सांस्कृतिक विरासत की पहचान है मातृभाषा

21 फ़रवरी 2019

हर दो हफ़्ते में दुनिया में एक भाषा विलुप्त हो जाती है, और उसके साथ ही उससे जुड़ा मानवीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत भी खो जाती है.  21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर भाषाई विविधता को सम्मान देते हुए मूल निवासियों की भाषाओं को संरक्षित रखने की अहमियत के प्रति जागरूकता बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं. 

इस दिवस का मूल 21 फ़रवरी 1952 में है जब ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने तत्कालीन सरकार के उस आदेश का विरोध किया जिसमें सिर्फ़ उर्दू को ही राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया गया था. उस समय बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था. इस घोषणा से फैले असंतोष के बाद व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए जिसके बाद 1956 में बांग्ला को भी आधिकारिक दर्जा दे दिया गया. 

1999 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन  (UNESCO) में बांग्लादेश के प्रयासों के बाद ही अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की शुरुआत हुई थी. संयुक्त राष्ट्र में बांग्लादेश के स्थायी प्रतिनिधि मसूद बिन मोमेन ने यूएन समाचार से बातचीत में कहा,  "हमें अपनी विरासत, संस्कृति और अस्तित्व को बचा कर रखना है. "

"इस दिवस का प्रसार करना बांग्ला राष्ट्रवाद का हिस्सा है ताकि हम अपनी भाषा को संरक्षित रख सके और दुनिया भर में ऐसे अन्य संघर्षों का भी बचाव हो सके." उन्होंने कहा कि मातृभाषा दिवस बहुभाषावाद की अहमियत को बताते हुए सहिष्णुता, शांति और सदभाव की संस्कृति का प्रसार करता है जहां विविधता की शक्ति को पहचाना जाता है. 

मातृभाषा को पहचान मिलना आवश्यक

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन की महानिदेशक (यूनेस्को) की महानिदेशक ऑड्री अज़ोले  ने अपने संदेश में कहा कि सभी मातृभाषाएं अहम हैं और शांति और टिकाऊ विकास को सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी हैं.  

"स्कूलों में शुरुआती सालों में साक्षरता, बुनियादी लिखाई पढ़ाई और हिसाब सीखने के लिए के लिए मातृभाषा बेहद आवश्यक है. इसी से निजी विकास की नींव तैयार होती है. साथ ही मातृभाषा सृजनात्मक विविधता और पहचान की अभिव्यक्ति है और ज्ञान और नवप्रवर्तन का स्रोत है." 

"यूनेस्को का मानना है कि हर मातृभाषा को पहचान मिलनी चाहिए और सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों में उसका विशिष्ट हिस्सा होना चाहिए. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता है."

अज़ोले ने ध्यान दिलाया कि मातृभाषाओं को हमेशा राष्ट्रीय या आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त नहीं होता. इस वजह से मातृभाषाओं की अहमियत धीरे धीम कम हो सकती है और दीर्घकाल में विलुप्त  भी हो सकती हैं. 

दुनिया भर में मूल निवासियों के समुदायों ने उनकी मूल भाषाओं में शिक्षा की इच्छा प्रकट की है और इसी संदर्भ में 2019 में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की विषय वस्तु "विकास, शांति निर्माण और मेलजोल के लिए मूल भाषाएं अहम"  है.

विश्व में मूल निवासियों की कुल संक्या लगभग 37 करोड़ है और दुनिया भर में प्रचलित सात हज़ार भाषाओं में अधिकतर उन्हीं समुदायों की है. माना जाता है कि 40 प्रतिशत से ज़्यादा भाषाओं के विलुप्त होने का ख़तरा है. चुनिंदा भाषाओं को ही शिक्षा प्रणाली में और सार्वजनिक स्तर पर जगह मिलती है और महज़ 100 से कम भाषाएं डिजिटल दुनिया में इस्तेमाल लाई जाती हैं. 

शुरुआती पढ़ाई लिखाई मातृभाषा में होने के साथन हमेशा उपलब्ध नहीं होते. यूनेस्को के मुताबिक़ दुनिया में 40 फ़ीसदी जनसंख्या के पास ऐसी भाषा में शिक्षा ग्रहण करना संभव नहीं है जो वे बोलते या समझते हैं. कई अध्ययनों में यह बात सामने आ चुकी है कि मातृभाषा पर पकड़ अन्य विषयों को सीखने में सहायक सिद्ध होती है. 

टिकाऊ विकास का चौथा लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर केंद्रित है. साथ ही टिकाऊ विकास लक्ष्यों का मुख्य उद्देश्य किसी को भी पीछे न छूटने देना है. इसी पृष्ठभूमि में यूनेस्को महानिदेशक ने सभी सदस्य देशों, साझेदार संगठनों और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों से मूल निवासियों के अधिकारों को पहचानने और उन्हें सुनिश्चित करने की अपील की है. 

 

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