बढ़ती असमानता पर केंद्रित है श्रम संगठन का मिशन

9 जनवरी 2019

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना के शताब्दी वर्ष के अवसर पर (ILO) महानिदेशक गाए रायडर ने कहा है कि असमानता से निपटने के लिए सदस्य देशों की ओर से हो रहे प्रयासों में संगठन अपना योगदान देता रहेगा. संगठन के कामकाज के प्रचार-प्रसार के लिए एक मुहिम भी शुरू की गई है. 

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की स्थापना पहले विश्व युद्ध के बाद 44 देशों ने मिल कर की थी जिसका उद्देश्य यूरोप में कार्यस्थलों में पनपते ख़राब माहौल और श्रमिकों की बदतर होती स्थिति से उपज रहे असंतोष से निपटना था. 

आज 187 देश संगठन के सदस्य हैं जो साझा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मिल कर काम कर रहे हैं. रायडर ने कहा कि आधनिक तकनीक के आगमन से दुनिया के कई देशों में कामकाज का तरीक़ा पूरी तरह से बदल चुका है लेकिन उन्होंने आगाह भी किया कि अब भी बहुत से लोग इसके लाभ से वंचित हैं. 

"आशा और भय असमान रूप से फैले हुए हैं. अनिश्चतितता बढ़ी है और विश्वास का स्तर बेहद कम हो गया है. और यही हमें बताता है कि संगठन का शताब्दी वर्ष अहम क्यों है. यह हम सब के लिए मायने रखता है फिर चाहे हम किसी भी देश में रहते हों."

दिन में काम के घंटे, वाजिब वेतन का सिद्धांत और घायलों और बीमार कर्मचारियों की स्वास्थ्य सुरक्षा के अलावा कईं अन्य सामाजिक लाभ और कार्यस्थल पर अधिकार वैश्विक पटल पर श्रम संगठन के हस्तक्षेप के बाद ही तय हो पाए थे. 

दुनिया भर में श्रमिकों के लिए बेहतर क़ानूनों और मानदंडों को स्थापित करने के लिए किए जाने वाले प्रयास प्रतीकात्मक तौर पर श्रम संगठन के पुराने मुख्यालय के मुख्य द्वार पर लगी उन तीन चाबियों में झलकते हैं जिसमें हर चाबी एक अलग साझेदार - सरकार, श्रमिक और नियोक्ता - को प्रदर्शित करती है. 

सामाजिक न्याय के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देने के प्रयासों में श्रम संगठन के योगदान को ध्यान दिलाते हुए रायडर ने कहा कि शुरुआत में संगठन के काम को वास्तविकता से दूर महज़ एक सपना माना गया था. 

1919 में आईएलओ के संविधान का मसौदा तय करने का काम एक श्रम आयोग को सौंपा गया था. इस आयोग का गठन पहले विश्व युद्ध के बाद वर्साय संधि में हिस्सा लेने वाले देशों ने किया.  संधि के अंतर्गत जर्मनी से युद्ध के बाद हर्जाना वसूला जाना था. 

आयोग ने माना था कि श्रमिकों की हालत सुधारने, कार्यस्थल पर वाजिब माहौल बनाने और अन्य अधिकार सुनिश्चित करने की सख़्त ज़रूरत है अन्यथा दुनिया में शांति और समरसता संकट में पड़ जाएगी. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय श्रम मानदंडो को तय कर उन्हें संधियों में जगह दी गई. 

 

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