प्रवासी

कोविड-19: भारत में ‘लॉकडाउन’ से प्रवासी कामगारों पर भारी मार

भारत में कोविड-19 का मुक़ाबला करने के प्रयासों के तहत 24 मार्च को घोषित 21 दिन के लॉकडाउन ने प्रवासी मजदूरों और दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों की मुसीबतें बढ़ा दी हैं. दिहाड़ी पर काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूर लम्बे समय तक तालाबंदी रहने की आशंका में बड़ी संख्या में अपने-अपने गांवों और स्थानों को वापस लौट पड़े. करफ़्यू की स्थिति होने के बावजूद हजारों प्रवासी मज़दूर सड़कों पर आ गए और पैदल ही अपने स्थानों के लिए चल निकले.
 

यूएन महासचिव के रूप में पहली पाकिस्तान यात्रा

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इस हैसियत में अपनी पहली पाकिस्तान यात्रा के पहले दिन रविवार को अफ़ग़ान शरणार्थियों से मुलाक़ात की. उन्होंने जम्मू कश्मीर की स्थिति का शांतिपूर्ण हल निकाले जाने की ज़रूरत भी व्यक्त की.

मैक्सिको में फँसे प्रवासी बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की पुकार

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़ ने मैक्सिको सरकार को याद दिलाते हुए कहा है कि जो भी शरणार्थी बच्चे देश की सीमा में दाख़िल होते हैं उनके अधिकारों की रक्षा करना वहाँ के अधिकारियों की ज़िम्मेदारी है. 

'समाजों का अटूट हिस्सा हैं प्रवासी'

प्रवासी समाजों का अटूट हिस्सा हैं, वो आपसी समझ बढ़ाने और अपने रहने के स्थान व मूल स्थानों - दोनों ही जगह के टिकाऊ विकास में योगदान करते हैं.

सुरक्षित, व्यवस्थित और नियमित प्रवासन सभी के हित में है. प्रवासन मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर की प्राथमिकताएँ अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ज़रिए सर्वश्रेष्ठ तरीक़े से हासिल होती हैं.

सभी प्रवासियों को अपने सभी मानवाधिकारों की हिफ़ाज़त करने का बराबर अधिकार है.

ये सिद्धांत सुरक्षित, व्यवस्थित और नियमित प्रवासन के लिए तैयार किए गए ग्लोबल कॉम्पैक्ट में वर्णित हैं.

फिर भी, हमें प्रवासियों के बारे में ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं जो हानिकारक व झूठी होती हैं.

और हम अक्सर देखते हैं कि तथ्यों पर आधारित होने के बजाय डर के प्रभाव में बनाई गई नीतियों की वजह से प्रवासियों को असीम मुश्किलें उठानी पड़ती हैं.

इस अंतरराष्ट्रीय दिवस पर, मैं दुनिया भर में सभी नेताओं और आमजनों से आग्रह करता हूँ कि प्रवासियों के बारे में तैयार किए गए ग्लोबल कॉम्पैक्ट को लागू करें ताकि प्रवासन हम सभी के लिए कारगर साबित हो सके.

लीबिया में अब भी मानवाधिकार उल्लंघन, हिंसा और अत्याचारों का सिलसिला जारी

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने सुरक्षा परिषद को बताया है कि लीबिया में क़रीब एक दशक पहले जब से न्यायालय ने काम शुरू किया है तब से अभी तक हिंसा के दौर, अत्याचार और क़ानून की बेपरवाही का माहौल ज्यों का त्यों बना हुआ है. अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की मुख्य अभियोजक फ़तू बेनसूदा ने बुधवार को अपनी वार्षिक रिपोर्ट सुरक्षा परिषद में पेश करते हुए कहा कि “लीबिया में हिंसा में बढ़ोत्तरी हुई है.”

लीबिया: भूमध्य सागर में फँसे लोगों के लिए अहम यूरोपीय समझौता

संयुक्त राष्ट्र की दो प्रमुख एजेंसियों के अध्यक्षों ने लीबिया में शरणार्थियों और प्रवासियों को मनमाने तरीक़े से बंदी बनाए जाने पर तुरंत रोक लगाने का आहवान किया है. भूमध्य सागर के रास्ते बेहतर मंज़िल की तलाश में निकलने वाले लोगों को एक नई वितरण प्रणाली के ज़रिए सुरक्षित विकल्प मुहैया कराने के वास्ते यूरोपीय संघ के देशों के बीच हुए एक समझौते के बाद ये आहवान किया गया है.

प्रवासियों द्वारा भेजी रक़म से ग़रीबों को बड़ा सहारा

अपने घर, गाँव, शहर और देश छोड़कर रोज़ी रोटी कमाने के लिए निकलने वाले लोग दुनिया में जहाँ भी रहते हैं वहाँ से अपने मूल स्थानों में रहने वाले परिवारों व समुदायों को हर साल भारी रक़म भेजते हैं. प्रवासियों के इस योगदान को महत्व देने के लिये हर वर्ष 16 जून को अंतरराष्ट्रीय दिवस (International Day of Family Remittances) मनाया जाता है. 

असमानता से निपटे बिना बड़ी समस्याओं को सुलझाना कठिन

दुनिया में फैली असमानता, मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों का सबसे बड़ा कारण बनी हुई है लेकिन कई देशों ने इस समस्या पर लगाम कसने में उल्लेखनीय सफलता भी दर्ज की है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) मिशेल बाशलेट ने बुधवार को कहा कि महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में भी प्रगति हो रही है.

यूरोपीय नागरिकों की तुलना में विस्थापितों को बीमारियों का ख़तरा अधिक

सुरक्षित देश में शरण लेने के लिए लंबे सफ़र, ख़राब परिस्थितियों में रहने की मजबूरी और जीवनशैली में आए बदलाव से यूरोप में प्रवासियों और शरणार्थियों के स्वास्थ्य को ख़तरे की आशंका बढ़ जाती है. ये निष्कर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ओर से जारी एक नई रिपोर्ट में सामने आए हैं जिसमें पहली बार यूरोप पहुंचने वाले विस्थापितों के स्वास्थ्य से जुड़ी मुश्किलों को समझने का प्रयास किया गया है. 

मुश्किल समय में आशा की उजली किरण:यूएन महासचिव

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने नववर्ष की पूर्व संध्या पर अपने संदेश में कहा है कि दुनिया कई खतरों से जूझते हुए एक मुश्किल दौर से गुजर रही है .  पिछले साल 2018 के आगमन पर दिए अपने संदेश में जारी एक रेड अलर्ट की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि उस समय की कई चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं लेकिन आशा का दामन थामे रखने के भी कई कारण हैं.