम मिल पाता है. इन असमानताओं के चलते ग़रीबी उन्मूलन और रोज़गार के बेहतर अवसर पैदा करना चुनौतीपूर्ण है.

सतही तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर मज़बूत दिखाई देती है लेकिन सतह के नीचे असंतुलन और जोख़िम बने हुए हैं.  मौद्रिक नीति में बदलाव या अन्य ग़लती नीतियों से  वित्तीय संकट उपजने का जोख़िम है वहीं जलवायु परिवर्तन भी विकासशील और लघुद्विपीय विकास देशों की अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचा सकता है. . 

व्यापार से जुड़े विवादों, वित्तीय दबावऔर भूराजनीतिक तनाव जैसे मुद्दे आर्थिक विकास पर प्रभाव डाल सकते हैं और टिकाऊ विकास से जुड़े कई अन्य लक्ष्यों को पाना ख़तरे में पड़ सकता है. अमेरिका और चीन के बीच ख़ास तौर पर व्यापार विवाद हाल के महीनों में देखने में आया है और अगर लंबे समय तक तनाव बना रहा तो विश्व व्यापार के लिए चुनौती पैदा कर सकता है. 

इससे निवेश में कमी आएगी, क़ीमतें बढ़ेंगी और व्यापार में भरोसा कम होगा. अमेरिका और चीन पर निर्भर और निर्यातक देशों की अर्थव्यवस्था ख़ास तौर पर संवेदनशील है.

चुनौतियों से कैसे निपटें

रिपोर्ट कहती है कि एक लचीले, उत्तरदायी और समावेशी तंत्र की दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता है लेकिन वैश्विक नीति तैयार करने और बहुपक्षवाद आधारित व्यवस्था को मज़बूत बनाने में चुनौतियां देखने को मिल रही हैं.  टैक्स मामलों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ साथ सभी देशों को राष्ट्रीय टैक्स नीतियों में भी ज़रूरी बदलाव लाने की ज़रूरत है.  वहीं पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी टिकाऊ विकास को पाने के लिए नीतियों में बदलाव लाया जाना चाहिए.  

बढ़ती असमानता से निपटने के लिए नई रोज़गार नीतियों जैसे न्यूनतम मेहनताना बढ़ाए जाने और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़रूरत पर बल दिया गया है. साथ ही परिवहन, कृषि और ऊर्जा में सरकारी निवेश के ज़रिए ग्रामीण क्षेत्रो में आधारभूत ढांचे को प्राथमिकता दिए जाने को रेखांकित किया गया है जिससे ग़रीबी उन्मूलन और शहर और गांवों में बढ़ती खाई को पाटने में मदद मिल सकती है. 

प्राकृतिक संसाधनों के ज़रिए होनी वाली कमाई के बेहतर प्रबंधन के लिए यह रिपोर्ट दूरदर्शी नीतियों को अपनाने की महत्ता बताती है. इसके तहत शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश, ज़रूरी आधारभूत ढांचे का निर्माण, और प्राकृतिक संसाधनों के अलावा विविध आर्थिक क्षेत्रों को विकसित किए जाने की पैरवी की गई है ताकि अर्थव्यवस्था को लचीला बनाया जा सके. 

 

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