बुनियादी जल सेवाओं के अभाव में करोड़ों की जान ख़तरे में

3 अप्रैल 2019

दुनिया भर में दो अरब से ज़्यादा लोग गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना कर रहे हैं क्योंकि हर चार में से एक स्वास्थ्य केंद्र पर पानी की मूलभूत सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं. पानी और साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था के बग़ैर संक्रामक रोगों के फैलने का ख़तरा बढ़ जाता है. संयुक्त राष्ट्र ने प्रभावित देशों से इलाज योग्य संक्रमणों की रोकथाम के लिए समुचित प्रयास करने की अपील की है. 

जल, साफ-सफ़ाई और स्वच्छता संबंधी चुनौतियों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) द्वारा तैयार की गई ‘हेल्थ केयर फ़ैसिलिटज़’ रिपोर्ट अपनी तरह का पहला आंकलन है. रिपोर्ट बताती है कि हर पांच में से एक स्वास्थ्य केंद्र पर शौचालय की सुविधा नहीं है – इस समस्या से 1.5 अरब लोग प्रभावित हैं. रिपार्टो दर्शाती है कि वैश्विक आबादी का एक व्यापक हिस्सा मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित है.

स्वास्थ्य केंद्रों पर पानी की उपलब्धता न होने से मल-मूत्र की सही ढंग से सफ़ाई नहीं हो पाती जिससे मरीज़ों और स्वास्थ्य कर्मचारियों में भी संक्रमण फैलने का जोखिम बना रहता है. 

जल और साफ़-सफ़ाई पर विश्व स्वास्थ्य संगठन में समन्वयक के तौर पर कार्यरत डॉ ब्रूस गॉर्डन ने हाथ धोने की अहमियत पर बल दिया. “यह दस्त की बीमारी से जुड़ी बात नहीं है. किसी भी तरह का संक्रमण त्वचा पर आसानी से रह सकता है, और ज़ख्म होने पर शरीर में प्रवेश कर सकता है और बीमारी का कारण बन सकता है...इस संचारण को हाथ धोकर रोके जाने की आवश्यकता है.”

विश्व के निर्धनतम देशों में रह रहे लोगों के इन बीमारियों से संक्रमित होने का ख़तरा सबसे अधिक रहता है. इस गंभीर चुनौती से जूझते सबसे कम विकसित देशों में इसका सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा महिलाओं और नवजात शिशुओं को उठाना पड़ता है.

इन देशों में हर साल 1. 7 करोड़ महिलाएं ऐसे स्वास्थ्य केंद्रों पर बच्चों को जन्म देने के लिए मजबूर हैं जहां पानी, साफ-सफ़ाई और स्वच्छता की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है.

ग्रामीण इलाक़े सबसे अधिक प्रभावित

रिपोर्ट के अनुसार देशों के भीतर भी ख़तरनाक असमानताएं देखने को मिलती हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे समुदायों के पास अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं है जबकि शहरी समुदायों के पास ऐसी सेवाएं उपलब्ध हैं.

यूनिसेफ़ के वरिष्ठ सांख्यिकी और निगरानी विशेषज्ञ टॉम स्लेमेकर ने बताया, “बिना शौचालय वाले स्वास्थ्य सेवा केंद्रों पर लोग निर्भर रहने को मजबूर हैं. जो बीमार हैं उनके मल में रोगाणु मिलते हैं और शौचालयों न होने से स्वास्थ्य कर्मचारियों और महिलाओं और बच्चों सहित अन्य मरीज़ों के रोगग्रस्त होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है.”

दुनिया में हर 10 में से एक अस्पताल में शौचालय उपलब्ध नहीं हैं. वहीं छोटे स्वास्थ्य केंद्रों के लिए यह संख्या बढ़कर हर पांच में से एक केंद्र में शौचालय के न होने तक बढ़ जाती है. उन्होंने बताया कि आम तौर पर निजी क्लीनिकों और अस्पतालों की तुलना में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर कम स्तर की सेवा उपलब्ध होती है.

चलने फिरने से लाचार लोगों की ज़रूरतों का भी ख़्याल नहीं रखा जाता जिससे उनकी समस्याएं बढ़ जाती हैं. डॉ गॉर्डन का कहना है कि ज़्यादा से ज़्यादा देशों को जल और साफ-सफ़ाई संबंधी सुविधाओं में और निवेश करना होगा और इसके लिए राजनीतिक संकल्प अहम है.

यह रिपोर्ट भविष्य में हर दो साल में प्रकाशित की जाएगी जिसमें स्वास्थ्य केंद्रों पर जल की सुविधा और साफ़-सफ़ाई पर जानकारी के अलावा टिकाऊ विकास लक्ष्यों की दिशा में हुई प्रगति का भी मूल्यांकन किया जाएगा.

डॉ गॉर्डन ने आशा जताई है कि 2030 तक स्वास्थ्य केंद्रों पर बुनियादी सेवाएं उपलब्ध होंगी और 80 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों को मौजूदा समय से बेहतर सेवाएं मिल सकेंगी.

 

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