हर तीन में से एक महिला है शारीरिक व यौन हिंसा का शिकार

24 नवंबर 2019

विश्व में महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा व्यापक रूप से व्याप्त है और यह मानवाधिकार उल्लंघन के सबसे भयानक रूपों में से एक है. लैंगिक असमानता, शर्मिंदगी और सज़ा के प्रति भय ना होने की वजह से अक्सर ऐसे मामलों का पता भी नहीं चल पाता है जो एक बड़ी चुनौती है. संयुक्त राष्ट्र सोमवार को 'महिलाओं के प्रति हिंसा के उन्मूलन के अंतरराष्ट्रीय दिवस' पर इसी समस्या को जड़ से उखाड़ने की पुकार लगा रहा है.

महिलाओं के प्रति हिंसा के आंकड़े इस विषय में एक कटु वास्तविकता को बयान करते हैं: क़रीब 33 फ़ीसदी महिलाओं व लड़कियों को जीवन में शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है और विश्व भर में पचास फ़ीसदी से ज़्यादा महिलाओं की हत्या उनके संगी-साथी या परिजन करते हैं.

यूएन प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने इस दिवस पर जारी अपने संदेश में कहा है कि इस मुद्दे की व्यापकता दर्शाती है कि “आपके आस-पास कोई पारिवारिक सदस्य, सहयोगी, मित्र या आपने ख़ुद” इस प्रकार के दुर्व्यवहार का अनुभव किया है.

“महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा के मूल में सदियों से चला आ रहा पुरुषों का दबदबा है.” उन्होंने ध्यान दिलाया कि कलंक, ग़लत धारणाएं, मामलों के पूरी तरह सामने ना आने और क़ानूनों को सही ढंग से लागू ना किए जाने के कारण बलात्कार के दोषियों को सज़ा का डर नहीं होता.

उन्होंने ज़ोरदार ढंग से कहा कि इस सब को अब बदलना होगा.

महिलाओं के प्रति हिंसा के उन्मूलन के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर संयुक्त राष्ट्र महिलाओं की शारीरिक, यौन और मनोवैज्ञानिक पीड़ा के स्वरूपों और उसके विनाशकारी नतीजों के प्रति जागरूकता फैलाने के प्रयास कर रहा है.

  • अंतरग साथी द्वारा हिंसा
  • यौन हिंसा व उत्पीड़न
  • मानव तस्करी (दासता, यौन शोषण)
  • महिला जननांग विकृति
  • बाल विवाह
UNICEF/UN028161/Zehbrauskas
संगठित अपराध, हिंसक घटनाओं में होने वाली मौतों की एक बड़ी वजह है.

सोमवार से अगले दो वर्षों के लिए यूएन महासचिव की ‘यूनाईट’ (UNiTe) मुहिम के ज़रिए बलात्कार की समस्या पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया जाएगा.

ये पहल वर्ष 2008 में शुरू की गई थी जिसके ज़रिए सार्वजनिक रूप से जागरूकता फैलाने के अलावा महिलाओं व लड़कियों के प्रति हिंसा की रोकथाम के लिए आवश्यक नीतियों व संसाधनों को सुनिश्चित कराने पर बल दिया जाता है.

यूएन महिला संस्था की कार्यकारी निदेशक पुमज़िले म्लाम्बो-न्गुका ने इस संबंध में अपनी चिंता प्रकट करते हुए कहा कि इस ख़ौफ़नाक कृत्य का अंत कर पाना “हिंसक संघर्ष के शस्त्रागार से युद्ध के एक मुख्य औज़ार के उन्मूलन” जैसा होगा.

“बलात्कार कोई एकाकी संक्षिप्त कृत्य नहीं है. यह जिस्म को नुक़सान पहुंचाता है और स्मृति में गूंजता है. यह जीवन को बदल देने वाले और ना चाहने वाले, गर्भवास्था या किसी संक्रामक बीमारी के होने, जैसे नतीजे सामने ला सकता है.”

उनके मुताबिक़ इसके दुष्परिणाम लंबे समय तक झेलने के लिए मजबूर होना पड़ता है और इससे परिवार के अन्य सदस्यों, जीवनसाथी, सहयोगियों व मित्रों पर भी प्रभाव पड़ता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का शोध दर्शाता है कि हिंसा का महिलाओं के शारीरिक, यौन, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य पर हानिकारक असर होता है.

जो महिलाएं शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होती हैं, उनके गर्भपात कराने की संभावना दोगुनी होती है और मानसिक अवसाद का मरीज़ होने की आशंका भी बढ़ जाती है.

कुछ क्षेत्रों में उन्हें एचआईवी संक्रमण का डेढ़ गुना ख़तरा होता है और यौन हिंसा का शिकार महिलाओं में शराब की लत होने की भी संभावना ज़्यादा होती है.

 

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