राष्ट्रविहीनता के अन्त के लिये राजनैतिक इच्छाशक्ति पर ज़ोर

बांग्लादेश के कॉक्सेस बाज़ार के बालूखली शिविर में अपने बच्चे के साथ एक महिला.
UN Women/Allison Joyce
बांग्लादेश के कॉक्सेस बाज़ार के बालूखली शिविर में अपने बच्चे के साथ एक महिला.

राष्ट्रविहीनता के अन्त के लिये राजनैतिक इच्छाशक्ति पर ज़ोर

प्रवासी और शरणार्थी

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने विश्व नेताओं से वर्ष 2024 तक राष्ट्रविहीनता के उन्मूलन के लिये निडर और तत्पर प्रयासों की पुकार लगाई है. हाल के वर्षों में राष्ट्रविहीन लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिये उल्लेखनीय प्रयास किये गये हैं लेकिन कोरोनावायरस संकट काल में उनके लिये चुनौतियाँ और भी गहरी हुई हैं.  

वर्ष 2024 तक राष्ट्रविहीनता के अन्त के लिये शुरू की गई #IBelong मुहिम की छठी वर्षगाँठ पर उच्चायुक्त फ़िलिपो ग्रैण्डी ने ध्यान दिलाया कि 21वीं सदी में मानवता का तिरस्कार करने वाली इस चुनौती से निपटने के प्रयासों को दोगुना करना होगा. 

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उन्होंने सचेत किया कि कोरोनावायरस महामारी के दौरान इस आवश्यकता को पूरा किया जाना और भी ज़्यादा अहम है. कोविड-19 महामारी से दुनिया भर में लाखों राष्ट्रविहीनों के लिये हालात बदतर हुए हैं. 

फ़िलिपो ग्रैण्डी ने कहा, “कोविड-19 महामारी ने दिखाया है कि समावेशन और राष्ट्रविहीनता के तत्काल निपटारे की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है.”

“एक महामारी नागरिकों और ग़ैर-नागरिकों में भेद नहीं करती है. यह किसी भी देश, समाज और समुदाय के हित में नहीं है कि लोगों को राष्ट्रविहीन छोड़ा जाये और वे समाज में हाशिये पर रहते रहें.”

राष्ट्रविहीन जनसमूहों की संख्या के सम्बन्ध में वैश्विक आँकड़ों को जुटा पाना मुश्किल है क्योंकि आम तौर पर राष्ट्रीय जनगणना में उन्हें शामिल नहीं किया जाता है.  

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के अनुमान दर्शाते हैं 76 देशों में लगभग 42 लाख लोग राष्ट्रविहीन के तौर पर रह रहे हैं लेकिन उनकी वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है. 

मुद्दे का निपटारा आसान

यूएन शरणार्थी एजेंसी के मुताबिक राष्ट्रविहीनता के मुद्दे को आसानी से सुलझाया जा सकता है और इसकी रोकथाम भी सम्भव है. 

“एक व्यक्ति के दर्जे और जीवन को बदलने के लिये यह राजनैतिक इच्छाशक्ति से जुड़ा मामला है, इसके बावजूद कार्रवाई के अभाव का दुष्परिणाम महामारी के दौरान जीवन के लिये ख़तरे का कारण बन सकता है.”

“ज़िंदगियों की रक्षा करने और उन्हें बचाने के लिये, हम सरकारों से राष्ट्रविहीनता को सुलझाने और किसी को भी पीछे ना छूटने देने का आग्रह करते हैं.”

वर्ष 2014 में शुरू हुई #IBelong मुहिम का लक्ष्य 10 सालों में राष्ट्रविहीनता का अन्त करना है. इसके तहत राष्ट्रविहीनों की शिनाख़्त और उनकी रक्षा, राष्ट्रविहीनता के मौजूदा मामलों का निपटारा और नए मामलों की रोकथाम करने के प्रयास किये जा रहे हैं. 

यह मुहिम टिकाऊ विकास के 2030 एजेण्डा से भी जुड़ी है – टिकाऊ विकास के 16वें लक्ष्य के तहत नौवें उद्देश्य में सभी के लिये जन्म पंजीकरण सहित क़ानूनी पहचान सुनिश्चित करने की बात कही गई है. 

नवम्बर 2014 में शुरू की गई मुहिम के बाद दुनिया भर में राष्ट्रविहीनता से निपटने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है. 

लेकिन कोविड-19 महामारी ने उनकी दिक्कतों और राष्ट्रविहीनों द्वारा झेली जाने वाली अन्यायपूर्ण परिस्थितियों को और विकट बना दिया है. 

कठिनाइयों भरा जीवन

राष्ट्रविहीन होने की वजह से उनके पास क़ानूनी अधिकारों का अभाव है और अक्सर बुनियादी सेवाओं तक पहुँचना चुनौतियाँ भरा है.

इस वजह से वे राजनैतिक और आर्थिक रूप से वंचित रहने के लिए मजबूर होते हैं, उनके साथ भेदभाव होता है और उन्हें शोषण व उत्पीड़न का भी जोखिम झेलना पड़ता है.

अनेक देशों में उन्हें राष्ट्रविहीन शरणार्थी के तौर पर रहने के लिये मजबूर होना पड़ता है, वे बेहद ख़राब परिस्थितियों में रहते हैं जहाँ साफ़-सफ़ाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती है और बीमारियों के फैलने का जोखिम रहता है. 

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यूएन एजेंसी के प्रमुख ने आगाह किया कि नागरिकता के अभाव में अनेक राष्ट्रविहीनों के पास बुनियादी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक संरक्षा योजनाओं तक पहुँच नहीं है. इन वजहों से महामारी के दौरान उनके लिये जीवन बेहद मुश्किल साबित हो रहा है.

हालांकि कुछ देशों की सरकारों ने नेतृत्व का परिचय देते हुए कोविड-19 पर जवाबी कार्रवाई में राष्ट्रविहीनों पर ध्यान दिया है और उनकी परीक्षणों, उपचार, भोजन, कपड़ों और मास्क तक पहुँच सुनिश्चित की गई है. 

अन्य देशों ने जन्म पंजीकरण और अन्य प्रकार के नागरिक दस्तावेज़ सम्बन्धी सेवाओं को अतिआवश्यक सेवाओं के रूप में जारी रखा है जिससे राष्ट्रविहीनता के नए मामलों की रोकथाम करने के प्रयास किये जा रहे हैं.