वृद्धों पर यौन हमले सभ्य समाजों के माथे पर कलंक

14 जून 2019

वृद्धावस्था में अक्सर लोगों के साथ ख़राब बर्ताव होने के मामले तो पूरी दुनिया में सामने आते हैं मगर उनका यौन शोषण होने के मामले होते तो हैं लेकिन उनका अक्सर पता नहीं चलता. वृद्ध लोगों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए शनिवार, 15 जून को विश्व दिवस (World Elder Abuse Awareness Day) मनाया जा रहा है.

उम्रदराज़ लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करने वाली स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ रोसा कॉर्नफ़ैल्ड माटे ने ज़ोर देकर कहा है कि बुज़ुर्ग लोगों के साथ यौन दुराचार और बलात्कार के मामले भी होते हैं मगर ऐसे मामलों का अक्सर पता नहीं चलता, ना ही उनकी ख़बर एजेंसियों या अधिकारियों को दी जाती है.

रोसा कॉर्नफ़ैल्ड माटे ने गुरूवार को एक वक्तव्य जारी करके कहा, “उम्रदराज़ लोगों के साथ यौन दुर्व्यहार व बलात्कार एक ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में बात होते हुए नहीं देखा गया है, लेकिन फिर भी इसकी वास्तविकता से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता. ”

इस वक्तव्य में सभी का आहवान किया गया कि वृद्ध लोगों के साथ होने वाले यौन दुर्व्यहार व बलात्कार के मामलों का पता लगाने के लिए तेज़ नज़र रखें और रिपोर्ट करने से भी ना हिचकें.

उनका कहना था कि ऐसे मामले अक्सर नज़र नहीं आते हैं और उनके बारे में खुलकर बातचीत भी नहीं की जाती है. लेकिन जैसे-जैसे समाजों में उम्रदराज लोगों की संख्या बढ़ रही है, ये समस्या और ज़्यादा गंभीर होती जाएगी.

अगर बुज़ुर्ग लोगों के साथ होने वाले यौन दुर्व्यहार और बलात्कार के मामलों की सटीक जानकारी और आँकड़े नहीं जुटाए गए तो इस गंभीर समस्या की गहराई का पता नहीं चलेगा और पीड़ितों की सही मदद करना मुश्किल होगा.

मानवाधिकार विशेषज्ञ का कहना था कि उम्रदराज़ लोगों के साथ होने वाले यौन दुर्व्यहार और बलात्कार के मामलों को सही ढंग से समझने में ये धारणा अड़चन पैदा करती है कि ऐसे मामले अक्सर अनजान लोगों द्वारा होते हैं.

जबकि तकलीफ़देह बात ये है कि ऐसे मामलों में अक्सर परिवार के सदस्य, संबंधी या ऐसे अन्य लोग शामिल होते हैं जो उन उम्रदराज़ लोगों की देखभाल करने के काम में भरोसेमंद हैसियत रखते हैं.

जागरूकता व चौकसी ज़रूरी

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ रोसा कॉर्नफैल्ड माटे का कहना था कि उम्रदराज़ लोगों के बारे में अक्सर ये धारणा प्रचलित होती है कि वो यौन गतिविधियों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं जो स्थिति को और जटिल बनाती है.

इसके अलावा वृद्ध चूँकि दूसरों पर निर्भर होते हैं और उनकी वफ़ादारी अक्सर उनकी देखभाल करने वालों और स्थानीय निवासियों के बीच बँटी हुई होती है, इसलिए वो इस मामले में कोई ठोस क़दम उठाने से डरते हैं.

इस वजह से नर्सिंग होम्स में उम्रदराज़ लोगों के साथ होने वाले यौन दुर्व्यवहार व बलात्कार के मामलों को क़ानूनी एजेंसियों व अधिकारियों की नज़र में लाना मुश्किल साबित होता है.

निसंदेह उम्रदराज़ लोगों के साथ होने वाले यौन दुर्व्यवहार व बलात्कार के उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर परिणाम होते हैं, मगर फिर भी ऐसे मामलों को रोकने के प्रयास बिल्कुल भी पर्याप्त नहीं हैं.

मानविधिकार विशेषज्ञ ने उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर फ़ोरेंसिक और अन्य आपराधिक सबूत या भावनात्मक आवेश या फिर शर्म के अहसास की वजह से मिटा दिए जाते हैं.

ऐसे मामलों में अक्सर लोग पीड़ित वृद्धों को ढाँढस देने की प्रक्रिया में लग जाते हैं और पुलिस को सूचित करना भूल जाते हैं.

इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने सभी का आहवान करते हुए कहा कि अपनी चौकसी बढ़ाएँ और ख़ासतौर से वृद्ध लोगों के रोज़मर्रा के व्यवहार पर नज़र रखें.

यहाँ तक कि अगर वो भ्रम या डिमेंशिया (भूल जाने की स्थिति) में ही क्यों ना हों, तब भी अगर उनके साथ कुछ ग़लत होगा तो उसके कुछ लक्षण अवश्य नज़र आएंगे.

मानवाधिकार विशेषज्ञ का कहना था, “मुझे ये दोहराते हुए कहना है कि ऐसे मामलों को उजागर करने के लिए जागरूकता और चौकसी बहुत महत्वपूर्ण है.

उम्रदराज़ लोगो के सिर्फ़ संबंधियों या विश्वासपात्र लोगों को ही नहीं, बल्कि अस्पतालों और नर्सिंग होम्स के कर्मचारियों को भी उच्च दर्जे की चौकसी बरतनी होगी.

चिकित्सा देखभाल व सहायता मुहैया कराने की हैसियत से ये उनका कर्तव्य है कि किसी भी व्यक्ति के साथ हुए यौन दुर्व्यवहार की सूचना सही समय पर क़ानूनी एजेंसियों को दी जाए.”

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ रोसा कॉर्नफ़ैल्ड माटे का कहना था कि उम्रदराज़  लोगों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घटनाओं के बारे में सही समझ पैदा करना और सही समय पर उसकी सूचना क़ानूनी व जाँच एजेंसियों को देने के लिए लोगों को जागरूक बनाना, उन्हें प्रशिक्षित करना, आँकड़े एकत्र करना और सही तरीक़े से जाँच-पड़ताल सुनिश्चित करना ज़रूरी है.

इन सभी मिले-जुले प्रयासों के ज़रिए ही सभ्य समाजों के माथे पर मौजूद इस कलंक को मिटाया जा सकता है.

 

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