'लोकतंत्र के लिए ज़हर' है यहूदीवाद-विरोध, शिक्षा में निवेश की अपील

18 अक्टूबर 2019

धर्म या आस्था की आज़ादी पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर अहमद शहीद ने कहा है कि यहूदीवाद-विरोध लोकतंत्र के लिए ज़हरीला है और अगर उससे नहीं निपटा गया तो यह सभी समाजों के लिए एक बड़ा ख़तरा बन जाएगा. न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने शिक्षा में ज़्यादा निवेश किए जाने की अपील भी की ताकि बढ़ते भेदभाव और नफ़रत की रोकथाम हो सके.

यूएन के विशेष रैपोर्टेयर ने बढ़ते यहूदीवाद-विरोध पर अपनी रिपोर्ट गुरुवार को यूएन महासभा में पेश की थी जिसके बाद शुक्रवार को उन्होंने एक पैनल डिस्कशन में हिस्सा लिया.

उन्होंने कहा कि दक्षिणपंथी और वामपंथी विचारधाराओं में यहूदीवाद-विरोध बढ़ रहा है. श्वेत वर्चस्ववादी ताक़तें, नवनात्ज़ी, कट्टरपंथी इस्लामवादी संगठन यहूदियों के ख़िलाफ़ भेदभाव, दुश्मनी और हिंसा भड़काने में लगे हैं.

विशेष रैपोर्टेयर ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि दूसरे विश्व युद्ध में यहूदियों के ख़िलाफ़ हॉलोकॉस्ट एक ऐसा उदाहरण है जो दर्शाता है कि धार्मिक और नस्लीय नफ़रत से समाज कैसे तबाह हो सकते हैं.

इसके बावजूद दुनिया भर में यहूदीवाद-विरोध की घटनाओं में बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है और पीड़ितों को भेदभाव, हिंसा व दुश्मनी के भाव का सामना करना पड़ रहा है.

इस समस्या को इंटरनेट पर ज़्यादा हवा मिल रही है और ऑनलाइन व सोशल मीडिया माध्यमों पर नफ़रत भरी बोली व भाषणों को जगह मिल रही है.

उन्होंने देशों से अनुरोध किया कि इस समस्या का सामना करने के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण में सभी स्तरों पर निवेश बेहद आवश्यक है ताकि यहूदीवाद-विरोध के प्रति बेहतर समझ विकसित हो सके.

“इन मुद्दों से निपटने और भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने में शिक्षा एक अहम कारक है.”

शुक्रवार को यूएन पैनल डिस्कशन में अहमद शहीद ने युवा पीढ़ी के साथ संवाद की अहमियत पर बल दिया ताकि उन्हें यहूदीवाद-विरोध को ख़ारिज करने के लिए तैयार किया जा सके.

इसके लिए वैश्विक गठबंधन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है जिसमें शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

उन्होंने कहा कि यह मानवाधिकार से जुड़ा मुद्दा है जो विविध प्रकार के अधिकारों पर असर डालता है जिसमें जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है.

इसे व्यापक रूप से फैलाने में कई बड़े नेता और समाज के कई तबके शामिल हैं जो चिंता का विषय है.

विशेष रैपोर्टेयर ने अपनी अपील में कहा कि यहूदीवाद-विरोध को मानवाधिकार फ़्रेमवर्क के व्यापक दायरे में रखा जाना चाहिए ताकि लोगों की समझ विकसित हो और वे यहूदीवाद-विरोध सहित अन्य चरमपंथी विचारधाराओं को ख़ारिज कर सकें.

उन्होंने कहा कि धर्म या आस्था आधारित भेदभाव, हिंसा और दुश्मनी को बढ़ावा दिए जाने को ग़ैरक़ानूनी बना दिया जाना चाहिए.

देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन क़ानूनों का सख़्ती से पालन हो. साथ ही नागरिक समाज के सदस्यों का दायित्व है कि वे इसमें भूमिका निभाएं और सामाजिक मेलजोल को आगे बढ़ाने के लिए पंथ आधारित नेटवर्क को प्रोत्साहन मिले.

यूएन न्यूज़ के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि यहूदीवाद-विरोध से निपटने में देश निवेश कर रहे हैं जो सुखद है.

उन्होंने माना कि ऑनलाइन माध्यमों पर नफ़रत से निपटने में दुनिया संघर्ष कर रही है लेकिन कुछ तकनीकी समाधानों से इसमें मदद मिल रही है.

“यह समझ बढ़ रही है कि नफ़रत सभी समाजों को कमज़ोर बनाती है और कार्रवाई के प्रति जागरूकता का एहसास भी है, और सही कार्रवाई की दिशा में यही पहला क़दम है.”

 

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