तकनीक ने दिया टीकाकरण अभियान को सहारा

13 मई 2019

हाल के सालों में भारत ने पांच साल से कम उम्र के बच्चों की होने वाली मौतों को रोकने के लिए व्यापक प्रयास किए हैं जिनमें सफलता भी मिली है. इसके पीछे दो कारण हैं: समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों की बड़ी संख्या जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं, और तकनीक का रणनीतिक ढंग से इस्तेमाल.

भारत में हर साल 2.7 करोड़ बच्चों का जन्म होता है जो किसी अन्य देश की तुलना में सबसे बड़ी संख्या है.

बच्चों के स्वास्थ्य का ख़्याल रखना और बचाव के लिए टीके लगाना भारत जैसे बड़े और विविध और विस्तृत भूभाग समेटे देश में एक बड़ी चुनौती है. समय पर सही और वास्तविक जानकारी मिलना बेहद अहम है.

हर बच्चे तक पहुंचने के लिए, भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने यूएन विकास कार्यक्रम (UNDP) और वैक्सीन एलायंस (GAVI) की साझेदारी में इलेक्ट्रॉनिक वैक्सीन इंटेलीजेंस नेटवर्क या eVIN को विकसित किया है.

यह एक स्मार्ट वैक्सीन लॉजिस्टिक सिस्टम है जो टीकों के भंडारण और तापमान की निगरानी करने और जानकारी प्रदान करने में मदद करती है. यह एक मोबाइल, क्लाउड-बेसड एप्लीकेशन है जिसकी सहायता से टीकाकरण के बाद स्वास्थकर्मी अपने वैक्सीन स्टॉक से संबंधित जानकारी हासिल कर सकते हैं.

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय हेल्थ मिशन के जनरल मैनेजर डॉ वेद प्रकाश ने बताया कि इस कार्यक्रम के ज़रिए मौजूदा प्रणालियों की ख़ामियों को काफ़ी हद तक सुलझाने में मदद मिली है.

“टीकों की बर्बादी बहुत ज़्यादा थी, और eVIN के पूरे राज्य में शुरू होने से स्टॉक को बनाए रखने का काम संभव और बहुत आसान हो गया है. जब भी ज़रूरत हो, हम वैक्सीन को एक जगह से दूसरे जगह भी ले जा सकते हैं. इसलिए रोज़मर्रा के टीकाकरण में इसने हमारी मदद की है और यह बहुत सफल भी रहा है. अब इसे देश के अन्य प्रदेशों में भी शुरू किया जा रहा है.”

टीकाकरण टीमों में सैकड़ों लोग काम करते हैं जिनमें कोल्ड चेन कर्मचारी, टीके लगाने वाले स्वास्थ्यकर्मी भी शामिल हैं. eVIN को शुरू करने से पहले उन्हें ज़रूरी प्रशिक्षण दिया गया था इसलिए तकनीक के इस्तेमाल में उन्हें मुश्किलें नहीं महसूस होती.

वैक्सीन के रखरखाव के काम में जुटे कर्मचारियों का काम डिजिटल रिकॉर्ड रखने से आसान हो गया है और ज़िम्मेदारियों को समझने में मदद मिली है. 50 फ़ीसदी से ज़्यादा स्वास्थकर्मी महिलाएं हैं जिन्होंने पहले तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया है लेकिन eVIN को उन्होंने उत्साह और कुशलता से अपनाया है.

बितोला देवी एक स्वास्थ्यकर्मी हैं जो पिछले 30 साल से पोलियो, टीबी, और मलेरिया से बचाव के टीके लगाने के काम में जुटी हैं. आगे भी काम जारी रखने के लिए अब वह तकनीक का इस्तेमाल करना सीख रही हैं.

“टीके लगने के बाद हम एक शीट तैयार करते हैं और वहां से कंप्यूटर में जानकारी भेजते हैं. मुझे इससे बहुत ख़ुशी मिलती है और मेरे बच्चे गर्व से कहते हैं कि हमारी मां कंप्यूटर में डाटा भर सकती है.”

वैक्सीन एंड लॉजिस्टिक्स यूटीलाइज़ेशन इवैलुएटर (VALUE), eVIN का ही मिलता जुलता रूप है और वैक्सीन रिकॉर्ड के डिजिटाइज़ेशन के काम में वैसे ही टूल्स की मदद करता है. इससे टीके संबंधी आंकड़े एकत्र कर उनकी रिपोर्टिंग और निगरानी करने में मदद मिलती है.

इसकी शुरुआत 2017 में राजस्थान के दो ज़िलो में हुई और अब तक इसका विस्तार उत्तर प्रदेश के छह ज़िलो में हो चुका है.

VALUE के इस्तेमाल से स्वास्थ्यकर्मी टीकाकरण सत्रों के दौरान लगाए गए कुल टीकों की सही संख्या को रिकॉर्ड कर सकती हैं. इसके ज़रिए भारत सरकार के महत्वाकांक्षी सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूनिवर्सल इम्यूनाइज़ेशन प्रोग्राम) की प्रगति पर नज़र रखने के काम में भी मदद मिलती है.

eVIN से जुटाए गए आंकड़ों के साथ इन जीवनरक्षक टीकों के इस्तेमाल की निगरानी करने, बर्बादी को रोकने और उनकी क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलती है.

यह लेख पहले यहां प्रकाशित हुआ.

 

 

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